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भागवत के विदेश में मुस्लिम बयान पर सिब्बल ने उठाए सवाल

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, न्यूयॉर्क, टोरंटो, नई दिल्ली

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिका और कनाडा दौरे के दौरान दिए गए बयानों को लेकर भारत में राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। भागवत ने अपने विदेशी दौरे में भारत की विविधता, धार्मिक समुदायों के सम्मान, मानवता की सेवा और विश्व बंधुत्व पर जोर दिया। उन्होंने मुसलमानों, ईसाइयों, यहूदियों और पारसियों का भी उल्लेख किया।

दूसरी ओर, राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने भागवत के बयानों पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि विदेश में भारत की एकता और आपसी हमदर्दी की बात करने के साथ ऐसी भावना देश के भीतर भी दिखाई देनी चाहिए।

भागवत के कनाडा दौरे के दौरान टोरंटो में आयोजित ‘हिंदू विश्व बंधु, मित्रता के साथ दुनिया को अपनाएं’ कार्यक्रम में उन्होंने भारत की सभ्यता और उसके मूल विचारों पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि भारत की पहचान केवल ताकत या प्रभुत्व से नहीं बनी है। उनके अनुसार, भारत ने मानवता की सेवा और अपने सभ्यतागत चरित्र के कारण दुनिया में अलग स्थान बनाया।

भागवत ने भारत को ‘विश्वगुरु’ क्यों बताया?

मोहन भागवत ने कहा कि भारत महाशक्ति बनने के कारण विश्वगुरु नहीं बना। उन्होंने भारत की पहचान मानवता की सेवा से जोड़ते हुए कहा कि देश ने दुनिया की सेवा की और अपने चरित्र के कारण विश्वगुरु की पहचान हासिल की।

उनका जोर भारत की सभ्यतागत सोच पर था। उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा में दूसरे लोगों की मदद करना, जरूरतमंदों को शरण देना और विविधता को स्वीकार करना शामिल रहा है।

भागवत ने भारत की वैश्विक भूमिका को सैन्य या साम्राज्यवादी विस्तार से अलग बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता ने दूसरे देशों पर कब्जा करने के बजाय ज्ञान और जीवन मूल्यों का प्रसार किया।

पोलिश शरणार्थियों का उदाहरण

अपने भाषण में आरएसएस प्रमुख ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पोलिश शरणार्थियों का उदाहरण दिया।

उन्होंने बताया कि युद्ध के समय पोलिश लोगों को मुश्किल हालात का सामना करना पड़ा था। ऐसे समय में जामनगर के महाराजा ने उन्हें शरण और सुरक्षा दी। भागवत के अनुसार, उन्हें तब तक सुरक्षित रखा गया जब तक वे अपने घर वापस लौटने की स्थिति में नहीं आ गए।

उन्होंने कहा कि भारत में संकट के समय दूसरे लोगों की मदद करने की यह परंपरा पुरानी है। उनके अनुसार, यह सिलसिला आज भी जारी है।

भागवत ने कहा कि भारत ने कई मौकों पर जरूरतमंद लोगों की सहायता की है। कई बार लोगों ने मदद मांगी और कई बार भारत ने बिना मांग के भी सहायता का हाथ बढ़ाया।

मध्य पूर्व संघर्ष का भी किया उल्लेख

मोहन भागवत ने मध्य पूर्व के हालिया संघर्षों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि युद्ध के दौरान जब अलग अलग देशों के नागरिक वहां फंस गए थे तो भारत ने उन्हें बाहर निकालने के प्रयास किए।

उन्होंने बताया कि भारतीय सैन्य परिवहन विमानों ने केवल भारतीय नागरिकों को ही नहीं निकाला बल्कि सात अन्य देशों के नागरिकों को भी युद्ध क्षेत्र से बाहर लाया।

भागवत ने इस उदाहरण को भारत की मानवीय सोच से जोड़ा। उनका कहना था कि संकट में फंसे लोगों की मदद करना भारत की सभ्यतागत परंपरा का हिस्सा है।

भारत में मुसलमानों और दूसरे समुदायों का जिक्र

भागवत ने भारत की धार्मिक विविधता पर भी बात की। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक रूप से मुसलमानों, ईसाइयों, यहूदियों और पारसियों को भारत में शांतिपूर्ण शरण मिली।

उन्होंने इन समुदायों को भारत की विविध सभ्यता का हिस्सा बताते हुए कहा कि उन्हें यहां उत्पीड़न के डर के बिना रहने और ज्ञान हासिल करने का अवसर मिला।

भागवत का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि भारत में धार्मिक विविधता और अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिति को लेकर लंबे समय से राजनीतिक बहस होती रही है।

उन्होंने भारत को ऐसी सभ्यता के रूप में पेश किया जो अलग अलग धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को स्वीकार करती है।

‘हिंदू’ शब्द पर भागवत की व्याख्या

आरएसएस प्रमुख ने अपने संबोधन में हिंदू शब्द की अपनी व्याख्या भी रखी।

उन्होंने कहा कि हिंदू शब्द को किसी एक भाषा, किसी खास पूजा पद्धति या किसी एक जीवनशैली तक सीमित नहीं किया जा सकता।

भागवत के अनुसार, हिंदू सभी का सम्मान करने और सभी को स्वीकार करने की भावना रखता है।

उन्होंने विविधता को समाज की स्वाभाविक स्थिति बताया। उनके अनुसार, भारत में कई जातियां, पंथ और भाषाएं रही हैं। यह विविधता प्रकृति और सच्चाई की अलग अलग अभिव्यक्ति है।

भागवत ने कहा कि विविधता को स्वीकार करना और उसका सम्मान करना जरूरी है। उनके अनुसार, विविधता एकता की अभिव्यक्ति है और इसी कारण वह समाज को सुंदर बनाती है।

‘वसुधैव कुटुंबकम’ का संदेश

मोहन भागवत ने अपने भाषण में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की अवधारणा पर भी जोर दिया।

उन्होंने कहा कि खुले विचारों वाले और ज्ञानी लोग पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखते हैं।

भागवत के अनुसार, इंसानों के बीच बाहरी अंतर हो सकते हैं। लोगों की शारीरिक बनावट, भाषा, संस्कृति और परंपराएं अलग हो सकती हैं। इसके बावजूद मूल रूप से सभी इंसान एक हैं।

उन्होंने इसी सोच को सेवा से जोड़ा। उनका कहना था कि जब इंसान दूसरे लोगों में भी अपनी तरह मानवता देखता है तो उनकी सेवा करना उसका कर्तव्य बन जाता है।

उन्होंने कहा कि इसी ज्ञान से स्थायी खुशी और संतुष्टि हासिल होती है।

भारत की प्राचीन सभ्यता और ज्ञान का प्रसार

भागवत ने भारत की ऐतिहासिक वैश्विक पहुंच का भी उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि भारत के पूर्वज मैक्सिको से साइबेरिया तक गए। उन्होंने हिमालय पार किया और छोटी नौकाओं से दक्षिण पूर्व एशिया तक पहुंचे।

भागवत के अनुसार, भारतीय सभ्यता ने दूसरे देशों पर कब्जा करने की कोशिश नहीं की। इसके बजाय ज्ञान और जीवन मूल्यों का प्रसार किया गया।

उन्होंने खगोल विज्ञान और आयुर्वेद का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत ने इन क्षेत्रों में हासिल ज्ञान को दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाया।

उनका कहना था कि भारत की पहचान दूसरे देशों पर प्रभुत्व स्थापित करने से नहीं बल्कि ज्ञान साझा करने से बनी।

कपिल सिब्बल ने भागवत के बयान पर क्या कहा?

भागवत के इन बयानों पर राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने प्रतिक्रिया दी।

सिब्बल ने भागवत के विदेश में दिए गए संदेश और भारत में उनके रुख को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जब भागवत न्यूयॉर्क में होते हैं तो भारत एक दूसरे के लिए हमदर्दी महसूस करता है, लेकिन दिल्ली में स्थिति अलग दिखाई देती है।

सिब्बल ने कहा कि जिस दिन भागवत भारत लौटें, उन्हें देश में भी इसी तरह का संदेश देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भागवत को सरकार से कहना चाहिए कि भारत के लोगों में एक दूसरे के प्रति हमदर्दी होनी चाहिए।

सिब्बल ने यह भी कहा कि जब किसी समुदाय पर हमला हो तो आरएसएस को खड़े होकर स्पष्ट रूप से कहना चाहिए कि वह ऐसे हमले का समर्थन नहीं करता।

विदेश दौरे के बयान पर भारत में क्यों हो रही बहस?

मोहन भागवत के बयान ने भारत की राजनीति में एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है। वह सवाल यह है कि धार्मिक विविधता, सभी समुदायों के सम्मान और विश्व बंधुत्व को लेकर विदेश में दिया गया संदेश भारत के घरेलू सामाजिक और राजनीतिक माहौल में किस तरह दिखाई देता है।

भागवत ने टोरंटो में भारत को ऐसी सभ्यता के रूप में प्रस्तुत किया जो विविधता को स्वीकार करती है। उन्होंने मुसलमानों समेत कई समुदायों के भारत में ऐतिहासिक योगदान और मौजूदगी का उल्लेख किया।

वहीं सिब्बल की प्रतिक्रिया इस बात पर केंद्रित है कि इन विचारों को भारत में भी व्यवहार का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

भागवत के संदेश में सेवा और विविधता प्रमुख

भागवत के भाषण को देखा जाए तो उसमें तीन बातें प्रमुख रूप से सामने आती हैं। पहली है मानवता की सेवा। दूसरी है विविधता का सम्मान। तीसरी है पूरी दुनिया को एक परिवार मानने की सोच।

उन्होंने भारत की पहचान को इन मूल्यों से जोड़ने की कोशिश की।

उनका कहना था कि भारत ने संकट में फंसे लोगों की मदद की है। उन्होंने ऐतिहासिक शरण के उदाहरण दिए। साथ ही मध्य पूर्व से दूसरे देशों के नागरिकों को निकालने का उल्लेख किया।

धार्मिक विविधता की चर्चा करते हुए उन्होंने मुसलमानों, ईसाइयों, यहूदियों और पारसियों का जिक्र किया।

अब सवाल भारत में इसके असर का

भागवत के अमेरिका और कनाडा दौरे के बयानों के बाद यह बहस आगे बढ़ गई है कि भारत की विविधता और सभी समुदायों के सम्मान का संदेश देश के भीतर किस तरह लागू होता है।

आरएसएस प्रमुख ने टोरंटो में भारत की सभ्यता को सेवा, स्वीकार्यता और विविधता से जोड़ते हुए कहा कि यही भारत का मूल चरित्र है।

कपिल सिब्बल ने इसी आधार पर उनसे भारत लौटकर भी ऐसा ही संदेश देने की मांग की है।

इस पूरे घटनाक्रम में एक बात स्पष्ट है। भागवत का विदेश दौरे का भाषण केवल भारतीय सभ्यता और हिंदू दर्शन की व्याख्या तक सीमित नहीं रहा। इसमें मुसलमानों समेत अलग अलग धार्मिक समुदायों, शरण देने की भारतीय परंपरा, मानवता की सेवा और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ जैसे मुद्दे भी प्रमुख रहे।

अब राजनीतिक नजरें इस बात पर हैं कि विदेश में व्यक्त किए गए इन विचारों को भारत की घरेलू राजनीति और सामाजिक माहौल के संदर्भ में किस तरह देखा जाता है।

AEO के लिए प्रमुख सवाल

मोहन भागवत ने कनाडा में भारत के बारे में क्या कहा?
उन्होंने कहा कि भारत केवल महाशक्ति बनने के कारण विश्वगुरु नहीं बना। उनके अनुसार भारत ने मानवता की सेवा, ज्ञान और अपने सभ्यतागत मूल्यों के कारण विश्वगुरु की पहचान हासिल की।

मोहन भागवत ने मुसलमानों के बारे में क्या कहा?
उन्होंने कहा कि भारत में ऐतिहासिक रूप से मुसलमानों, ईसाइयों, यहूदियों और पारसियों को शांतिपूर्ण शरण और ज्ञान मिला।

कपिल सिब्बल ने भागवत से क्या कहा?
सिब्बल ने कहा कि विदेश में भारत की एकता और आपसी हमदर्दी की बात करने के साथ भारत में भी सभी समुदायों के सम्मान और अधिकार की बात की जानी चाहिए।

भागवत ने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का क्या अर्थ बताया?
उन्होंने इसे पूरी दुनिया को एक परिवार मानने की अवधारणा बताया और कहा कि दूसरों की सेवा करना मानव का कर्तव्य है।

भागवत के भाषण के मुख्य विषय क्या रहे?
भारत की सभ्यता, विश्वगुरु की अवधारणा, मानवता की सेवा, धार्मिक विविधता, मुसलमानों समेत विभिन्न समुदायों का सम्मान, हिंदू दर्शन, वसुधैव कुटुंबकम और भारत की ऐतिहासिक शरण परंपरा।

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