इजराइल में नई सरकार का संकट, आइजेनकोट के सामने 67 सीटों की चुनौती
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67 सांसदों का समर्थन मिलने के बावजूद गादी आइजेनकोट के लिए सरकार बनाना आसान नहीं, अरब और अति रूढ़िवादी दलों की भूमिका अहम
नई दिल्ली/दुबई:
इजराइल में 27 अक्टूबर 2026 को हुए चुनाव के बाद नई सरकार बनाने की कोशिशें तेज हो गई हैं। राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने विपक्षी नेता और पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट को सरकार बनाने का पहला मौका दिया है। हालांकि, उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए पर्याप्त सांसदों का समर्थन जुटाना है।
आइजेनकोट को 120 सदस्यीय संसद में 67 सांसदों का समर्थन मिलने की सिफारिश की गई है। लेकिन यह समर्थन अपने आप में नई सरकार बनाने की गारंटी नहीं है। उनकी अपनी राजनीतिक गठबंधन के पास फिलहाल 48 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है।
इस स्थिति में अरब पार्टियों और अति रूढ़िवादी यहूदी दलों की भूमिका निर्णायक हो सकती है। लेकिन इन दलों की मांगें और आइजेनकोट के सहयोगियों की राजनीतिक प्राथमिकताएं एक दूसरे से काफी अलग हैं। यही वजह है कि इजराइल में नई सरकार के गठन को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
67 सीटों का समर्थन, लेकिन बहुमत की राह कठिन
इजराइल की संसद नेसेट में सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। आइजेनकोट को 67 सांसदों ने राष्ट्रपति के सामने समर्थन देने की सिफारिश की है। लेकिन उनके अपने गठबंधन के पास केवल 48 सीटें हैं।
इसका मतलब है कि उन्हें सरकार बनाने के लिए अपने मौजूदा सहयोगियों से आगे बढ़कर दूसरे दलों का समर्थन हासिल करना होगा।
राष्ट्रपति इसाक हर्जोग के सामने नेतन्याहू के समर्थन में 46 सांसदों की सिफारिश आई थी। हालांकि, नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन के पास चुनाव के बाद 53 सीटें हैं। इस अंतर की वजह राजनीतिक दलों की सिफारिशों और गठबंधन की वास्तविक स्थिति में अंतर है।
आइजेनकोट के सामने सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उनके समर्थक दलों की राजनीतिक सोच एक जैसी नहीं है। कुछ दल धर्मनिरपेक्ष राजनीति और सैन्य सेवा में समानता चाहते हैं। वहीं, कुछ दल धार्मिक समुदायों के अधिकारों और सैन्य सेवा से छूट के पक्ष में हैं।
इजराइल में सरकार गठन की प्रक्रिया में यही मतभेद निर्णायक साबित हो सकते हैं।
अरब पार्टियों का समर्थन कितना अहम?
27 अक्टूबर के चुनाव में अरब नेतृत्व वाली पार्टियों ने कुल 19 सीटें हासिल कीं। यह संख्या इजराइल की राजनीति में उनके बढ़ते प्रभाव को दिखाती है।
इन पार्टियों का समर्थन आइजेनकोट को संसद में बहुमत दिलाने में मदद कर सकता है। लेकिन उनके सहयोगियों में इस मुद्दे पर सहमति नहीं है।
आइजेनकोट के सहयोगी एविगडोर लिबरमैन की पार्टी यिसराइल बेतेनु अरब पार्टियों के समर्थन से बनने वाली सरकार का विरोध करती रही है। लिबरमैन का मानना है कि अरब दलों के समर्थन पर निर्भर सरकार इजराइल की सुरक्षा और राजनीतिक दिशा के लिए उचित नहीं होगी।
दूसरी ओर, अरब पार्टियों के नेता भी सरकार में शामिल होने को लेकर अलग-अलग विचार रखते हैं।
जॉइंट लिस्ट के 11 सांसदों ने आइजेनकोट को समर्थन दिया है। हालांकि, यह पार्टी सरकार में शामिल होने के बजाय बाहर से समर्थन देने की संभावना पर विचार कर सकती है।
इस्लामवादी यूनाइटेड अरब लिस्ट यानी राम ने आठ सीटें हासिल की हैं। उसके नेता मंसूर अब्बास ने सरकार में शामिल होने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया है।
लेकिन यहां भी एक बड़ा विवाद है।
आइजेनकोट ने कहा है कि उनकी सरकार में शामिल होने वाले दलों को हमास को आतंकवादी संगठन मानना होगा। राम के नेता मंसूर अब्बास ने इस मांग पर सहमति नहीं जताई है।
अब्बास ने आतंकवादी घटनाओं की निंदा की है और हमास सहित अन्य फिलिस्तीनी संगठनों को हथियार छोड़ने की जरूरत बताई है। लेकिन उन्होंने हमास को आतंकवादी संगठन घोषित करने की मांग स्वीकार नहीं की है।
इस मतभेद से आइजेनकोट की बातचीत और मुश्किल हो सकती है।
अगर वह अरब पार्टियों का समर्थन लेते हैं, तो उनके दक्षिणपंथी सहयोगियों में नाराजगी बढ़ सकती है। वहीं, अरब दलों को पूरी तरह नजरअंदाज करने से उनके लिए संसद में बहुमत हासिल करना कठिन हो जाएगा।
अति रूढ़िवादी दलों से समझौता क्यों मुश्किल?
इजराइल में सरकार गठन के लिए अति रूढ़िवादी यहूदी दल भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इन दलों के पास कुल 13 सीटें हैं।
इनका समर्थन हासिल करने से आइजेनकोट के लिए संसद में बहुमत का रास्ता खुल सकता है। लेकिन इन दलों की सबसे प्रमुख मांग सैन्य सेवा से जुड़ी है।
अति रूढ़िवादी समुदाय के नेता चाहते हैं कि उनके धार्मिक संस्थानों में पढ़ने वाले युवाओं को अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट मिलती रहे।
आइजेनकोट और उनके कई सहयोगी इस व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं। उनका कहना है कि इजराइल की सुरक्षा के लिए सभी नागरिकों को सैन्य या नागरिक सेवा में योगदान देना चाहिए।
यह मुद्दा इजराइल की राजनीति में लंबे समय से विवाद का कारण रहा है।
गाजा युद्ध और क्षेत्रीय संघर्षों के बाद इजराइल की सेना पर दबाव बढ़ा है। ऐसे में सैन्य सेवा में समानता की मांग और तेज हुई है।
आइजेनकोट ने चुनाव प्रचार के दौरान इस मुद्दे पर बदलाव का समर्थन किया था। उनके सहयोगी नफ्ताली बेनेट भी सैन्य सेवा में व्यापक भागीदारी के पक्ष में रहे हैं।
लेकिन अति रूढ़िवादी दलों के साथ समझौता करने के लिए उन्हें अपनी चुनावी प्रतिबद्धताओं में बदलाव करना पड़ सकता है।
इससे उनके गठबंधन में असंतोष पैदा होने की आशंका है।
क्या आइजेनकोट अपने सहयोगियों को एकजुट रख पाएंगे?
आइजेनकोट के सामने केवल दूसरी पार्टियों का समर्थन जुटाने की चुनौती नहीं है। उन्हें अपने मौजूदा सहयोगियों के बीच भी सहमति बनानी होगी।
उनके संभावित गठबंधन में वामपंथी, मध्यमार्गी और दक्षिणपंथी दल शामिल हैं।
इन सभी दलों का नेतन्याहू को सत्ता से हटाने का लक्ष्य समान है। लेकिन धर्म, सैन्य सेवा, अरब पार्टियों के साथ संबंध और न्यायपालिका में बदलाव जैसे मुद्दों पर उनके विचार अलग हैं।
इजराइल की राजनीति में यह मतभेद पहले भी गठबंधन सरकारों के लिए परेशानी पैदा करते रहे हैं।
आइजेनकोट ने राष्ट्रीय आपातकालीन सरकार बनाने का विचार भी सामने रखा है। उनका मानना है कि देश की मौजूदा परिस्थितियों में राजनीतिक दलों को कुछ मुद्दों पर समझौता करना पड़ सकता है।
एक विकल्प अल्पमत सरकार बनाने का भी है।
ऐसी सरकार में आइजेनकोट के गठबंधन के पास अपने दम पर 61 सीटें नहीं होंगी। लेकिन यदि कुछ सांसद विश्वास मत के दौरान मतदान से दूर रहते हैं या बाहर से समर्थन देते हैं, तो सरकार गठन की संभावना बन सकती है।
हालांकि, लिबरमैन ने 61 सांसदों के समर्थन के बिना सरकार बनाने के विचार का विरोध किया है।
इससे आइजेनकोट की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं।
नेतन्याहू की सत्ता पर क्या असर पड़ेगा?
आइजेनकोट को सरकार बनाने का पहला मौका मिलने के बावजूद बेंजामिन नेतन्याहू अभी प्रधानमंत्री पद पर बने हुए हैं।
नई सरकार के शपथ लेने तक नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में काम करते रहेंगे।
यदि आइजेनकोट सरकार बनाने में सफल नहीं होते हैं, तो नेतन्याहू को दोबारा सरकार बनाने का मौका मिल सकता है।
हालांकि, नेतन्याहू के लिए भी बहुमत जुटाना आसान नहीं होगा। उनके गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं। उन्हें भी दूसरे दलों का समर्थन हासिल करना पड़ेगा।
नेतन्याहू ने आइजेनकोट से व्यापक राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने की अपील की है। लेकिन आइजेनकोट ने उनके साथ सरकार में शामिल होने से इनकार किया है।
आइजेनकोट का कहना है कि नेतन्याहू के नेतृत्व में देश की राजनीतिक दिशा बदलना मुश्किल होगा।
दोनों नेताओं के बीच न्यायपालिका में बदलाव और 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले से पहले सुरक्षा व्यवस्था में हुई चूक की जांच जैसे मुद्दों पर भी मतभेद हैं।
आइजेनकोट के सहयोगी राष्ट्रीय जांच आयोग बनाने की मांग कर रहे हैं। उनका मानना है कि हमास के हमले से पहले सुरक्षा विफलताओं की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
नेतन्याहू के लिए यह मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील है।
संसद अध्यक्ष को बदलने की कोशिश
आइजेनकोट की रणनीति केवल सरकार बनाने तक सीमित नहीं है। वह संसद में भी अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहते हैं।
नई संसद के सदस्यों के शपथ लेने के बाद विपक्षी दल संसद अध्यक्ष अमीर ओहाना को हटाने की कोशिश कर सकते हैं।
ओहाना नेतन्याहू के सहयोगी माने जाते हैं।
यदि आइजेनकोट समर्थक दल संसद अध्यक्ष बदलने में सफल होते हैं, तो उन्हें संसदीय समितियों और विधायी प्रक्रिया में अधिक प्रभाव मिल सकता है।
इससे न्यायपालिका में विवादित बदलावों को पलटने और सुरक्षा विफलताओं की जांच आगे बढ़ाने जैसे मुद्दों पर विपक्ष को मदद मिल सकती है।
हालांकि, संसद अध्यक्ष बदलने के लिए भी पर्याप्त राजनीतिक समर्थन जरूरी होगा।
क्या इजराइल में फिर चुनाव होंगे?
आइजेनकोट को सरकार बनाने के लिए 28 दिन का समय दिया गया है। जरूरत पड़ने पर उन्हें 14 दिन की अतिरिक्त अवधि भी मिल सकती है।
इस दौरान उन्हें अपने सहयोगियों और दूसरे दलों के साथ बातचीत करके बहुमत हासिल करना होगा।
यदि वह सफल नहीं होते हैं, तो राष्ट्रपति किसी अन्य उम्मीदवार को सरकार बनाने का मौका दे सकते हैं।
नेतन्याहू भी इस प्रक्रिया में दोबारा सामने आ सकते हैं।
लेकिन यदि कोई भी नेता 61 सांसदों का समर्थन हासिल नहीं कर पाता है, तो इजराइल में फिर से चुनाव होने की संभावना बढ़ जाएगी।
इससे देश में राजनीतिक अनिश्चितता और लंबी हो सकती है।
इजराइल पहले भी कई बार गठबंधन सरकार बनाने में कठिनाइयों का सामना कर चुका है। इस बार भी चुनाव के बाद किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है।
इजराइल की नई सरकार पर सबकी नजर
गादी आइजेनकोट के लिए यह केवल सरकार बनाने की चुनौती नहीं है। उन्हें ऐसे राजनीतिक दलों को एक साथ लाना है, जिनकी प्राथमिकताएं कई अहम मुद्दों पर अलग हैं।
अरब पार्टियों का समर्थन, अति रूढ़िवादी दलों की सैन्य सेवा संबंधी मांगें और नेतन्याहू के साथ किसी संभावित समझौते का सवाल उनके सामने सबसे बड़ी चुनौतियां हैं।
67 सांसदों की सिफारिश उन्हें सरकार बनाने का अवसर देती है। लेकिन वास्तविक बहुमत हासिल करने के लिए उन्हें राजनीतिक समझौते करने होंगे।
इजराइल की राजनीति में आने वाले दिनों में यह तय होगा कि आइजेनकोट नेतन्याहू की सत्ता समाप्त कर नई सरकार बना पाते हैं या देश एक बार फिर चुनाव और राजनीतिक गतिरोध की ओर बढ़ता है।
फिलहाल, सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आइजेनकोट के समर्थक दल अपने मतभेदों को दूर करके उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए एकजुट हो पाएंगे?
सवाल और जवाब
सवाल: इजराइल में सरकार बनाने के लिए कितनी सीटें जरूरी हैं?
जवाब: इजराइल की 120 सदस्यीय संसद में सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है।
सवाल: गादी आइजेनकोट को कितने सांसदों का समर्थन मिला है?
जवाब: 67 सांसदों ने राष्ट्रपति के सामने आइजेनकोट को सरकार बनाने का समर्थन देने की सिफारिश की है। लेकिन उनके अपने गठबंधन के पास 48 सीटें हैं।
सवाल: इजराइल में अरब पार्टियां सरकार गठन में क्यों अहम हैं?
जवाब: अरब नेतृत्व वाली पार्टियों के पास कुल 19 सीटें हैं। उनका समर्थन आइजेनकोट को बहुमत हासिल करने में मदद कर सकता है, लेकिन उनके सहयोगियों में इस समर्थन को लेकर मतभेद हैं।
सवाल: अति रूढ़िवादी दल आइजेनकोट का विरोध क्यों कर सकते हैं?
जवाब: अति रूढ़िवादी दल धार्मिक समुदायों के युवाओं को सैन्य सेवा से छूट देने की व्यवस्था बनाए रखना चाहते हैं। आइजेनकोट और उनके कई सहयोगी सैन्य सेवा में समानता के पक्ष में हैं।
सवाल: आइजेनकोट सरकार बनाने में असफल हुए तो क्या होगा?
जवाब: नेतन्याहू को सरकार बनाने का मौका मिल सकता है। यदि कोई भी नेता बहुमत हासिल नहीं करता है, तो इजराइल में नए चुनाव होने की संभावना बढ़ सकती है।

