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Assam Muslims Success Story : बाढ़ को अवसर बना गए नजरुल हक

मुस्लिम नाउ विशेष

असम में हर साल आने वाली बाढ़ कई परिवारों के लिए मुसीबत बनती है। खेत डूब जाते हैं। फसलें बर्बाद हो जाती हैं। लोग रोज़गार के लिए संघर्ष करते हैं। लेकिन कुछ लोग मुश्किलों में भी रास्ता खोज लेते हैं। दक्षिणी असम के श्रीभूमि जिले के एक छोटे से गांव अलेखरगुल के रहने वाले नजरुल हक ने वही किया। उन्होंने बाढ़ को अपनी मजबूरी नहीं बनने दिया। उसे अपनी ताकत बना लिया।

करीमगंज के बदरपुर शहर से करीब पांच किलोमीटर दूर बसे इस गांव में कभी रोज़गार के मौके बहुत कम थे। लोग खेती कर किसी तरह घर चलाते थे। नजरुल हक भी इसी रास्ते पर थे। परिवार आर्थिक रूप से मजबूत नहीं था। उनके पिता किसान थे। खेती ही घर की पहचान थी। लेकिन एक परेशानी हमेशा सामने खड़ी रहती थी। इलाके के खेत साल भर पानी में डूबे रहते थे। मेहनत के बाद भी मनचाहा परिणाम नहीं मिलता था।

नजरुल ने हालात को ध्यान से देखा। उन्होंने सोचा कि अगर जमीन खेती के लिए ठीक नहीं है, तो उसका कोई दूसरा इस्तेमाल क्यों न किया जाए। यहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई। उनके मन में मछली पालन का विचार आया। इलाके में पहले से मछली का अच्छा बाज़ार था। इसलिए उन्होंने जोखिम लेने का फैसला किया।

शुरुआत आसान नहीं थी। नजरुल ने सिर्फ 10 हजार रुपये का कर्ज लेकर मछली पालन शुरू किया। मेहनत की। ईमानदारी से काम किया। समय पर बैंक का कर्ज भी चुका दिया। यही छोटी शुरुआत आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।

वर्ष 2000 में उन्होंने मछली पालन को गंभीरता से अपनाया। फिर 2003 में राज्य सरकार की परियोजना के तहत बैंक से लोन मिला। शुरुआत में एक हेक्टेयर जमीन पर वह सिर्फ पांच से सात क्विंटल मछली का उत्पादन कर पाते थे। लेकिन धीरे धीरे मेहनत रंग लाई। आज नजरुल करीब 100 हेक्टेयर जमीन और लीज पर ली गई जमीन पर बड़े पैमाने पर मछली उत्पादन कर रहे हैं।

सबसे खास बात यह है कि नजरुल ने सिर्फ खुद को आत्मनिर्भर नहीं बनाया। उन्होंने अपने गांव की तस्वीर बदल दी। उनके प्रयास से गांव के लगभग 300 परिवार मछली पालन से जुड़ गए। जो लोग कभी खेती की सीमाओं में बंधे थे, आज मछली पालन से बेहतर आय कमा रहे हैं। उनके काम को देखते हुए भारतीय स्टेट बैंक की बदरपुर शाखा ने गांव को ‘एसबीआई मत्स्य पालन गांव’ के नाम से पहचान दी।

नजरुल का मानना है कि असम में मछली पालन की अपार संभावनाएं हैं। उनका कहना है कि राज्य की बहुत सी जमीन साल भर पानी में डूबी रहती है। ऐसी जमीन खेती के लिए भले मुश्किल हो, लेकिन मछली पालन के लिए बेहद उपयोगी है। अगर युवा इसे अपनाएं तो वे अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं और राज्य को बाहर से मछली मंगाने की जरूरत भी कम होगी।

आज नजरुल रोहू, कतला, सिंघी, मगुर, पाबड़ा, कोई और रूपचंदा जैसी कई प्रजातियों की मछलियां पूरी तरह जैविक तरीके से तैयार कर रहे हैं। उनके उत्पाद असम के साथ मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम तक पहुंचते हैं। उन्होंने आधुनिक तकनीक भी अपनाई है। ऑक्सीजन एरेटर और रीसर्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम जैसी सुविधाओं से उत्पादन बेहतर हुआ है।

उनकी मेहनत को कई सम्मान भी मिले। मार्च 2025 में उन्हें असम का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘असम गौरव पुरस्कार’ दिया गया। राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड ने भी उनके काम को सराहा।

नजरुल हक की कहानी सिर्फ सफलता की कहानी नहीं है। यह सोच बदलने की कहानी है। यह बताती है कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर इरादा मजबूत हो तो बाढ़ का पानी भी रोज़गार का रास्ता बन सकता है।

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