ईरान विरोध या आस्था पर चोट? गुजरात के मौलाना हसन अली रजानी के बयान से शिया समुदाय में उबाल, ‘फतवे’ तक पहुंचा विवाद
Table of Contents
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
भारतीय शिया नेतृत्व के बीच एक बड़ा धार्मिक और राजनीतिक टकराव पैदा हो गया है। विवाद के केंद्र में हैं गुजरात के स्वयंभू शिया नेता मौलाना हसन अली रजानी। रजानी अपने ईरान विरोधी बयानों के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में एक यूट्यूब इंटरव्यू में उन्होंने भारतीय शिया मुसलमानों को लेकर विवादित टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान के शिया ईरान के ‘पिछलग्गू’ हैं और एक-एक हजार रुपये के लिए पलते हैं।
इस बयान ने उस वक्त आग पकड़ ली जब ईरान पर इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमले हो रहे हैं। इन हमलों में ईरान के एक स्कूल की करीब 180 बच्चियों की मौत की खबर है। इस दुखद घड़ी में जहां भारत के शिया और सुन्नी मुसलमान एकजुट होकर इजरायल की मुखालफत कर रहे हैं, वहीं रजानी के बयान ने समुदाय को गहरे जख्म दिए हैं।
विरोध प्रदर्शनों को बताया ‘पेड स्टंट’
मौलाना रजानी ने लखनऊ से अहमदाबाद तक की अपनी यात्रा के दौरान कई जगह सार्वजनिक स्टैंड लिया। उन्होंने भारत में ईरान के समर्थन में हो रहे प्रदर्शनों को “विदेशी असर से प्रेरित” और “पेड स्टंट” करार दिया। उन्होंने दावा किया कि ये प्रदर्शन आर्थिक लाभ के लिए किए जा रहे हैं।
रजानी का तर्क है कि मुसलमान होने की एकमात्र शर्त खुदा और उसके रसूल पर भरोसा है। उनके मुताबिक, ईरान के राजनीतिक या धार्मिक नेतृत्व में विश्वास करना इस्लाम की अनिवार्य शर्त नहीं है। उन्होंने कुछ विदेशी विद्वानों पर भी आरोप लगाया कि वे भारतीय शिया चैरिटी का फायदा उठाकर स्थानीय समुदाय को भ्रष्ट कर रहे हैं।
हत्या के कथित फतवे से सनसनी
विवाद इतना बढ़ गया है कि अब जान से मारने की धमकियों और फतवों की खबरें आने लगी हैं। गुजरात के शिया हलकों से जारी एक बयान के अनुसार, शिया उलेमा-ए-हिंद के जनरल सेक्रेटरी मौलाना सैयद अली हुसैन कोमी ने कथित तौर पर मौलाना हसन अली रजानी के खिलाफ “जरूरी हत्या” का फतवा जारी किया है।
मौलाना कोमी का मानना है कि रजानी द्वारा ईरानी प्रभाव की आलोचना करना “तकफीरी” सोच का हिस्सा है। कोमी के अनुसार, दुनिया भर के मुसलमान ईरान में विश्वास रखते हैं और इसका विरोध करना किसी को काफिर बनाने जैसा है। हालांकि, ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड (AISLB) के वाइस प्रेसिडेंट होने का दावा करने वाले रजानी को लेकर कोमी ने यह भी कहा कि वह नहीं जानते कि यह शख्स कौन है।
दिग्गज नेताओं के बीच जुबानी जंग
यह विवाद केवल छोटे स्तर तक सीमित नहीं रहा। इसमें शिया समुदाय के बड़े नाम भी कूद पड़े हैं। मौलाना रजानी ने शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता मौलाना यासूब अब्बास के बयानों की भी कड़ी आलोचना की। बदले में यासूब अब्बास ने रजानी को पहचानने से ही इनकार कर दिया।
इस पर पलटवार करते हुए रजानी ने चौथे इमाम के शायर ‘फरजदक’ के मशहूर कसीदे का जिक्र किया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि मौलाना यासूब अब्बास कल को यह भी दावा कर सकते हैं कि वे अपने पिता, मरहूम मौलाना मिर्जा मोहम्मद अतहर को भी नहीं जानते। रजानी ने यह भी साफ किया कि मौलाना यासूब अब्बास उनके ससुर लगते हैं, फिर भी वे उनके विचारों से सहमत नहीं हैं।
समुदाय में गहरी नाराजगी
भारत का आम शिया मुसलमान इस वक्त ईरान के साथ खड़ा महसूस कर रहा है। सदियों पुराने सांस्कृतिक और धार्मिक रिश्तों के कारण ईरान के प्रति यहां गहरी संवेदनाएं हैं। ऐसे में रजानी द्वारा प्रदर्शनकारियों को ‘बिकाऊ’ कहना लोगों को नागवार गुजर रहा है। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर बहस छिड़ी हुई है।
जानकारों का मानना है कि यह विवाद भारतीय शिया राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। एक तरफ वे लोग हैं जो ईरान को शिया दुनिया का केंद्र मानकर उसके प्रति पूरी वफादारी रखते हैं। दूसरी तरफ रजानी जैसे लोग हैं जो भारतीय शिया पहचान को ईरानी प्रभाव से अलग करने की वकालत कर रहे हैं, भले ही उनका तरीका विवादास्पद हो।
फिलहाल, इस वैचारिक और धार्मिक युद्ध ने शिया नेतृत्व के भीतर की दरारों को पूरी तरह उजागर कर दिया है। हत्या के कथित फतवे की खबर ने सुरक्षा एजेंसियों को भी सतर्क कर दिया है।

