मुस्लिम सुपरस्टार लो, लीड हिंदू को दो : एनबीटी में हनी त्रेहान
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो | मुंबई–चेन्नई
मशहूर कहावत है— “बात निकली है तो दूर तलक जाएगी।”
देश के दिग्गज संगीतकार ए.आर. रहमान के बयान के बाद यह कहावत एक बार फिर सच साबित होती दिख रही है। रहमान ने जिस सांप्रदायिक सोच और बदले हुए पावर डायनैमिक्स की ओर इशारा किया था, अब उसी परत को बॉलीवुड के भीतर से कई नामचीन हस्तियां एक-एक कर उधेड़ रही हैं। ए.आर. रहमान और विद्या बालन के बाद अब मशहूर फिल्ममेकर और कास्टिंग डायरेक्टर हनी त्रेहान ने भी खुलकर उस सच्चाई को सामने रखा है, जिसे इंडस्ट्री में लंबे समय से दबाया जा रहा था।
हिंदी दैनिक नवभारत टाइम्स (NBT) में प्रकाशित हनी त्रेहान के विस्तृत इंटरव्यू से यह साफ संकेत मिलते हैं कि देश में चल रही तथाकथित ‘सांस्कृतिक युद्ध’ की आंच अब बॉलीवुड तक पहुंच चुकी है। यह केवल फिल्मों की पसंद या नापसंद का सवाल नहीं रह गया है, बल्कि यह रचनात्मक स्वतंत्रता, प्रतिनिधित्व और डर के माहौल से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है।

‘मुस्लिम सुपरस्टार लो, लेकिन लीड रोल हिंदू चाहिए’
हनी त्रेहान ने अपने इंटरव्यू में जो कहा, वह चौंकाने वाला होने के साथ-साथ बेहद गंभीर भी है। उनके अनुसार, आज के दौर में बड़े बजट की फिल्मों में मुस्लिम सुपरस्टार्स को कास्ट तो किया जाता है, लेकिन कहानी का लीड रोल अक्सर किसी हिंदू हीरो को ही सौंपा जाता है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि धीरे-धीरे इंडस्ट्री में घर कर गई उस सोच का नतीजा है, जिसमें निर्माता और स्टूडियोज़ ‘रिस्क’ लेने से डरने लगे हैं।
हनी त्रेहान कहते हैं कि उन्होंने एक कास्टिंग डायरेक्टर के तौर पर 14 साल, प्रोड्यूसर के रूप में 10 साल और डायरेक्टर के तौर पर पांच साल का लंबा सफर तय किया है। इस दौरान उन्होंने इंडस्ट्री को कई रूपों में बदलते देखा है, लेकिन आज जैसा डर और असहजता पहले कभी नहीं देखी।
‘आज हैदर जैसी फिल्म बनना नामुमकिन है’
ए.आर. रहमान पहले ही कह चुके हैं कि इंडस्ट्री में सांप्रदायिक सोच गहराती जा रही है और रचनात्मक फैसलों की जगह कॉरपोरेट मानसिकता हावी हो चुकी है। यही बात मशहूर गायक हरिहरन ने भी दोहराई। अब हनी त्रेहान ने इस पर मुहर लगाते हुए कहा कि आज के दौर में ‘हैदर’ या ‘उड़ता पंजाब’ जैसी फिल्में बनाना लगभग असंभव हो गया है।
उनके मुताबिक, निर्माता और निर्देशक पहले ही यह सोचकर डर जाते हैं कि कहीं उनकी फिल्म सत्ता या किसी खास विचारधारा के खिलाफ न समझ ली जाए। नतीजा यह है कि सच्ची कहानियों को तोड़ा-मरोड़ा जाता है या फिर पूरी तरह बदल दिया जाता है।
सेंसर बोर्ड के शिकंजे में ‘पंजाब 95’
हनी त्रेहान की फिल्म ‘पंजाब 95’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सच्ची घटनाओं पर आधारित यह पीरियड इन्वेस्टिगेटिव थ्रिलर दिवंगत मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित है, जिसमें दिलजीत दोसांझ ने मुख्य भूमिका निभाई है। यह फिल्म करीब डेढ़ साल से सेंसर बोर्ड में अटकी हुई है।
हनी त्रेहान के अनुसार, सेंसर बोर्ड ने फिल्म पर 127 कट्स लगाने को कहा है। वह कहते हैं कि उन्हें कट्स से ऐतराज नहीं है—अगर वे तार्किक और कानूनी हों। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब कट्स का आधार राजनीति या सत्ता की असहजता बन जाती है।
उनका सवाल है—अगर कोई सरकार या सत्ता यह तय करेगी कि कौन-सी कहानी ‘ठीक’ है और कौन-सी नहीं, तो फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या मतलब रह जाता है?
‘सरकार को खुश करने की होड़’
हनी त्रेहान का आरोप है कि आज सेंसर बोर्ड में बैठे कई लोग अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर रहे हैं। वे फिल्में परखने के बजाय सरकार को खुश करने की होड़ में लगे हुए हैं। उन्होंने याद दिलाया कि ‘उड़ता पंजाब’ के समय भी ऐसा ही विवाद हुआ था, लेकिन तब फिल्म इंडस्ट्री ज्यादा एकजुट थी।
उस दौर में फिल्म सर्टिफिकेशन अपीलेट ट्रिब्यूनल (FCAT) मौजूद था, जिसे 2021 में खत्म कर दिया गया। अब फिल्मकारों के पास कोर्ट के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता, और हर किसी के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ना संभव नहीं है।
चयनात्मक संवेदनशीलता पर सवाल
हनी त्रेहान ने सवाल उठाया कि अगर ‘पंजाब 95’ जैसी फिल्म से कानून-व्यवस्था बिगड़ने का खतरा बताया जा रहा है, तो फिर ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘द केरल स्टोरी’, ‘इमरजेंसी’, ‘द बंगाल फाइल्स’ और ‘द साबरमती रिपोर्ट’ जैसी संवेदनशील फिल्में कैसे रिलीज हो जाती हैं? इतना ही नहीं, कई राज्यों में इन्हें टैक्स-फ्री भी कर दिया जाता है।
उनका सवाल सीधा है—क्या सिर्फ कुछ खास विषयों पर बनी फिल्में ही देश की एकता के लिए खतरा हैं?
‘मुसलमान को विलेन दिखाता, तो तालियां मिलतीं’
अपने इंटरव्यू में हनी त्रेहान ने एक तीखा बयान देते हुए कहा कि शायद अगर उन्होंने किसी मुसलमान को विलेन के रूप में दिखाया होता या पूरे समुदाय को नकारात्मक रोशनी में पेश किया होता, तो उन्हें भी संसद में स्टैंडिंग ओवेशन मिलता।
उन्होंने यह भी खुलासा किया कि एक सच्ची मुस्लिम कहानी पर आधारित फिल्म, जिससे वे जुड़े थे, बड़े बजट और स्टार कास्ट की वजह से बदल दी गई। असली किरदार मुस्लिम था, लेकिन डर के चलते उसे हिंदू बना दिया गया।
‘मैं कहानी सुनाने आया हूं, एजेंडा नहीं’
हनी त्रेहान साफ कहते हैं कि वे फिल्में किसी राजनीतिक या व्यक्तिगत एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए नहीं बनाते। वे सिर्फ कहानियां सुनाना चाहते हैं—ईमानदारी से, बिना डर के। उनके मुताबिक, अगर फिल्मकार अपने काम के साथ ईमानदार नहीं रह पाता, तो उसके लिए सिनेमा सिर्फ एक खोखला व्यापार बनकर रह जाता है।

निष्कर्ष
हनी त्रेहान के बयान सिर्फ एक फिल्मकार की पीड़ा नहीं हैं, बल्कि वे उस डर और असहजता की तस्वीर हैं, जो आज बॉलीवुड पर मंडरा रही है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन लीड रोल कर रहा है, सवाल यह है कि क्या भारत का सिनेमा अपनी आत्मा और विविधता को बचा पाएगा?
सच का सामना जरूरी है।
पढ़ते रहें — मुस्लिम नाउ।

