एएमयू में मजलिस-ए-शहादत का आयोजन: हज़रत इमाम अली की शहादत को याद करते हुए छात्रों और विद्वानों ने लिया उनके आदर्शों से प्रेरणा
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, अलीगढ़
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में हज़रत इमाम अली (अ.स.) की शहादत की याद में आयोजित मजलिस-ए-शहादत का कार्यक्रम गहरी श्रद्धा, आध्यात्मिकता और चिंतन के माहौल में संपन्न हुआ। एएमयू की अली सोसायटी की ओर से विश्वविद्यालय परिसर स्थित बैतुस्सलात में आयोजित इस वार्षिक कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्र, शिक्षकों और स्थानीय समुदाय के लोगों ने भाग लिया।
यह कार्यक्रम हर वर्ष रमज़ान के अंतिम अशरे में आयोजित किया जाता है, जब दुनिया भर के मुसलमान इस्लाम के चौथे खलीफा और पैग़म्बर इस्लाम हज़रत मुहम्मद (स.) के दामाद हज़रत इमाम अली (अ.स.) की शहादत को याद करते हैं। इस मौके पर एएमयू परिसर में आयोजित मजलिस में लोगों ने इमाम अली की शिक्षाओं, उनके चरित्र और इंसाफ व इंसानियत के लिए उनके संघर्ष को याद किया।
सलाम और मर्सिया से हुआ कार्यक्रम का आगाज़
कार्यक्रम की शुरुआत काशिफ नक़वी द्वारा पेश किए गए सलाम से हुई, जिसमें इमाम अली (अ.स.) के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त किया गया। इसके बाद मशहूर मर्सिया-ख़्वां उस्ताद हसन अली ने मर्सिया पेश किया। उनके भावपूर्ण अंदाज़ और दर्दभरी आवाज़ ने पूरे माहौल को शोक और श्रद्धा से भर दिया।
मर्सिया की पंक्तियों ने इमाम अली की शहादत और उनके जीवन की महानता को याद दिलाया। उपस्थित लोगों ने गहरी तल्लीनता के साथ इस प्रस्तुति को सुना और कई लोगों की आंखें नम हो गईं।
इमाम अली के आदर्शों पर प्रकाश
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के रूप में प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान और लखनऊ स्थित मदरसा-तुल-वाएज़ीन के प्रधानाचार्य मौलाना एस. उरुजुल हसन मीसम रिज़वी करारवी ने अपने संबोधन में हज़रत इमाम अली के जीवन और उनके आदर्शों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि इमाम अली का जीवन केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक दृष्टि से भी पूरी मानवता के लिए मार्गदर्शक है। उन्होंने कहा कि इमाम अली ने अपने जीवन में तौहीद (एकेश्वरवाद), सच्चाई, न्याय और इबादत में निष्ठा का जो आदर्श प्रस्तुत किया, वह आज भी समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
मौलाना करारवी ने कहा कि इमाम अली का चरित्र हमें यह सिखाता है कि सत्ता और ताकत का असली उद्देश्य इंसाफ और समाज की भलाई होना चाहिए। उन्होंने कहा कि इमाम अली ने अपने शासनकाल में न्याय और समानता को सर्वोच्च महत्व दिया और हमेशा कमजोरों तथा जरूरतमंदों के अधिकारों की रक्षा की।

एएमयू की परंपराओं की सराहना
अपने भाषण में मौलाना करारवी ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की सराहना करते हुए कहा कि यह संस्थान लंबे समय से ऐसी परंपराओं को जीवित रखे हुए है जो सामाजिक सौहार्द और धार्मिक समझ को बढ़ावा देती हैं।
उन्होंने कहा कि एएमयू में मनाया जाने वाला “अली डे” और मजलिस-ए-शहादत जैसे कार्यक्रम न केवल धार्मिक श्रद्धा के प्रतीक हैं बल्कि यह विभिन्न समुदायों के बीच संवाद और आपसी समझ को भी मजबूत करते हैं।
उनके अनुसार ऐसे आयोजन युवाओं को इतिहास और आध्यात्मिक मूल्यों से जोड़ते हैं और उन्हें समाज में सकारात्मक भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करते हैं।
नोहे के साथ संपन्न हुआ कार्यक्रम
कार्यक्रम के अंत में मोहम्मद अख्तर ने नोहा पेश किया। उनकी भावपूर्ण आवाज़ और शब्दों ने कार्यक्रम के माहौल को और अधिक भावुक बना दिया। नोहा सुनते हुए कई लोग गहरी भावनाओं में डूबे दिखाई दिए और इमाम अली की शहादत को याद करते हुए दुआएं की गईं।
नोहा के साथ ही कार्यक्रम का समापन हुआ, लेकिन उपस्थित लोगों के मन में इमाम अली के आदर्शों और शिक्षाओं की छाप गहराई से अंकित हो गई।
विश्वविद्यालय प्रशासन का सहयोग
यह कार्यक्रम अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर नायमा खातून के मार्गदर्शन में आयोजित किया गया। अली सोसायटी के अध्यक्ष प्रोफेसर मज़हर अब्बास के नेतृत्व में इस आयोजन को सफल बनाने के लिए सोसायटी के सदस्यों और विश्वविद्यालय के छात्रों ने सक्रिय भूमिका निभाई।
आयोजकों ने बताया कि मजलिस-ए-शहादत केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह इमाम अली के संदेश—न्याय, सत्य और मानवता—को समाज तक पहुंचाने का माध्यम भी है।
युवाओं के लिए प्रेरणा
कार्यक्रम में मौजूद कई छात्रों ने कहा कि ऐसे आयोजन उन्हें इस्लामी इतिहास और महान व्यक्तित्वों की शिक्षाओं को समझने का अवसर देते हैं। उनका मानना था कि इमाम अली का जीवन युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में सादगी, न्याय और सेवा को सर्वोच्च स्थान दिया।
इस तरह एएमयू में आयोजित यह मजलिस-ए-शहादत न केवल एक धार्मिक श्रद्धांजलि थी, बल्कि यह एक ऐसा मंच भी साबित हुआ जहां से इमाम अली के आदर्शों और मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश दिया गया।

