राजस्थान में उभर रहा नया राजपूत मुस्लिम सियासी समीकरण
अशफाक कायमखानी,सीकर ( राजस्थान)

राजस्थान की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। खासकर शेखावाटी और नागौर क्षेत्र में बदलते जातीय समीकरणों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। लंबे समय तक प्रभावी रहे जाट मुस्लिम गठबंधन के बीच अब दरार की चर्चा होने लगी है। इसके समानांतर राजपूत मुस्लिम राजनीतिक समझदारी और नजदीकियों के संकेत भी दिखाई देने लगे हैं। यदि यह समीकरण मजबूत होता है तो इसका असर शेखावाटी की 31 विधानसभा सीटों और चार लोकसभा सीटों पर पड़ सकता है।
राजस्थान की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। आजादी के बाद से शेखावाटी क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग राजमाता गायत्री देवी की स्वतंत्र पार्टी के साथ जुड़ा रहा। वर्ष 1967 में आलम अली खान फतेहपुर विधानसभा सीट से स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर विधायक बने। इसके बाद वर्ष 1972 में मंडावा से एजाजनबी खान ने चुनाव लड़ा और बेहद कम अंतर से हार गए।
उस दौर में मुस्लिम मतदाता बड़ी संख्या में राजपूत उम्मीदवारों का समर्थन करते थे। वर्ष 1979 के लोकसभा चुनाव में शेखावाटी क्षेत्र में राजपूत मुस्लिम समीकरण कुछ हद तक सफल भी रहा। झुंझुनूं लोकसभा सीट से भीम सिंह मंडावा सांसद बने, जबकि चूरू क्षेत्र से आलम अली खान बेहद कम अंतर से चुनाव हार गए।
इसके बाद वर्ष 1980 में भारतीय जनता पार्टी के गठन और भैरों सिंह शेखावत के नेतृत्व ने राजस्थान की राजनीति की दिशा बदल दी। राजपूत मतदाता बड़ी संख्या में भाजपा के साथ जुड़ने लगे। दूसरी ओर मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव कांग्रेस और लोकदल की ओर बढ़ा। इसी दौर में जाट और मुस्लिम समुदाय के बीच राजनीतिक तालमेल मजबूत हुआ।
शेखावाटी में जाट मुस्लिम गठबंधन कई दशकों तक प्रभावी बना रहा। सीकर के महरिया परिवार और चूरू के कस्वां परिवार जैसे बड़े जाट नेताओं के भाजपा में आने से पार्टी में जाट नेतृत्व का प्रभाव बढ़ा। आज स्थिति यह है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दल जाट समुदाय को महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रतिनिधित्व देते हैं। लोकसभा चुनावों में भी दोनों दल अक्सर जाट उम्मीदवारों को प्राथमिकता देते हैं।
हाल के वर्षों में हालांकि इस समीकरण में बदलाव के संकेत दिखाई देने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा में जाट नेतृत्व के बढ़ते प्रभाव के बीच राजपूत समुदाय का एक वर्ग स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहा है। इसी पृष्ठभूमि में नए राजनीतिक विकल्पों और सामाजिक गठबंधनों की चर्चा तेज हुई है।
पूर्व मंत्री और उदयपुरवाटी के विधायक रह चुके राजेंद्र सिंह गुढ़ा इस बदलाव के प्रमुख चेहरों में माने जा रहे हैं। गुढ़ा पिछले एक दशक से मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों पर मुखर रहे हैं। चाहे सामाजिक विवाद हो, धार्मिक आयोजन में बाधा का मामला हो या स्थानीय स्तर पर किसी अन्याय का प्रश्न, गुढ़ा कई मौकों पर खुलकर मुस्लिम समुदाय के साथ खड़े दिखाई दिए हैं।
हाल ही में झुंझुनूं जिले के इस्लामपुर गांव का नाम बदलकर श्रीरामपुर करने की मांग को लेकर भी गुढ़ा ने विरोध दर्ज कराया। उन्होंने इस्लामपुर से झुंझुनूं कलेक्ट्रेट तक करीब 22 किलोमीटर लंबी पदयात्रा निकाली। इस यात्रा में बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया। राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे राजपूत और मुस्लिम समुदायों के बीच बढ़ती राजनीतिक नजदीकी के रूप में देख रहे हैं।

दूसरी ओर झुंझुनूं जिले के झाझड़ गांव के इंजीनियर महावीर सिंह शेखावत भी एक अलग सामाजिक और राजनीतिक मंच तैयार करने में जुटे हैं। कुरुक्षेत्र स्थित एनआईटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुके महावीर सिंह ने पिछले कुछ वर्षों में ‘सहभागी’ नामक संगठन के जरिए राजपूत और उनसे सामाजिक रूप से जुड़ी जातियों को एक मंच पर लाने की कोशिश की है।
शेखावाटी और नागौर क्षेत्र में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों ने इस पहल को नई पहचान दी है। सालासर में आयोजित राजपूत प्रतिनिधि सम्मेलन हो या दिल्ली में हुआ राजपूत सम्मेलन, इन आयोजनों में मुस्लिम प्रतिनिधियों की भागीदारी भी देखने को मिली। इससे राजनीतिक हलकों में नई चर्चाओं को बल मिला है।
चूरू जिले के ददरेवा गांव में आयोजित दादा नवाब कायम खां के शहादत दिवस समारोह में भी महावीर सिंह शेखावत के नेतृत्व में बड़ी संख्या में राजपूत समाज के लोगों ने भाग लिया। इसे भी सामाजिक समरसता और संभावित राजनीतिक सहयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जाट मुस्लिम गठबंधन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। नागौर क्षेत्र में यह समीकरण अब भी प्रभावी माना जाता है। पूर्व केंद्रीय मंत्री सुभाष महरिया की धर्मनिरपेक्ष छवि के कारण उन्हें आज भी मुस्लिम मतदाताओं का एक वर्ग समर्थन देता है।
फिलहाल राजस्थान की राजनीति में एक नया अध्याय लिखे जाने की संभावना दिखाई दे रही है। आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनाव यह तय करेंगे कि राजपूत मुस्लिम समीकरण केवल सामाजिक स्तर तक सीमित रहता है या फिर यह एक मजबूत राजनीतिक गठबंधन के रूप में उभरता है।

