Culture

मुस्लिम संगीत उस्तादों का 100 साल पुराना गुरुकुल अब जर्जर हालत में

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, जयपुर

जयपुर, जिसे दुनिया उसकी गुलाबी रंगत, शानदार हवेलियों, किलों और महलों के लिए जानती है, उसकी पहचान सिर्फ स्थापत्य कला तक सीमित नहीं है। यह शहर सदियों से एक जीवंत सांस्कृतिक धरोहर को भी संजोए हुए है। गलियों से लेकर महलों तक, हर कोने में कला, संगीत और नृत्य की गूंज सुनाई देती है। लेकिन इस रंगीन शहर की वॉल्ड सिटी के बीचों-बीच, घाटगेट इलाके में खड़ी एक पुरानी हवेली है— मथुरा वालों की हवेली— जो अपने आप में इतिहास, संगीत और संघर्ष का प्रतीक बन चुकी है।

आज यह हवेली जर्जर हालत में खड़ी है। दीवारों की पपड़ी उखड़ चुकी है, छतें रिसने लगी हैं, और नक्काशीदार बालकनियों से अब सैटेलाइट डिशें लटक रही हैं। लेकिन कभी यही हवेली सुरों का मंदिर थी, जहां से सुबह होने से पहले रियाज़ की आवाजें गूंज उठती थीं और देर रात तक आलाप की मिठास हवा में तैरती रहती थी। यह वही स्थान है जिसने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और ग़ज़ल गायकी को कई ऐसे नगीने दिए, जिनका नाम न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया में रोशन हुआ।


एक सौ साल पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा

करीब 100 साल से भी अधिक समय तक, यह हवेली गुरु-शिष्य परंपरा का जीवंत केंद्र रही। यहां की हर दीवार, हर आंगन, हर कोना, सुरों से आबाद रहा है। यहीं से निकले पद्मश्री अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन, जिनकी ग़ज़लों ने शास्त्रीय संगीत को आम जनता तक पहुंचाया। यहीं से मशहूर कव्वाल साबरी ब्रदर्स निकले, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जयपुर का नाम रोशन किया।

मथुरा वालों की हवेली सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि ‘संगीत का घर’ थी। यहां रहने वाले परिवारों का प्रमुख व्यवसाय गाना-बजाना था और आज भी है। शादी-ब्याह से लेकर सामाजिक कार्यक्रमों तक, इसी हवेली के कलाकारों ने अपनी आवाज़ और हुनर से हर समारोह को सजाया।


मथुरा से जयपुर तक की यात्रा

हवेली का इतिहास भी कम रोचक नहीं है। मशहूर कव्वाल और गायक अमीन साबरी बताते हैं कि करीब 200 साल पहले उनके पूर्वज— चैन मोहम्मद और जमाल बख्श— मथुरा के वृंदावन में गाते-बजाते थे। संयोग से जयपुर रियासत के राजा बांके बिहारी मंदिर के दर्शन के लिए गए और उनकी गायकी से इतने प्रभावित हुए कि मथुरा के राजा से इन्हें ‘प्रसाद’ स्वरूप मांग लाए।

जब यह परिवार जयपुर आया तो यहां रहने के लिए कोई जगह नहीं थी। तब महाराजा ने घाटगेट के पास एक हवेली दी, जिसे बाद में लोग ‘मथुरा वालों की हवेली’ कहने लगे। उसी दिन से यह हवेली संगीत की गूंज का पर्याय बन गई।


सुरों की खान और शाही संरक्षण

मथुरा वालों की हवेली में रहते हुए कलाकारों को न सिर्फ आम जनता का प्यार मिला, बल्कि जयपुर दरबार से भी समय-समय पर इमदाद मिलती रही। राजा दरबार में गाने का मौका देते थे और कभी-कभी खुश होकर इनाम भी देते थे। यही कारण है कि इस हवेली से निकलने वाले कलाकारों की पीढ़ियां लगातार संगीत को ही अपना पेशा बनाती रहीं।

गायक तनवीर साबरी बताते हैं, ‘‘हमारे पूर्वज मथुरा और मेंदू रियासत में गाने-बजाने का काम करते थे। जयपुर आने के बाद भी यही परंपरा चली। दरबार से सम्मान और आम जनता से सराहना मिलती रही।’’


फिल्मों तक पहुंची हवेली की आवाज

समय बदला, तो इस हवेली की आवाज़ भी फिल्मी दुनिया तक पहुंची। उस्ताद सईद साबरी को हिंदी फिल्म ‘हिना’ में गाने का मौका मिला— ‘कहीं देर ना हो जाए…’। इसके बाद तो अमीन-फरीद साबरी की आवाज़ बॉलीवुड की पहचान बन गई।

फिल्म ‘परदेस’ का मशहूर गीत ‘नहीं होना था, लेकिन हो गया प्यार…’ इन्हीं की देन है। ‘सिर्फ तुम’ का गीत ‘जिंदा रहने के लिए तेरी कसम…’ भी इन्हीं ने गाया। मंचों पर कव्वालियों से लेकर बड़े पर्दे तक, इस हवेली से निकले कलाकारों ने देश-विदेश में नाम कमाया।


हुसैन बंधु : ग़ज़ल की दुनिया के सितारे

इसी हवेली से निकले अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन को भला कौन भूल सकता है? उनकी ग़ज़लों ने शास्त्रीय संगीत को आम आदमी से जोड़ा। शाहरुख खान की फिल्म ‘वीर-ज़ारा’ का मशहूर गीत ‘तेरे दर पर दीवाना आया…’ आज भी लोगों के दिलों में ताज़ा है। गायकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने के लिए भारत सरकार ने इन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।

हवेली की यही विरासत आगे बढ़ाते हुए उनके भांजे और ग़ज़ल गायक मोहम्मद वकील भी सुर्खियों में आए। ‘सा रे गा मा पा’ जैसे लोकप्रिय शो के विजेता रहे और बॉलीवुड की कई फिल्मों में अपनी आवाज़ दी।


अजमत हुसैन और नई पीढ़ी की चुनौतियां

‘सा रे गा मा पा लिटिल चैंप्स’ के विजेता अजमत हुसैन भी इसी हवेली की देन हैं। वे मानते हैं कि गायकी किस्मत से भी जुड़ी चीज़ है, लेकिन यह भी स्वीकार करते हैं कि आज की पीढ़ी के सामने कठिन चुनौतियां हैं।

अब हवेली में वैसा माहौल नहीं रहा। रियाज़ के लिए जगह नहीं है। डिजिटल प्लेटफॉर्म और निजी ट्यूशन ने उस साधना की जगह ले ली है, जो कभी इस हवेली की पहचान थी। कीबोर्डिस्ट रहबर हुसैन और गायक मोहम्मद क़ासिम जैसे युवा कलाकार परंपरा को आगे तो बढ़ा रहे हैं, लेकिन कला और रोज़गार के बीच संतुलन की जद्दोजहद कर रहे हैं।


सुरों का घर, अब रोज़ी-रोटी की जद्दोजहद

आज इस हवेली में 150 से ज्यादा परिवार रहते हैं। कभी जो आंगन रियाज़ की गूंज से भरता था, वहां अब छोटे-छोटे कमरों में परिवारों की ज़िंदगी सिमट गई है। नक्काशीदार बालकनियों से जहां कभी सुरों की मिठास बहती थी, वहां अब टीवी एंटेना और सैटेलाइट डिश लटकते हैं।

हवेली का एक हिस्सा मदरसा बन चुका है। कुछ कमरे किराए पर दिए गए हैं। लेकिन फिर भी यहां के कलाकार अपनी परंपरा को छोड़ना नहीं चाहते। शादी-ब्याह, ऑर्केस्ट्रा और सामाजिक आयोजनों में गाकर अपनी रोज़ी-रोटी कमाते हैं।


पर्यटकों के लिए आकर्षण

आज भी जब कोई पर्यटक घाटगेट की ओर जाता है तो उसकी नजर इस हवेली पर जरूर टिकती है। लोकल गाइड बड़े गर्व से बताते हैं कि इस हवेली ने साबरी ब्रदर्स, हुसैन बंधु, मोहम्मद वकील और अजमत हुसैन जैसे कलाकार दिए, जिन्होंने जयपुर का नाम दुनिया भर में चमकाया।

हवेली में रहने वाले लोग भी गर्व से कहते हैं कि ‘‘हमारी पीढ़ियां गाती-बजाती आई हैं और यही हमारी पहचान है।’’


जर्जर इमारत, लेकिन जिंदा परंपरा

भले ही हवेली आज खस्ताहाल है, दीवारें टूटी हैं, लेकिन यहां के सुर अब भी जिंदा हैं। हां, वो बात नहीं रही जो पहले थी। अब न वैसा रियाज़ है, न वैसा माहौल। लेकिन हर छोटे-बड़े आयोजन में इस हवेली के कलाकारों की आवाज़ अब भी गूंज उठती है।

यह हवेली सिर्फ पत्थरों और दीवारों की कहानी नहीं है। यह उन आवाज़ों की कहानी है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही हैं। यह उस संघर्ष की कहानी है, जिसमें कला और रोज़ी-रोटी आमने-सामने खड़े हैं।


नतीजा

जयपुर की मथुरा वालों की हवेली आज टूटती दीवारों के बीच भी अपनी सुरमयी विरासत को संभाले खड़ी है। यह हवेली इस बात की गवाह है कि कला सिर्फ महलों और राजाओं की नहीं होती, बल्कि आम लोगों के दिलों और आंगनों से भी जन्म लेती है। यहां के कलाकार भले ही संघर्ष कर रहे हों, लेकिन उनका जुनून और लगन ही इस हवेली की असली पहचान है।

सच यही है कि यह हवेली जयपुर की सांस्कृतिक आत्मा है, जो हमें याद दिलाती है कि संगीत सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन का वह सुर है, जो पीढ़ियों को जोड़ता है और इतिहास को जीवित रखता है।