अमीर मुत्तकी की भारत यात्रा: Diplomacy, Development, Dialogue और Deoband
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तालिबान विदेश मंत्री की देवबंद यात्रा: धार्मिक प्रतीक या रणनीतिक संदेश?
मुस्लिम नाउ विशेष
इन दिनों जब तालिबान के विदेश मंत्री अमीर ख़ान मुत्तक़ी भारत के छह दिन के दौरे पर हैं, उनका दारुल उलूम देवबंद जाना देश में बड़ी चर्चा का विषय बन गया है। सोशल मीडिया पर इसको लेकर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। इसी बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का एक पुराना वीडियो भी फिर से वायरल हुआ है, जिसमें वे कहते दिख रहे हैं—
“पाकिस्तान कभी भारत का सच्चा दोस्त नहीं हो सकता। वह केवल दुश्मन का दुश्मन रह सकता है। लेकिन तालिबान से भारत को कोई सीधा खतरा नहीं है।”
इस पूरी बहस के बीच, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) की सुरक्षा और रणनीति विशेषज्ञ सौम्या अवस्थी का एक विश्लेषण भी सामने आया है, जिसमें उन्होंने सवाल उठाया है—क्या मुत्तक़ी का भारत दौरा और देवबंद जाना भारत की किसी गहरी रणनीति का हिस्सा है? क्या भारत, अफगानिस्तान से अपने पुराने धार्मिक और सांस्कृतिक रिश्तों को फिर से मज़बूत करने की कोशिश कर रहा है?
भारत-अफगान रिश्तों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत और अफगानिस्तान के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध बहुत पुराने हैं, और इनमें देवबंद की भूमिका खास रही है।
1866 में स्थापित दारुल उलूम देवबंद दक्षिण एशिया का एक प्रमुख इस्लामी शिक्षाकेंद्र है, जिसे मिस्र के अल-अज़हर विश्वविद्यालय के बाद सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
देवबंद के संस्थापक मौलाना मुहम्मद कासिम नानौतवी और राशिद अहमद गंगोही ने इस संस्थान को ऐसे केंद्र के रूप में बनाया जो धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ औपनिवेशिक शासन के खिलाफ बौद्धिक प्रतिरोध का प्रतीक बने।
रेशमी पत्र आंदोलन (1913–1920) के दौरान देवबंद के उलेमा ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अफगानिस्तान, ओटोमन साम्राज्य और जर्मनी से संपर्क साधने की कोशिश की। यह भारत-अफगान संबंधों में धार्मिक और राजनीतिक साझेदारी की नींव थी।
अफगान छात्र और देवबंद की परंपरा
उन्नीसवीं सदी से लेकर बीसवीं सदी के मध्य तक, कई अफगान छात्र देवबंद में पढ़ने आए। बाद में उन्होंने काबुल, कंधार और खोस्त में देवबंद की शिक्षण शैली पर आधारित मदरसे खोले।
इससे अफगान समाज में देवबंदी विचारधारा का प्रभाव बढ़ा—जिसकी पहचान थी सादगी, अनुशासन और ज्ञान के प्रति समर्पण।
भारत की आज़ादी और पाकिस्तान बनने के बाद अफगान छात्रों की संख्या घटी, लेकिन देवबंद से उनका रिश्ता खत्म नहीं हुआ। 1950 से 1970 के दशक तक यह संपर्क जारी रहा।
देवबंदी विचारधारा का रूपांतरण
1979 में सोवियत हमले के बाद जब अफगानिस्तान में संघर्ष शुरू हुआ, तो लाखों अफगान पाकिस्तान चले गए।
वहीं पाकिस्तान में दारुल उलूम हक्कानिया (अकोरा खट्टक) जैसे मदरसे उभरे, जिन्होंने देवबंदी परंपरा को राजनीतिक और जिहादी दिशा दे दी।
देवबंद की मूल शिक्षाओं — अध्ययन, नैतिकता और संयम — की जगह वहाँ कट्टरपंथ और हिंसक जिहाद की सोच ने ले ली।
1990 के दशक में तालिबान आंदोलन ने देवबंद के नाम और प्रतीकों का इस्तेमाल किया, लेकिन उसकी बौद्धिक परंपरा को नहीं अपनाया।
इस तरह भारतीय देवबंदी विचारधारा का रूप विकृत रूप में पाकिस्तान की ज़मीन पर बदल गया।
मुत्तक़ी की देवबंद यात्रा का अर्थ
अमीर ख़ान मुत्तक़ी का देवबंद जाना प्रतीकात्मक से कहीं ज़्यादा रणनीतिक है।
यह पहली बार है जब तालिबान का कोई वरिष्ठ नेता उस स्रोत से जुड़ने आया है, जिससे उनकी वैचारिक जड़ें निकली हैं।
दरअसल, तालिबान अपने आप को अब पाकिस्तान के देवबंदी नेटवर्क से अलग दिखाना चाहता है। देवबंद से जुड़कर वे अपनी धार्मिक वैधता को एक “विद्वान इस्लामी आंदोलन” की तरह पेश करना चाहते हैं, न कि “उग्रवादी शासन” की तरह।
यह कदम तालिबान के लिए पाकिस्तान के प्रभाव से दूरी बनाने की कोशिश भी है।
भारत के लिए इसका मतलब क्या है?
भारत के लिए यह यात्रा एक कूटनीतिक अवसर है।
नई दिल्ली लंबे समय से मानती रही है कि अफगानिस्तान की स्थिरता भारत के हित में है।
अब वह “धार्मिक कूटनीति (Religious Diplomacy)” के माध्यम से तालिबान से जुड़ने की कोशिश कर सकता है—ऐसे जुड़ाव के लिए राजनीतिक मान्यता देना ज़रूरी नहीं।
देवबंद की परंपरा पर भारत का ऐतिहासिक नेतृत्व उसे बौद्धिक और सांस्कृतिक बढ़त देता है।
भारत यदि अपने विद्वानों के माध्यम से इस्लाम में शांति, संयम और सह-अस्तित्व की मूल भावना को दोबारा सामने लाता है, तो वह अफगान धार्मिक सोच पर सकारात्मक असर डाल सकता है।
सौम्या अवस्थी ने इसे “4 डी फ़्रेमवर्क – Diplomacy, Development, Dialogue और Deoband” कहा है — यानी कूटनीति, विकास, संवाद और देवबंद के जरिये जुड़ाव।
देवबंद बनाम हक्कानिया: वैचारिक संघर्ष
पाकिस्तान का हक्कानिया मदरसा तालिबान की राजनीतिक सोच पर हावी रहा है, लेकिन उसकी छवि कट्टरपंथ से जुड़ी है।
वहीं भारत का देवबंद वैचारिक और आध्यात्मिक प्रामाणिकता का प्रतीक माना जाता है।
इसलिए तालिबान देवबंद से जुड़कर खुद को “स्थानीय इस्लामी विरासत के रक्षक” के रूप में दिखाना चाहता है, न कि अंतरराष्ट्रीय जिहाद के एजेंट के रूप में।
निष्कर्ष: प्रतीक नहीं, अवसर का क्षण
मुत्तक़ी की देवबंद यात्रा केवल एक धार्मिक औपचारिकता नहीं है।
यह एक ऐसा क्षण है जो या तो पुराने मतभेदों को गहरा कर सकता है, या नए रिश्तों की शुरुआत कर सकता है।
अगर भारत इस मौके का उपयोग समझदारी से करे, तो वह अपनी साझा इस्लामी और सांस्कृतिक विरासत को क्षेत्रीय स्थिरता का साधन बना सकता है।

