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ग्रैंड मुफ्ती कांतपुरम कांतपुरम के बयान पर छिड़ी बहस, जानिए किसने क्या कहा

नौशाद अख्तर

भारत के ग्रैंड मुफ्ती और समस्त केरल जमीयतुल उलेमा के महासचिव कांतपुरम एपी अबूबकर मुसलियार के महिलाओं को लेकर दिए गए बयान ने देश भर के सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। कांतपुरम एपी अबूबकर मुसलियार ने एक कार्यक्रम में कहा था कि महिलाओं को सार्वजनिक मंचों पर आने के बजाय घर के भीतर रहना चाहिए और पर्दे का सख्ती से पालन करना चाहिए। उनका तर्क है कि इस्लाम में महिलाओं की सुरक्षा और उनके सम्मान को बनाए रखने के लिए पर्दा प्रथा और सीमाएं तय की गई हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की अत्यधिक मौजूदगी से व्यवस्था में बिखराव आता है।

इस टिप्पणी के सामने आते ही समाज के अलग-अलग हिस्सों से इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक तरफ जहां आधुनिक दृष्टिकोण रखने वाले लोग और सामाजिक कार्यकर्ता इसे महिलाओं की आजादी और अधिकारों पर अंकुश लगाने वाला बयान मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ इस्लामी विद्वान इसे धार्मिक सिद्धांतों के तहत सुरक्षा का जरिया बता रहे हैं।

बयान पर उठते सवाल और पक्ष-विपक्ष का नजरिया

कांतपुरम मुसलियार के इस बयान का विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि आज के दौर में महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं। शिक्षा, तकनीक, खेल, प्रशासन और विज्ञान जैसे क्षेत्रों में महिलाएं पुरुषों के साथ बराबरी से काम कर रही हैं। ऐसे समय में महिलाओं को घरों के भीतर सीमित रखने का सुझाव देना उनके विकास में बाधा डालने जैसा है। आलोचकों के अनुसार, पैगंबर मुहम्मद साहब की पहली पत्नी हजरत खदीजा खुद एक सफल व्यापारी थीं और उन्होंने अपने समय में व्यापारिक गतिविधियों का बेहतरीन संचालन किया था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस्लाम महिलाओं को सही सीमाओं के साथ काम करने से नहीं रोकता।

दूसरी तरफ, धार्मिक मामलों के कई जानकारों का मानना है कि ग्रैंड मुफ्ती ने जो कहा, वह पूरी तरह से पारंपरिक इस्लामी मान्यताओं, कुरान के निर्देशों और शरिया के सिद्धांतों पर आधारित है। उनका कहना है कि इस बयान का मकसद महिलाओं का अपमान करना या उन्हें कमतर आंकना नहीं था, बल्कि इस्लामी तौर-तरीकों के अनुसार उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना था। इस पक्ष का तर्क है कि इस्लाम में पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग सामाजिक भूमिकाएं तय की गई हैं, ताकि समाज में नैतिक संतुलन बना रहे।

राजनीतिक और सामाजिक मंचों पर तीखी प्रतिक्रियाएं

इस मामले ने अब राजनीतिक और सामाजिक मोड़ भी ले लिया है। इस बयान को लेकर प्रमुख मुस्लिम विचारकों, नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच भी अलग-अलग राय सामने आई है।

कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने इस टिप्पणी पर अपनी असहमति जताई है। उन्होंने कांतपुरम मुसलियार की विद्वता पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस तरह के विचार मुस्लिम समुदाय को आधुनिक शिक्षा और तरक्की से पीछे ले जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ, संघ समर्थक विचारकों और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े कुछ प्रमुख मुस्लिम चेहरों जैसे जफर सरेशवाला ने भी इस बयान की आलोचना की है और कहा है कि इस तरह के संकीर्ण विचार आज के भारत में महिलाओं की प्रगति के खिलाफ हैं।

इसके विपरीत, मुस्लिम समुदाय के कई बड़े वैचारिक संगठन जैसे जमीयत उलेमा-ए-हिंद और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से जुड़े प्रमुख विद्वानों ने इस मुद्दे पर बहुत सोच-समझकर संतुलित रुख अपनाया है।

धार्मिक गुरुओं और विद्वानों की क्या है राय?

ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने इस मुद्दे पर बोलते हुए कहा कि जब तक समाज में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कड़े कानून और इस्लामी सिद्धांतों के अनुरूप व्यवस्था लागू नहीं होती, तब तक महिलाओं की सुरक्षा एक बड़ा सवाल बनी रहेगी। उनका कहना है कि आज की आजादी के नाम पर महिलाओं को जिन परिस्थितियों में बाहर लाया जा रहा है, उससे उनकी सुरक्षा को खतरा पैदा हुआ है। कुदरत ने पुरुषों और महिलाओं को अलग-अलग शारीरिक और मानसिक क्षमताएं दी हैं, जिसके आधार पर जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

वहीं दूसरी ओर, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) के कार्यकारी सदस्य मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने इस मामले पर एक संतुलित दृष्टिकोण सामने रखा। उन्होंने कहा कि इस्लाम ने महिलाओं को पूरे अधिकार और आजादी दी है। इस्लाम में पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए शिक्षा हासिल करना अनिवार्य किया गया है। महिलाएं शरिया के दायरे में रहकर शिक्षा प्राप्त कर सकती हैं, नौकरी कर सकती हैं और किसी भी पेशे में अपना योगदान दे सकती हैं, बशर्ते वे अपनी मर्यादा और पर्दे का ध्यान रखें।

डिजिटल दौर और आधुनिक महिला का नजरिया

सामाजिक कार्यकर्ताओं और महिला संगठनों ने ग्रैंड मुफ्ती के बयान को आज के समय के हिसाब से अप्रासंगिक बताया है। लखनऊ की सामाजिक कार्यकर्ता शाइस्ता अंबर का कहना है कि आज मुस्लिम समाज की बेटियां नासा में काम कर रही हैं, विमान उड़ा रही हैं, अदालत में जज बन रही हैं और संसद तक पहुंच रही हैं। ऐसे समय में महिलाओं को घर में बंद रखने की बात करना पूरी तरह से अनुचित है। यह बयान महिलाओं को बराबरी का अधिकार देने वाले इस्लामी दर्शन और भारतीय संविधान दोनों के खिलाफ है।

ऑल इंडिया इमाम ऑर्गेनाइजेशन के चीफ इमाम डॉ. इमाम उमर अहमद इलियासी ने भी इस बयान की आलोचना करते हुए कहा कि आज की दुनिया में लड़का और लड़की में कोई अंतर नहीं रह गया है। जिस केरल राज्य से ग्रैंड मुफ्ती आते हैं, वहां की महिलाएं नर्स, डॉक्टर, इंजीनियर बनकर पूरी दुनिया में अपनी सेवाएं दे रही हैं। उन्होंने कहा कि हम एक डिजिटल और आधुनिक भारत में जी रहे हैं, जहां राष्ट्रपति पद पर एक महिला आसीन हैं। ऐसे में हमें अपनी बेटियों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, न कि उनके रास्ते में बंदिशें लगानी चाहिए।

यह पूरा विवाद इस बात को रेखांकित करता है कि आधुनिक समाज में पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। एक तरफ जहां धार्मिक सिद्धांतों की अपनी व्याख्याएं हैं, वहीं दूसरी तरफ आधुनिक भारत की महिलाएं हर बंदिश को तोड़कर आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं।

Keralam Islamic scholar says women’s public appearances will cause great destruction

यह वीडियो कांतपुरम एपी अबूबकर मुसलियार के विवादित बयान और उस पर आ रही विभिन्न प्रतिक्रियाओं का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

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