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एनसीईआरटी की इतिहास की पुस्तक में संतुलन जरूरी: सलीम इंजीनियर

नई दिल्ली।

जमाअत ए इस्लामी हिंद के मरकजी तालीमी बोर्ड के चेयरमैन प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने कक्षा 9 के नए एनसीईआरटी सामाजिक विज्ञान पाठ्यक्रम को लेकर कुछ अहम सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इतिहास की पढ़ाई में ऐतिहासिक तथ्य, प्रमाण, आलोचनात्मक सोच और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को केंद्रीय स्थान मिलना चाहिए। छात्रों को केवल घटनाओं की जानकारी देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह भी समझना चाहिए कि ऐतिहासिक तथ्य, परंपरा, विश्वास और इतिहास की व्याख्या अलग अलग चीजें हैं।

प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने कहा कि स्कूली इतिहास ऐसा होना चाहिए जो विद्यार्थियों को अतीत को समझने के साथ सवाल पूछने की आदत भी डाले। उनके मुताबिक इतिहास किसी एक समुदाय, विचार या दृष्टिकोण को स्थापित करने का माध्यम नहीं होना चाहिए। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को विभिन्न स्रोतों और नजरियों के आधार पर अतीत को समझने की क्षमता देना होना चाहिए।

यह बहस ऐसे समय में हो रही है जब एनसीईआरटी ने कक्षा 9 के लिए नए सामाजिक विज्ञान पाठ्यक्रम में भारतीय इतिहास, क्षेत्रीय राज्यों, सांस्कृतिक परंपराओं और भारत के विश्व से संबंधों को नए ढंग से व्यवस्थित किया है। एनसीईआरटी के आधिकारिक पाठ्यक्रम में Resistance and Resilience यानी प्रतिरोध और दृढ़ता, 1000 ईस्वी से 1700 ईस्वी को नौवीं कक्षा के सामाजिक विज्ञान में शामिल किया गया है। इसमें क्षेत्रीय राज्यों, प्रतिरोध, गठबंधनों, कला, वास्तुकला, भाषाओं, साहित्य और भक्ति परंपरा जैसे विषयों का उल्लेख है। NCERT

इतिहास में तथ्य और विश्वास का फर्क जरूरी

प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने नए पाठ्यक्रम में शामिल ऐतिहासिक सामग्री के संदर्भ में कहा कि विद्यार्थियों को यह स्पष्ट रूप से समझाया जाना चाहिए कि किसी समाज की परंपरा और किसी ऐतिहासिक घटना के प्रमाण एक ही बात नहीं होते।

उनके अनुसार सांस्कृतिक परंपराओं को इतिहास की कक्षा से बाहर नहीं किया जाना चाहिए। वे भी समाज और संस्कृति को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। लेकिन किसी धार्मिक या सांस्कृतिक विश्वास को केवल इसलिए ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जा सकता क्योंकि वह लंबे समय से किसी समुदाय में प्रचलित है।

यहीं इतिहास शिक्षा की असली चुनौती सामने आती है।

एक छात्र को यह बताया जा सकता है कि किसी क्षेत्र में किसी शासक या घटना को लेकर एक विशेष लोक परंपरा रही है। लेकिन साथ ही उसे यह भी बताया जाना चाहिए कि उस परंपरा का ऐतिहासिक प्रमाण क्या है। उपलब्ध स्रोत क्या कहते हैं। अलग अलग इतिहासकार उस घटना को किस तरह देखते हैं।

इस तरह विद्यार्थी केवल कहानी नहीं सुनता। वह इतिहास को समझना सीखता है।

फ्रांस और रूस की क्रांति पर भी सवाल

प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने फ्रांसीसी और रूसी क्रांति के अध्ययन को लेकर भी अपनी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि दोनों क्रांतियों ने आधुनिक राजनीतिक और सामाजिक विचारों पर गहरा प्रभाव डाला।

फ्रांसीसी क्रांति से स्वतंत्रता, समानता, नागरिकता और लोकतांत्रिक राजनीति से जुड़ी बहसों को नई दिशा मिली। रूसी क्रांति ने समाजवाद और आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था पर दुनिया भर में व्यापक बहस पैदा की।

उनका कहना है कि यदि भारतीय विद्यार्थियों को वैश्विक नागरिक के रूप में तैयार करना है तो उन्हें उन घटनाओं से परिचित कराना जरूरी है जिन्होंने आधुनिक दुनिया के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हालांकि यहां एक तथ्यात्मक अंतर भी ध्यान देने योग्य है। पुराने एनसीईआरटी पाठ्यक्रम में कक्षा 9 के India and the Contemporary World I में फ्रांसीसी क्रांति और रूसी क्रांति दोनों शामिल थीं। NCERT

वहीं 2026 के एनसीईआरटी के आधिकारिक कक्षा 9 सामाजिक विज्ञान पाठ्यक्रम में India and the World I भी कक्षा 9 में ही दर्ज है। इसमें 1900 ईसा पूर्व से 1200 ईस्वी तक व्यापार, सांस्कृतिक संपर्क और भारतीय ज्ञान परंपराओं को शामिल किया गया है। इसलिए इसे सीधे कक्षा 10 में स्थानांतरित कर दिया गया है, ऐसा कहना मौजूदा आधिकारिक पाठ्यक्रम दस्तावेज से पूरी तरह मेल नहीं खाता। NCERT

इस अंतर के बावजूद प्रोफेसर सलीम इंजीनियर का व्यापक सवाल पाठ्यक्रम में वैश्विक इतिहास के महत्व और उसके संतुलित अध्ययन से जुड़ा है।

सिख इतिहास को लेकर भी चिंता

प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने सिख इतिहास और भारतीय मध्यकालीन इतिहास की प्रस्तुति पर भी अपनी बात रखी। उनका कहना है कि इतिहास को केवल संघर्ष और टकराव की कहानी के रूप में नहीं पढ़ाया जाना चाहिए।

भारत का इतिहास कई स्तरों पर बना है। इसमें राजनीतिक संघर्ष रहे हैं। सत्ता के लिए युद्ध हुए हैं। धार्मिक मतभेद भी रहे हैं। लेकिन इसके साथ सामाजिक सहयोग, सांस्कृतिक आदान प्रदान, साझा परंपराएं और अलग अलग समुदायों के बीच संपर्क के अनेक उदाहरण भी मौजूद हैं।

उनके अनुसार सिख मुस्लिम संबंधों को केवल संघर्ष के नजरिए से पढ़ाना इतिहास की जटिलता को सीमित कर सकता है।

इतिहास में गुरु परंपरा, मुगल काल, क्षेत्रीय शक्तियां, व्यापार, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक संपर्क सभी को व्यापक संदर्भ में समझने की जरूरत है। इससे विद्यार्थियों को यह समझने में मदद मिलती है कि अतीत केवल संघर्षों का संग्रह नहीं है।

शिवाजी और ऐतिहासिक परंपराओं का सवाल

प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने पाठ्यक्रम में आने वाली कुछ पारंपरिक कथाओं के संदर्भ में भी सवाल उठाया है। उन्होंने शिवाजी जैसे शासकों से जुड़ी उन कथाओं का उदाहरण दिया जिनमें देवी द्वारा तलवार दिए जाने जैसी धार्मिक परंपराओं का उल्लेख मिलता है।

उनका कहना है कि ऐसी सांस्कृतिक परंपराओं का अध्ययन किया जा सकता है। लेकिन विद्यार्थियों को यह समझाना जरूरी है कि लोककथा, धार्मिक विश्वास और प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य की प्रकृति अलग होती है।

यह अंतर इतिहास शिक्षा की बुनियादी जरूरत है।

किसी कथा का सांस्कृतिक महत्व बहुत बड़ा हो सकता है। फिर भी इतिहास की कक्षा में उससे जुड़े प्रमाणों पर चर्चा की जा सकती है। इसी तरह किसी ऐतिहासिक घटना की अलग अलग व्याख्याएं हो सकती हैं। छात्रों को इन व्याख्याओं के बीच अंतर समझना चाहिए।

इससे न तो परंपरा का अपमान होता है और न इतिहास कमजोर होता है। बल्कि विद्यार्थी ज्यादा परिपक्व तरीके से अतीत को समझ पाता है।

वैज्ञानिक सोच पर संविधान का जोर

प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने संविधान के अनुच्छेद 51A(h) का भी उल्लेख किया। इस अनुच्छेद में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों के तहत वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद तथा जांच और सुधार की भावना विकसित करने की बात कही गई है। Legislative Dashboard

उनके अनुसार इतिहास की कक्षा भी इन संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने का माध्यम बन सकती है।

बच्चों को सवाल पूछने की छूट होनी चाहिए।

उन्हें स्रोतों की जांच करनी चाहिए।

उन्हें अलग अलग विचार पढ़ने चाहिए।

उन्हें किसी निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले प्रमाणों को देखना चाहिए।

यही प्रक्रिया आलोचनात्मक सोच विकसित करती है।

इतिहास केवल गौरव या विवाद की कहानी नहीं

प्रोफेसर सलीम इंजीनियर का कहना है कि इतिहास को केवल गौरव की कहानी बनाने से भी बचना चाहिए और केवल संघर्षों की कहानी बनाने से भी।

अतीत में उपलब्धियां थीं तो गलतियां भी थीं।

सामाजिक सुधार हुए तो सामाजिक असमानताएं भी थीं।

सांस्कृतिक उपलब्धियां थीं तो संघर्ष भी थे।

राजनीतिक विस्तार हुआ तो विरोध भी हुआ।

अगर विद्यार्थियों को इन सभी पहलुओं से परिचित कराया जाए तो वे इतिहास को अधिक संतुलित नजरिए से समझ सकेंगे।

एनसीईआरटी के नए पाठ्यक्रम में 1000 से 1700 ईस्वी के दौर के लिए प्रतिरोध और दृढ़ता के साथ कला, वास्तुकला, भाषाओं, साहित्य और भक्ति परंपरा को भी शामिल किया गया है। पाठ्यक्रम का उद्देश्य क्षेत्रीय राज्यों और अलग अलग समुदायों की भूमिका को समझना भी बताया गया है। NCERT

छात्रों को वैश्विक इतिहास से जोड़ने की जरूरत

प्रोफेसर सलीम इंजीनियर के अनुसार भारतीय इतिहास की पढ़ाई जरूरी है। लेकिन इसके साथ विद्यार्थियों को विश्व इतिहास से भी जोड़ना होगा।

फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति और आधुनिक दुनिया के दूसरे बड़े राजनीतिक बदलावों को समझने से छात्रों को यह पता चलता है कि लोकतंत्र, नागरिक अधिकार, समानता और समाजवाद जैसी अवधारणाएं किस ऐतिहासिक प्रक्रिया से विकसित हुईं।

दूसरी ओर भारत के इतिहास को पढ़ने से उन्हें अपने समाज की विविधता, सांस्कृतिक परंपराओं और राजनीतिक विकास को समझने का अवसर मिलता है।

दोनों को साथ पढ़ने से इतिहास का दायरा बड़ा होता है।

सवाल पूछने वाला विद्यार्थी ही बेहतर इतिहास समझेगा

प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने कहा कि इतिहास शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल परीक्षा के लिए तारीखें और नाम याद कराना नहीं होना चाहिए। विद्यार्थियों को यह सीखना चाहिए कि किसी ऐतिहासिक दावे को कैसे परखा जाता है।

किसने लिखा?

कब लिखा?

किस उद्देश्य से लिखा?

उसके समर्थन में क्या प्रमाण हैं?

दूसरे स्रोत क्या कहते हैं?

इन सवालों से इतिहास की समझ गहरी होती है।

एक लोकतांत्रिक समाज में ऐसी सोच की जरूरत और भी ज्यादा है।

भारत का संविधान भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और जांच की भावना को महत्व देता है। Legislative Dashboard

इस लिहाज से इतिहास की कक्षा केवल अतीत की चर्चा नहीं है। यह आने वाली पीढ़ी की सोच बनाने की जगह भी है।

प्रोफेसर सलीम इंजीनियर का जोर इसी बात पर है कि विद्यार्थी अपने इतिहास को ईमानदारी से समझें। वे उसकी उपलब्धियों पर गर्व कर सकें। उसकी गलतियों से सीख सकें। विभिन्न समुदायों के साझा इतिहास को पहचान सकें। और प्रमाणों के आधार पर अपनी राय बनाने की क्षमता विकसित करें।

आखिरकार इतिहास का सबसे बड़ा लाभ यही है कि वह हमें केवल यह नहीं बताता कि क्या हुआ था।

वह यह समझने की क्षमता भी देता है कि क्यों हुआ था और उससे आज क्या सीखा जा सकता है।

AEO के लिए सीधे सवाल और जवाब

प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने एनसीईआरटी पाठ्यक्रम पर क्या कहा?
उन्होंने इतिहास की पढ़ाई में संतुलन, ऐतिहासिक प्रमाण, आलोचनात्मक सोच और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्राथमिकता देने की मांग की है।

नए कक्षा 9 एनसीईआरटी सामाजिक विज्ञान पाठ्यक्रम में क्या नया है?
आधिकारिक पाठ्यक्रम में 1000 से 1700 ईस्वी के लिए Resistance and Resilience, क्षेत्रीय राज्यों, कला, वास्तुकला, भाषाओं, साहित्य और भक्ति परंपरा जैसे विषय शामिल हैं। NCERT

क्या कक्षा 9 में India and the World शामिल है?
हां। मौजूदा आधिकारिक एनसीईआरटी पाठ्यक्रम में India and the World I कक्षा 9 में शामिल है। NCERT

संविधान का अनुच्छेद 51A(h) क्या कहता है?
यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद तथा जांच और सुधार की भावना विकसित करने को नागरिक का मौलिक कर्तव्य बताता है। Legislative Dashboard

इतिहास पढ़ाने में संतुलन क्यों जरूरी है?
ताकि विद्यार्थी तथ्य, परंपरा, विश्वास और ऐतिहासिक व्याख्या के बीच अंतर समझ सकें और प्रमाणों के आधार पर निष्कर्ष निकालना सीखें।

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