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मक्का की यादों से उपजा उपन्यास: हदील अल-शुबैली का नया शाहकार

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, रियाद।

दुनिया भर के लेखक मानवीय संवेदनाओं को समझने के लिए अक्सर लंबी यात्राएं करते हैं। हालांकि सऊदी अरब की मशहूर उपन्यासकार हदील अल-शुबैली को अपनी कहानियों के किरदार खोजने कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ी। पवित्र शहर मक्का में बीत बचपन और तीर्थयात्रियों के साथ हुई दैनिक मुलाकातों ने उनके जीवन को गहराई से प्रभावित किया। इन्हीं अनुभवों को आधार बनाकर उन्होंने अपना नया अरबी उपन्यास लिखा है। इस पुस्तक का शीर्षक है “फॉर ईच ऑफ अस, एन इस्माइल”।

सऊदी लेखिका हदील अल-शुबैली का मानना है कि मक्का में रहने वाले इंसान के अंदर निस्वार्थ सेवा का भाव अपने आप आ जाता है। वहां का हर अनुभव ईश्वर से जुड़ने का जरिया बन जाता है। अपने लेखन और नए उपन्यास के बारे में बात करते हुए अल-शुबैली ने अरब न्यूज को बताया कि पवित्र शहर की आबोहवा ही इंसान को बिना शर्त दूसरों की मदद करना सिखाती है। मक्का एक ऐसी जगह है जहां पूरी दुनिया खुद चलकर आपके पास आती है। आपको दुनिया को जानने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं पड़ती।

मस्जिद अल-हरम परिसर में बिताया डेढ़ साल

हदील अल-शुबैली अपने इस नए उपन्यास की रचना प्रक्रिया को बेहद खास मानती हैं। उन्होंने लगभग डेढ़ साल का वक्त मस्जिद अल-हरम परिसर के भीतर रहकर लिखने में बिताया। वहां आने वाले दुनिया भर के मुसलमानों की कहानियों और जीवन के उतार-चढ़ाव को उन्होंने काफी करीब से देखा। तवाफ करते लोगों की खुशियां, उनका दर्द, दुआएं और रोना सब कुछ उन्होंने अपनी आंखों से महसूस किया।

इस पूरे अनुभव को उन्होंने अपनी इस नई किताब में साहित्यिक और कलात्मक रूप में पिरोया है। यह कहानी मुख्य रूप से ‘इस्माइल’ नाम के एक काल्पनिक किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है। इस्माइल मक्का की गलियों में अपनी पहचान और अपने नाम का असली मकसद तलाश कर रहा है। वह यात्रा के दौरान अनेक संस्कृतियों के लोगों से मिलता है। हर व्यक्ति के साथ हुई छोटी-सी बातचीत उसके जीवन पर एक गहरा असर छोड़ जाती है। हर जगह उसके सामने एक नया सवाल खड़ा करती है।

धीरे-धीरे इस्माइल को समझ आता है कि जीवन की असली तलाश बाहर की दुनिया में भटकना नहीं है। असली यात्रा अपने भीतर उतरना है। इंसान का स्वभाव और व्यक्तित्व जीवन में मिलने वाले अनुभवों तथा खास पलों से ही गढ़ा जाता है।

बचपन का एक वाक्य जिसने बदल दी पूरी सोच

हदील अल-शुबैली बताती हैं कि मक्का में उनका बचपन बहुत सामान्य और रूहानी माहौल में बीता। उनके घर के माहौल ने ही उनके लेखन को तराशा है। तीर्थयात्रियों के बीच बड़े होना और रोजाना हरम जाना उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का सामान्य हिस्सा था।

अपने बचपन की एक खास घटना को याद करते हुए उन्होंने बताया कि जब वह चौथी कक्षा में पढ़ती थीं, तो एक दिन स्कूल खत्म होने के बाद वह आइसक्रीम खरीदने गईं। मक्का की प्रसिद्ध दुकान ‘अल-असेमा’ से उन्होंने आइसक्रीम ली। मक्का में उमराह करने के बाद इस दुकान से आइसक्रीम खाना एक बेहद लोकप्रिय परंपरा माना जाता है।

जब वह हाथ में आइसक्रीम लिए खड़ी थीं, तभी अचानक मस्जिद अल-हरम से जनाजे की अज़ान सुनाई दी। एक हाथ में आइसक्रीम पकड़े छोटी बच्ची ने दूसरे हाथ से मय्यित के लिए दुआ मांगी। जीवन और मृत्यु का यह दोहरा अनुभव उसी क्षण उनके दिल में बैठ गया। इसने उन्हें समझाया कि जीवन में खुशियों के साथ-साथ दूसरों के दुख में शरीक होना कितना जरूरी है। इसी घटना ने उनके भीतर जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का भाव भरा।

रियाद के सार्ड सांस्कृतिक केंद्र में कला प्रदर्शनी

अपने शब्दों को सिर्फ किताबों तक सीमित न रखकर हदील अल-शुबैली ने इसे एक बहु-संवेदी अनुभव में बदल दिया है। इसके लिए उन्होंने प्रसिद्ध अरबी सुलेखक और समकालीन कलाकार बायन बारबौड के साथ हाथ मिलाया है। दोनों ने मिलकर रियाद स्थित सार्ड कल्चरल सेंटर में एक खास कला प्रदर्शनी का आयोजन किया है।

यह प्रदर्शनी सिर्फ पेंटिंग्स का संग्रह नहीं है। यहां आवाजों, रोशनी, रंगों और दृश्यों के माध्यम से उपन्यास की आत्मा को जीवित किया गया है। सुलेखक बायन बारबौड ने इससे पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक्सपो जापान में सऊदी अरब का प्रतिनिधित्व किया है। उन्होंने सऊदी अरब में कई प्रसिद्ध सांस्कृतिक प्रदर्शनियों में अपनी कला का जौहर दिखाया है।

बारबौड बताती हैं कि यह प्रदर्शनी उपन्यास की कहानी को एक अमूर्त और आधुनिक तरीके से बयां करती है। प्रदर्शनी में प्रवेश करते ही दर्शक कहानी का हिस्सा बन जाते हैं। वहां की दीवारें, उस पर लिखे टेक्स्ट, रंग, आकार और बीच-बीच में लगाए गए शीशे सीधे इस्माइल की कहानी को दर्शक के अपने जीवन से जोड़ते हैं। शीशे में इंसान खुद को देखकर समझ पाता है कि कहीं न कहीं हम सब भी इस्माइल ही हैं।

सबसे अनोखी बात यह है कि इस प्रदर्शनी के चित्रों को बनाने के लिए इस्तेमाल किए गए रंगों में आब-ए-ज़मज़म (पवित्र ज़मज़म का पानी) मिलाया गया है। यह उपन्यास के मूल विचार और आस्था को सीधे कलाकृतियों से जोड़ता है।

मक्का आने वाले हर इंसान के लिए खास संदेश

लेखिका हदील अल-शुबैली का कहना है कि पवित्र शहर मक्का में बिताया हर पल इंसान को बदल सकता है। जो भी इंसान मक्का आए, उमराह या हज करे, उसे वहां केवल घूमने के मकसद से नहीं आना चाहिए। उसे मक्का के हर मोड़, हर चेहरे और हर घटना को बहुत ध्यान से देखना चाहिए।

मक्का में दो तरह के लोग होते हैं। एक वे जो केवल देखते हैं, और दूसरे वे जो हर बात के पीछे छुपे गहरे अर्थ को महसूस करते हैं। हरम का हर कोना मानवीय रिश्तों, सामाजिक अनुभवों और आस्था की अनगिनत मिसालों से भरा पड़ा है। अगर कोई व्यक्ति वहां के अनुभवों को गहराई से आत्मसात करे, तो उसका पूरा व्यक्तित्व हमेशा के लिए बदल सकता है। यह नया उपन्यास इसी सोच को दुनिया के सामने पेश करता है।

सऊदी उपन्यासकार हदील अल-शुबैली के उपन्यास ‘फॉर ईच ऑफ अस, एन इस्माइल’ में मुख्य किरदार इस्माइल की यात्रा केवल एक भौतिक सफर नहीं है, बल्कि यह पहचान, आत्म-खोज और जीवन के रूहानी दर्शन की एक सूक्ष्म खोज है।

इस्माइल की इस यात्रा और उसके जीवन दर्शन के मुख्य पहलू इस प्रकार हैं:

1. पहचान और अपने नाम की तलाश

इस्माइल की यात्रा की शुरुआत अपने वास्तविक नाम, जड़ों और पहचान की खोज से होती है। मक्का में रहते हुए वह दुनिया के कोने-कोने से आए तीर्थयात्रियों से मिलता है। हर संस्कृति और पृष्ठभूमि का व्यक्ति उसके सामने एक नया दृष्टिकोण रखता है, जिससे इस्माइल के मन में ‘मैं कौन हूँ?’ और ‘मेरा अस्तित्व क्या है?’ जैसे सवाल गहराई से पैदा होते हैं।

2. विविध मुलाकातों का प्रभाव

मक्का के पवित्र परिसर में तवाफ करते हुए लोग, उनकी अलग-अलग भाषाएँ, उनके सुख-दुख और जीवन की कहानियाँ इस्माइल पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। हर नई मुलाकात उसके जीवन में एक अमिट छाप छोड़ती है। वह समझता है कि दुनिया के अलग-अलग कोनों से आए इंसानों की कहानियाँ भले ही अलग हों, लेकिन उनकी भावनाएँ और रूहानी प्यास एक जैसी ही हैं।

3. बाह्य यात्रा से आंतरिक यात्रा की ओर (जीवन दर्शन)

उपन्यास का सबसे प्रमुख दर्शन यही है कि सच्ची खोज बाहर की दुनिया में भटकने से पूरी नहीं होती, बल्कि स्वयं के भीतर उतरने से होती है। इस्माइल को अहसास होता है कि:

  • व्यक्तित्व का निर्माण: इंसान का स्वभाव और अस्तित्व उसकी छोटी-बड़ी मुलाकातों, अनुभवों और जीवन के महत्वपूर्ण मोड़ों से गढ़ता है।
  • सार्वभौमिक संबंध: हर व्यक्ति के भीतर एक ‘इस्माइल’ छुपा है, जो जीवन के गहरे अर्थ और ईश्वर से अपने जुड़ाव को तलाश रहा है।

4. ‘प्रत्येक के भीतर एक इस्माइल’ का प्रतीक

उपन्यास का शीर्षक और इस्माइल का किरदार इस बात का प्रतीक है कि मक्का में आने वाला या जीवन के पथ पर चलने वाला हर इंसान किसी न किसी रूप में इस्माइल ही है। वह सब कुछ समर्पित करके सच्चाई, शांति और अपनी आत्मा की पहचान की तलाश में लगा हुआ है।

रियाद के सार्ड सांस्कृतिक केंद्र (Sard Cultural Center) में आयोजित ‘फॉर ईच ऑफ अस, एन इस्माइल’ (For Each of Us, an Ismail) प्रदर्शनी केवल पेंटिंग्स या चित्रों का संग्रह नहीं है। यह हदील अल-शुबैली के उपन्यास के विचारों को एक बहु-संवेदी और जीवंत रूहानी अनुभव में बदलने की एक अनूठी कोशिश है।

इस प्रदर्शनी को जीवंत बनाने के लिए लेखिका हदील अल-शुबैली ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त समकालीन अरबी सुलेखक (Calligrapher) बायन बारबौड (Bayan Barboud) के साथ साझेदारी की है।

इस प्रदर्शनी के प्रमुख कलात्मक और दार्शनिक तत्व इस प्रकार हैं:

1. अमूर्त और अवधारणात्मक कला (Conceptual & Abstract Installation) प्रदर्शनी को पारंपरिक तस्वीरों के बजाय एक ‘कॉन्सेप्टुअल आर्ट इंस्टालेशन’ के रूप में तैयार किया गया है। यहाँ दर्शक केवल कला को दूर से देखते नहीं हैं, बल्कि उसके भीतर से होकर गुजरते हैं। प्रदर्शनी का हर रंग, आकार और रोशनी उपन्यास के मुख्य किरदार ‘इस्माइल’ की आत्म-खोज और उसकी रूहानी यात्रा का प्रतिनिधित्व करता है।

2. पवित्र जमजम पानी का कलात्मक प्रयोग प्रदर्शनी का सबसे अनूठा और गहरा कलात्मक पहलू यह है कि इसमें इस्तेमाल किए गए रंगों को घोलने के लिए आब-ए-ज़मज़म (पवित्र ज़मज़म का पानी) का उपयोग किया गया है। यह प्रयोग कलाकृतियों को सीधे मक्का की रूहानी आबोहवा, आस्था और उपन्यास की आत्मा से जोड़ता है।

3. दर्पण और पाठ (Text and Mirrors) का अद्भुत संगम स्थापत्य कला (Installation) के बीच-बीच में शीशे (Mirrors) और अरबी सुलेख के पाठ (Text) इस तरह लगाए गए हैं कि जब दर्शक उनके सामने से गुजरते हैं, तो उन्हें शीशे में अपनी ही छवि दिखाई देती है।

  • इसका दार्शनिक संदेश: यह दर्शक को यह अहसास कराता है कि उपन्यास का किरदार ‘इस्माइल’ कोई अलग व्यक्ति नहीं है, बल्कि हर इंसान के भीतर अपना एक ‘इस्माइल’ मौजूद है जो जीवन का अर्थ तलाश रहा है।

4. ध्वनि और दृश्यों का बहु-संवेदी माहौल (Multi-Sensory Experience) प्रदर्शनी में कहानी कहने के साथ-साथ विशेष ध्वनि प्रभावों (Soundscapes) और रोशनी के खेल का उपयोग किया गया है। यह माहौल दर्शकों को मक्का की गलियों और मस्जिद अल-हरम में तीर्थयात्रियों के बीच होने का अहसास कराता है।

यह प्रदर्शनी अरबी सुलेख (Calligraphy) और आधुनिक समकालीन कला के मेल से साहित्य को एक नया आयाम देती है, जहाँ एक किताब का पाठ एक जीवंत महसूस किए जाने वाले अनुभव में बदल जाता है।

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