Religion

संत प्रेमानंद महाराज के लिए मदीना में मांगी दुआ, वृंदावन तक पहुँचा इंसानियत का पैगाम

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

मदीना की पाक सरज़मीं से भारत तक एक दुआ ने सबका दिल छू लिया। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से ताल्लुक रखने वाले एक मुस्लिम युवक अब्दुल रहीम ने मदीना में खड़े होकर वृंदावन के संत प्रेमानंद जी महाराज की सेहत के लिए अल्लाह से दुआ मांगी। उनका यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और देखते ही देखते यह सिर्फ एक दुआ नहीं, बल्कि भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल बन गया।

रहीम ने कहा,

“मैं भारत से हूं, प्रेमानंद जी को पसंद करता हूं। वह एक अच्छे इंसान हैं। मैं उस धरती से हूं जहां गंगा और यमुना साथ बहती हैं।”

“धर्म नहीं, इंसानियत सबसे बड़ा रिश्ता है”

वीडियो में अब्दुल रहीम हाथ उठाकर अल्लाह से प्रार्थना करते हैं कि प्रेमानंद महाराज जल्द स्वस्थ हों और अपने अनुयायियों का मार्गदर्शन करते रहें। उन्होंने कहा,

“महाराज सिर्फ हिंदुओं के नहीं, बल्कि पूरे देश के आध्यात्मिक गुरु हैं। उन्होंने हमेशा इंसानियत की बात की, इसलिए उनके लिए दुआ करना मेरा फर्ज़ है।”

सोशल मीडिया पर लोग इस वीडियो को “भारत की असली तस्वीर” बता रहे हैं। एक यूज़र ने लिखा:

“जब मदीना से कोई वृंदावन के संत के लिए दुआ करता है, तब समझ आता है कि धर्मों से ऊपर भी एक रिश्ता है — इंसानियत का।


संत प्रेमानंद महाराज: एक आवाज़ जो जोड़ती है, तोड़ती नहीं

वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद जी महाराज इन दिनों किडनी की बीमारी से जूझ रहे हैं। उनके स्वास्थ्य को लेकर देशभर में चिंताएं हैं, लेकिन उनके लिए प्रार्थनाएं केवल मंदिरों में नहीं, मस्जिदों, चर्चों और गुरुद्वारों तक में हो रही हैं।

जब संत बोले — “नमाज़ पढ़ने वाले का दिल भी पाक होता है”

प्रेमानंद जी ने हमेशा धर्मों के बीच पुल बनाने की कोशिश की। एक बार उन्होंने अपने प्रवचन में कहा था:

“अगर कोई सड़क पर नमाज़ पढ़ता है, तो उसकी नीयत अल्लाह से जुड़ने की है। जैसे मंदिरों की आरती की आवाज़ें ईश्वर तक जाती हैं, वैसे ही नमाज़ की सच्ची पुकार भी ऊपर जाती है।”

उनकी इस सोच ने उन्हें सिर्फ हिंदुओं में नहीं, बल्कि मुसलमानों के बीच भी आदर दिलाया।


अनेकता में एकता का जीवंत उदाहरण

कुछ महीने पहले, मध्य प्रदेश के एक मुस्लिम युवक आरिफ़ खान चिश्ती ने भी प्रेमानंद महाराज को अपनी किडनी दान करने की पेशकश की थी। उन्होंने कहा था:

“महाराज जी ने ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और अमीर खुसरो का सम्मान किया। यही वो भाईचारा है जो आज ज़रूरी है।”


भारत की आत्मा आज भी ज़िंदा है

दिल्ली की सीमा शर्मा ने सोशल मीडिया पर लिखा:

“मदीना से उठी एक दुआ ने आज पूरे भारत के लिए अमन की प्रार्थना बन गई। यही है मेरा भारत।”

एक और यूज़र ने लिखा:

“प्रेमानंद जी ने जो सिखाया—‘इंसानियत पहले, धर्म बाद में’—वो आज मदीना की धरती पर साकार हुआ।”


जब दिल मिले, तो दुआएं एक ही दिशा में जाती हैं

प्रेमानंद जी महाराज ने हमेशा कहा था:

“राम और रहमान में फर्क सिर्फ ज़बान का है, भावना का नहीं।”

आज उनकी ये बातें मदीना से वृंदावन तक, मस्जिद से मंदिर तक गूंज रही हैं।


निष्कर्ष: एक भारत, एक भाव—इंसानियत

चाहे वो वृंदावन की गली हो या मदीना की मस्जिद, जब दिलों में मोहब्बत हो, तो दुआएं बिना दीवार के आसमान तक जाती हैं। संत प्रेमानंद महाराज के लिए उठी यह दुआ, भारत की उसी रूहानी शक्ति की याद दिलाती है जो कहती है:

“धर्म अलग हो सकते हैं, पर दुआएं एक ही ख़ुदा तक पहुंचती हैं।”