कश्मीर के स्कूलों में समावेशी क्रांति: दिव्यांग बच्चों के सपनों को मिले नए पंख
श्रीनगर/बडगाम:
जम्मू-कश्मीर के शांत पहाड़ों और वादियों के बीच शिक्षा के क्षेत्र में एक शांत लेकिन बेहद शक्तिशाली बदलाव की लहर चल रही है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के ‘समावेशी और न्यायसंगत शिक्षा’ के विजन को धरातल पर उतारते हुए, केंद्र शासित प्रदेश के स्कूल अब हर बच्चे की विशिष्ट जरूरतों के अनुसार खुद को ढाल रहे हैं।
इस बदलाव की सबसे सुंदर तस्वीर बडगाम जिले के गवर्नमेंट मिडिल स्कूल, डांगेरपोरा में देखने को मिलती है। यहाँ स्थापित ‘रिसोर्स सेंटर’ केवल एक कमरा नहीं, बल्कि विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (CwSN) के लिए उम्मीदों की एक नई खिड़की बन गया है।
कौशल विकास पर केंद्रित विशेष पहल
इस केंद्र में दिव्यांग बच्चों को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रखा जाता, बल्कि उन्हें वैज्ञानिक रूप से डिजाइन की गई गतिविधियों में व्यस्त रखा जाता है। इन गतिविधियों का मुख्य उद्देश्य बच्चों में निम्नलिखित कौशलों का विकास करना है:

- मोटर स्किल्स (शारीरिक कौशल): सूक्ष्म गतिविधियों के माध्यम से बच्चों के हाथों और आंखों के समन्वय को बेहतर बनाना।
- सेंसरी स्किल्स (संवेदी कौशल): स्पर्श, ध्वनि और दृश्य उत्तेजनाओं के जरिए उनकी सीखने की क्षमता को बढ़ाना।
- कम्युनिकेशन स्किल्स (संचार कौशल): आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखने और सामाजिक रूप से घुलने-मिलने के लिए प्रोत्साहित करना।
आत्मविश्वास और सक्रिय भागीदारी
पत्रकारिता के नजरिए से देखें तो यह हस्तक्षेप केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इन बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया है। स्कूल के शिक्षकों का मानना है कि इन गतिविधियों से बच्चों के भीतर एक नया आत्मविश्वास जागा है। जो बच्चे पहले कक्षा में बैठने से कतराते थे, वे अब सीखने की प्रक्रिया में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।
NEP 2020 का जमीनी प्रभाव
शिक्षा मंत्रालय (DoSEL) के मार्गदर्शन में, जम्मू-कश्मीर का स्कूल शिक्षा विभाग यह सुनिश्चित कर रहा है कि कोई भी बच्चा पीछे न छूटे। डांगेरपोरा का यह मॉडल यह साबित करता है कि यदि सही संसाधन और सहानुभूतिपूर्ण वातावरण मिले, तो हर बच्चा अपनी बाधाओं को पार कर सकता है।
यह पहल न केवल एक स्कूल की सफलता है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक संदेश है कि समावेशी शिक्षा ही भविष्य की नींव है। आज बडगाम के इस स्कूल से निकलने वाली बच्चों की हंसी इस बात की गवाह है कि कश्मीर का शैक्षिक परिदृश्य एक उज्ज्वल और समावेशी कल की ओर कदम बढ़ा चुका है।

