असम के विक्की हुसैन ने मधुमक्खी पालन से बदला भाग्य, की लाखों की कमाई
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गुवाहाटी
आज के समय में जब युवा सरकारी नौकरी के पीछे भाग रहे हैं तब असम के एक 22 वर्षीय युवक ने आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश की है। कामरूप जिले के बैहाटा चारियाली के अंतर्गत आने वाले बिहडिया गांव के विक्की हुसैन ने मधुमक्खी पालन को अपना करियर बनाया। महज एक बॉक्स से शुरू हुआ उनका यह सफर आज एक बड़े बिजनेस में बदल चुका है।
विक्की आज हर साल करीब आधा टन यानी 500 किलोग्राम शुद्ध और प्राकृतिक शहद का उत्पादन कर रहे हैं। इससे उन्हें सालाना लाखों रुपये की कमाई हो रही है। वे न सिर्फ शहद बेचते हैं बल्कि असम के बाहर दूसरे राज्यों में मधुमक्खियां और मधुमक्खी पालन के बॉक्स भी सप्लाई करते हैं। वे असम के बेरोजगार युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए हैं।
सरकारी नौकरी छोड़ चुना खुद का रास्ता
विक्की हुसैन ने अपनी शुरुआत के बारे में बताया कि उन्होंने पहले सरकारी नौकरी के लिए कड़ी मेहनत की थी। कुछ समय बाद उन्हें समझ आ गया कि असली सफलता खुद का काम शुरू करने में है। उसी दौरान उन्होंने देखा कि बाजार में मिलावटी और केमिकल वाला शहद बहुत ज्यादा बिक रहा है। लोगों को असली शहद नहीं मिल पा रहा है।
विक्की कहते हैं कि आजकल बाजार में शुद्ध शहद मिलना मुश्किल है। लोग प्राकृतिक शहद खरीदना चाहते हैं लेकिन उन्हें मजबूरी में मिलावटी शहद मिलता है। यह मिलावटी शहद सेहत को नुकसान पहुंचाता है। इसी वजह से उन्होंने समाज को स्वस्थ और शुद्ध शहद देने का फैसला किया और इस काम में उतर गए।

व्यवस्थित ट्रेनिंग से मिली मदद
अपना काम शुरू करने से पहले विक्की ने इसका पूरा प्रशिक्षण लिया। उन्होंने मुकलमुआ के खादी और ग्रामीण उद्योग बोर्ड से ट्रेनिंग ली। इसके बाद उन्होंने खानापारा के कृषि विभाग से भी मधुमक्खी पालन का व्यवस्थित प्रशिक्षण प्राप्त किया। ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्होंने छोटे स्तर पर काम शुरू किया।
सिर्फ 2200 रुपये से की शुरुआत
इस बिजनेस को शुरू करने के लिए विक्की के पास बहुत ज्यादा पैसे नहीं थे। उन्होंने महज 2200 रुपये की शुरुआती पूंजी से मधुमक्खी पालन का पहला डिब्बा खरीदा था। शुरुआत में उन्हें कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा। कई बार उनकी मधुमक्खियां उड़ जाती थीं। कभी-कभी पूरा छत्ता ही खराब हो जाता था।
इन शुरुआती असफलताओं के बाद भी विक्की ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने हौसले को बनाए रखा। विक्की के मुताबिक शुरुआत में जब मधुमक्खियां उड़ जाती थीं तो उन्हें बहुत दुख होता था। लेकिन उन्होंने खुद पर भरोसा रखा। उन्होंने सोचा कि अगर वे धैर्य और ध्यान से काम करेंगे तो सफलता जरूर मिलेगी। आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई।
बक्सों की संख्या एक से बढ़कर हुई 200
विक्की की मेहनत का नतीजा आज सबके सामने है। वर्तमान में उनके पास सामान्य दिनों में करीब 75 मधुमक्खी पालन के बक्से हैं। शुष्क मौसम यानी जब शहद का सीजन होता है तब इन बक्सों की संख्या बढ़कर 150 से 200 तक पहुंच जाती है। मधुमक्खी पालन के एक बॉक्स में आमतौर पर 8 छत्ते होते हैं। विक्की ने धीरे-धीरे नए छत्ते बनाकर अपने काम को बड़ा किया है।
इस काम में विक्की को सरकार से भी थोड़ी मदद मिली। सरकारी सहायता के तौर पर उन्हें खादी बोर्ड की तरफ से 10 बक्से मिले। इसके साथ ही कृषि विभाग ने भी उन्हें एक बॉक्स दिया था।

देशी और इतालवी मधुमक्खियों का मेल
विक्की मुख्य रूप से “एपिस सेरेना इंडिका” नाम की देशी प्रजाति की मधुमक्खी का पालन करते हैं। इसके अलावा वे शुष्क मौसम में ज्यादा शहद उत्पादन के लिए पश्चिम बंगाल और बिहार से इतालवी प्रजाति की मधुमक्खियां भी मंगाते हैं। इस इतालवी प्रजाति का नाम “एपिस मेलिफेरा लिगुस्टिका” है।
दोनों प्रजातियों की अपनी खासियत और चुनौतियां हैं। स्थानीय देशी प्रजाति के एक बॉक्स से 8 से 10 किलोग्राम शहद मिलता है। इसके विपरीत इतालवी प्रजाति के एक बॉक्स से 30 से 40 किलोग्राम तक शहद मिल जाता है। असम के मौसम में इतालवी मधुमक्खियां मानसून के समय ज्यादा दिनों तक जिंदा नहीं रह पाती हैं।
बरसात के दिनों में स्थानीय मधुमक्खियां ज्यादा बेहतर साबित होती हैं। हालांकि बरसात में प्राकृतिक भोजन की कमी होने से कई मधुमक्खियां मर जाती हैं। इसी कारण विक्की को हर साल बाहर से नई इतालवी मधुमक्खियां खरीदनी पड़ती हैं।
कैसे बढ़ती है मधुमक्खियों की संख्या
विक्की ने मधुमक्खियों के प्रजनन की एक बहुत ही आसान और प्राकृतिक प्रक्रिया बताई। एक बॉक्स के 8 छत्तों में से कुछ हिस्सों को अलग करके दूसरे नए बॉक्स में रख दिया जाता है। ऐसा करने से वहां मधुमक्खियों की एक नई कॉलोनी तैयार हो जाती है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस नई कॉलोनी में मधुमक्खियां खुद ही अपने लिए एक नई रानी मधुमक्खी चुन लेती हैं। विक्की इसी प्राकृतिक तरीके को अपनाकर अपने बक्सों और मधुमक्खियों की संख्या लगातार बढ़ा रहे हैं।
‘नॉर्थ ईस्ट हनी’ ब्रांड की धूम
विक्की हुसैन केवल शहद निकालने तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने अपने शहद को ‘नॉर्थ ईस्ट हनी’ नाम से एक ब्रांड बनाया है। वे बाजार में इस ब्रांड के तहत शुद्ध शहद बेचते हैं। फिलहाल उनके शुद्ध शहद का बाजार भाव 600 रुपये प्रति किलोग्राम है।
इसके साथ ही वे सरकारी विभागों, गैर सरकारी संगठनों (NGO) और किसान उत्पादक संगठनों (FPO) को भी सामान सप्लाई करते हैं। वे इन संस्थाओं को मधुमक्खियां, मधुमक्खी पालन के बक्से और दूसरी जरूरी चीजें देते हैं। विक्की के पास मल्टी फ्लोरा, सरसों, लीची, बेरी और असम लेमन जैसे कई अलग-अलग स्वादों का शहद उपलब्ध है। वे अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मेघालय जैसे पड़ोसी राज्यों में भी मधुमक्खी पालन की सामग्री बेचते हैं।
बारिश के मौसम में आती हैं चुनौतियां
मधुमक्खी पालन के काम में मौसम की भूमिका सबसे बड़ी होती है। बरसात के अनुकूल मौसम न होने पर प्रकृति में फूलों की कमी हो जाती है। इस वजह से मधुमक्खियों को प्राकृतिक भोजन नहीं मिल पाता। ऐसे समय में मधुमक्खियों को जिंदा रखने के लिए कृत्रिम भोजन देना पड़ता है।
विक्की बताते हैं कि इस कृत्रिम भोजन के दौरान शहद का उत्पादन बिल्कुल नहीं होता है। असली और शुद्ध शहद सिर्फ फूलों के रस से ही बनता है। किसी भी तरह के नकली या कृत्रिम भोजन से असली शहद नहीं बन सकता। शुद्ध शहद के लिए पर्यावरण में पर्याप्त फूलों का होना जरूरी है। असम में शहद का सबसे अच्छा उत्पादन दिसंबर से अप्रैल महीने के बीच होता है क्योंकि इस समय चारों तरफ फूल खिले होते हैं।
हानिकारक कीटों से बचाव है जरूरी
इस बिजनेस में कई तरह की बीमारियां और कीड़े-मकोड़े नुकसान पहुंचाते हैं। ‘स्मॉल बैटल हाइव’ नाम का एक बेहद खतरनाक कीट होता है। यह कीट छत्ते के अंदर अपने अंडे दे देता है। इन अंडों से निकलने वाले बच्चे देखते ही देखते पूरी कॉलोनी और छत्ते को तबाह कर देते हैं।
इसके अलावा चींटियां, छिपकलियां, कीड़े और पतंगे भी मधुमक्खियों को नुकसान पहुंचाते हैं। इनसे बचने का एकमात्र तरीका साफ-सफाई है। विक्की हर दो दिन में अपने सभी छत्तों का गहराई से निरीक्षण करते हैं ताकि किसी भी नुकसान से बचा जा सके।
पढ़ाई के साथ बिजनेस और रोजगार
तमाम चुनौतियों को पार करते हुए विक्की आज इस काम से सालाना 2 से 3 लाख रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं। उनके इस काम में दो अन्य स्थानीय युवाओं को भी रोजगार मिला हुआ है। सबसे अच्छी बात यह है कि विक्की काम के साथ अपनी पढ़ाई भी पूरी कर रहे हैं। वे अभी एमबीए (MBA) की पढ़ाई कर रहे हैं।
वे दूसरे युवाओं को भी मधुमक्खी पालन की ट्रेनिंग देकर उन्हें पैरों पर खड़ा होने में मदद कर रहे हैं। विक्की का मानना है कि असम में इस काम की बहुत ज्यादा संभावनाएं हैं। सही प्लानिंग और अच्छी ट्रेनिंग लेकर कोई भी युवा इस काम से आत्मनिर्भर बन सकता है। इसमें सिर्फ शहद बेचकर ही नहीं बल्कि बॉक्स और छत्ते बेचकर भी अच्छी कमाई की जा सकती है। विक्की हुसैन की यह कहानी साबित करती है कि अगर इरादे मजबूत हों तो छोटे से प्रयास से भी बड़ा मुकाम हासिल किया जा सकता है।

