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कार्डिनल ज़ुप्पी ने दिखाया आईना, गाज़ा पर अरब चुप्पी शर्मनाक

बोलोन्या (इटली) | 19 अगस्त 2025

फ़िलिस्तीन पर इज़राइल के लगातार हमलों और गाज़ा में जारी मानवीय त्रासदी ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया है। इज़राइली दमन के कारण अब तक गाज़ा में 70,000 से अधिक मासूम जानें जा चुकी हैं, जिनमें हज़ारों बच्चे भी शामिल हैं। भुखमरी और कुपोषण की स्थिति ऐसी है कि कई बच्चे दवाओं और भोजन की कमी से दम तोड़ रहे हैं। इसके बावजूद, न तो अरब दुनिया और न ही तथाकथित “अहिंसा के पुजारी” देश कोई ठोस कदम उठा पाए हैं।

ऐसे माहौल में इटली के शहर बोलोन्या से एक ऐसी मिसाल सामने आई जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है और अरब देशों को भी आईना दिखा दिया है। इतालवी बिशप सम्मेलन के प्रमुख कार्डिनल माटेयो ज़ुप्पी ने गाज़ा और इज़राइल में मारे गए बच्चों के नाम पढ़कर न केवल शांति की अपील की, बल्कि उन तमाम शासकों को भी कटघरे में खड़ा कर दिया जो इस त्रासदी पर चुप हैं।


सात घंटे तक चला स्मरण, 12,211 फ़िलिस्तीनी और 16 इज़राइली बच्चों के नाम पढ़े

14 अगस्त 2025 को स्वर्गारोहण पर्व की पूर्व संध्या पर बोलोन्या के पास मोंटे सोले दी मार्ज़ाबोटो पार्क में एक प्रार्थना सभा का आयोजन हुआ। यह स्थान अपने आप में ऐतिहासिक है, क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाज़ियों ने यहाँ एक चर्च को जला दिया था और लगभग 800 निर्दोष लोगों की हत्या कर दी थी, जिनमें कई बच्चे भी शामिल थे।

यहीं पर कार्डिनल ज़ुप्पी ने अपने धर्मप्रांत के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर एक अनोखी पहल की। उन्होंने 7 अक्टूबर 2023 से लेकर 25 जुलाई 2025 तक मारे गए प्रत्येक बच्चे का नाम पढ़ा।

  • सबसे पहले 16 इज़राइली बच्चों के नाम पढ़े गए, जिनकी जान हमास के हमले में गई थी।
  • इसके बाद 12,211 फ़िलिस्तीनी बच्चों के नाम लिए गए, जिन्हें इज़राइली हमलों में अपनी जान गंवानी पड़ी।

यह सूची 469 पन्नों की थी और इसे पढ़ने में करीब सात घंटे लग गए। दोपहर से लेकर देर शाम तक चलने वाली इस सभा में हर नाम के साथ एक सन्नाटा छा जाता था।

ज़ुप्पी ने कहा, “हम हर बच्चे का नाम इसलिए ले रहे हैं ताकि उनकी मासूम ज़िंदगी हमें शांति की राह पर चलने की प्रेरणा दे। ये बच्चे हमसे अधिक बुद्धिमान हैं, क्योंकि उनकी बलि ने हमें यह याद दिलाया है कि युद्ध का कोई औचित्य नहीं होता।”


अरब देशों की चुप्पी और पाखंड पर उठे सवाल

कार्डिनल ज़ुप्पी की इस पहल ने न केवल यूरोप और कैथोलिक जगत में हलचल मचाई है, बल्कि अरब दुनिया की निष्क्रियता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

महाराष्ट्र के पूर्व आईपीएस अधिकारी अब्दुर रहमान ने इस पहल को साझा करते हुए लिखा,
“इज़राइल के अत्याचारों से गाज़ा में हज़ारों बच्चों की मौत हो गई, लेकिन अरब शासक पूरी तरह खामोश हैं। इसके विपरीत, इटली के एक पादरी ने इन मासूमों की आत्मा की शांति के लिए सात घंटे तक उनके नाम पढ़े। कार्डिनल ज़ुप्पी को दुआ और सलाम, और अरब हुक्मरानों पर हज़ार लानत।”

दरअसल, कई मुस्लिम देशों ने इज़राइल के खिलाफ प्रत्यक्ष रूप से कोई ठोस कूटनीतिक या आर्थिक कार्रवाई नहीं की है। कुछ तो खुलेआम इज़राइल से सहयोग भी कर रहे हैं। यही कारण है कि आलोचकों का कहना है कि मुस्लिम उम्माह आज इस मानवीय संकट के समय “तमाशबीन” बनकर रह गया है।


प्रतीकात्मक स्थल से शांति का संदेश

प्रार्थना सभा का स्थान भी बेहद महत्वपूर्ण था। मोंटे सोले का वह चर्च, जिसे नाज़ियों ने 1944 में जला दिया था, सदैव पीड़ा और प्रतिरोध का प्रतीक रहा है। उसी खंडहर में बैठकर जब कार्डिनल ने बच्चों के नाम पढ़े तो यह केवल स्मरण नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए एक गहरा संदेश था।

ज़ुप्पी ने कहा, “यह केवल स्मरण का समय नहीं, बल्कि हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम युद्ध के खिलाफ खड़े हों। हमें हथियारों को शांत करना होगा, बंधकों को मुक्त करना होगा और मानवता को सर्वोपरि रखना होगा।”


कैथोलिक नेतृत्व की सक्रियता

पिछले कुछ महीनों से कैथोलिक चर्च गाज़ा की स्थिति को लेकर बेहद सक्रिय रहा है।

  • 4 अगस्त को महिला धार्मिक समूहों के अंतरराष्ट्रीय संघ ने न्याय और सुलह की अपील करते हुए उपवास और प्रार्थना का आयोजन किया।
  • गाज़ा के होली फ़ैमिली चर्च पर 13 जुलाई को हुए हमले में दो महिलाओं की मौत हो गई थी, जिस पर भी चर्च ने कड़ा विरोध जताया।
  • यरूशलेम के पैट्रिआर्क, कार्डिनल पियरबतिस्ता पिज़्ज़ाबल्ला ने हाल ही में कहा, “गाज़ा और दुनिया में निर्दोषों का खून कभी भुलाया नहीं जा सकता।”
  • खुद पोप लियो GPT ने युद्धविराम की अपील करते हुए कहा, “इतने समय के बाद यह युद्ध किस मकसद से जारी है? हमें हथियारों से नहीं, बल्कि बातचीत और कूटनीति से रास्ता खोजना होगा।”

मानवीय संवेदना बनाम राजनीतिक चुप्पी

कार्डिनल ज़ुप्पी की पहल हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जब एक ईसाई पादरी गाज़ा के बच्चों के लिए सात घंटे तक खड़ा रह सकता है, तो अरब और मुस्लिम देशों के शासक आखिर क्यों चुप हैं?

  • क्या उनके लिए आर्थिक हित और राजनैतिक गठजोड़ इंसानियत से ऊपर हैं?
  • क्या इस्लामिक दुनिया का दावा केवल बयानबाज़ी तक सीमित रह गया है?
  • क्या गाज़ा के बच्चे सिर्फ आँकड़े बनकर रह जाएंगे?

यह वही सवाल हैं जो अब अरब सड़कों पर भी उठने लगे हैं।


मानवता की असली परीक्षा

गाज़ा की त्रासदी अब केवल मध्य-पूर्व का मुद्दा नहीं रही, बल्कि यह पूरी मानवता की परीक्षा बन गई है। भूख से तड़पते बच्चों, मलबे में दबे शवों और हर दिन टूटते परिवारों की तस्वीरें दुनिया के लिए शर्म का सबब हैं।

कार्डिनल ज़ुप्पी की यह पहल दिखाती है कि धर्म और सीमाओं से परे जाकर भी इंसानियत के लिए खड़ा हुआ जा सकता है। जब अरब देश, तुर्की और अन्य मुस्लिम राष्ट्र राजनीतिक मजबूरियों में उलझे हैं, तब एक यूरोपीय पादरी ने मासूमों की आवाज़ बनकर दुनिया को आईना दिखा दिया।


निष्कर्ष

आज गाज़ा में जो कुछ हो रहा है, वह केवल युद्ध या राजनीति का विषय नहीं है, बल्कि यह इंसानियत का सवाल है। अरब दुनिया की खामोशी इस त्रासदी को और गहरा कर रही है। इसके विपरीत, कार्डिनल माटेयो ज़ुप्पी की पहल हमें याद दिलाती है कि एक सच्चा इंसान वही है, जो पीड़ितों के लिए आवाज़ उठाए, चाहे वे किसी भी मज़हब, जाति या मुल्क के हों।

इसलिए, जबकि अरब और मुस्लिम दुनिया अपनी सियासी मजबूरियों और चुप्पी में फँसी है, बोलोन्या से उठी यह आवाज़ आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल बनेगी। यह इतिहास में दर्ज हो जाएगा कि जब पूरी दुनिया खामोश थी, तब एक ईसाई पादरी ने गाज़ा के मासूम बच्चों को नाम लेकर याद किया और मानवता को बचाने की पुकार लगाई।