‘वंदे मातरम्’ अनिवार्य करने पर विवाद: ऑल इंडिया सुन्नी जमीयत उलेमा अदालत जाएगी, कहा-धार्मिक स्वतंत्रता का प्रश्न
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, मुंबई।
‘वंदे मातरम्’ को सरकारी कार्यक्रमों और शैक्षणिक संस्थानों में अनिवार्य किए जाने के हालिया सरकारी आदेश के खिलाफ ऑल इंडिया सुन्नी जमीयत उलेमा ने अदालत का दरवाजा खटखटाने का निर्णय लिया है। संगठन ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय बताया है।
इस मुद्दे पर 17 फरवरी को मुंबई स्थित संगठन के कार्यालय में एक अहम बैठक आयोजित की गई, जिसमें वरिष्ठ उलेमा, बुद्धिजीवी और विभिन्न मस्जिदों के इमामों ने भाग लिया। बैठक की अध्यक्षता संगठन के उपाध्यक्ष Haji Mohammad Saeed Noori ने की।
फोन पर निर्देश, अदालत में चुनौती की तैयारी
बैठक के दौरान जानकारी दी गई कि संगठन के अध्यक्ष Allama Syed Moinuddin Ashraf Ashrafi Jilani (प्रसिद्ध ‘मुईन मियां’) इन दिनों बगदाद शरीफ की यात्रा पर हैं। उन्होंने दूरभाष के माध्यम से संगठन को निर्देश दिया है कि इस मामले में न्यायालय का रुख किया जाए, ताकि संवैधानिक और कानूनी स्तर पर स्थिति स्पष्ट हो सके।
हाजी मोहम्मद सईद नूरी ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ के कुछ शब्द ऐसे हैं जिन्हें मुस्लिम समुदाय अपने धार्मिक विश्वासों के आधार पर पढ़ना उचित नहीं समझता। उनका तर्क था कि इस आदेश को यदि सभी नागरिकों—विशेषकर मुसलमानों, सिखों और ईसाइयों—पर अनिवार्य रूप से लागू किया जाता है, तो इसे धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता है।
संवैधानिक ढांचे और धार्मिक स्वतंत्रता का प्रश्न
बैठक में वक्ताओं ने भारतीय संविधान के उस प्रावधान का हवाला दिया, जो प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन और प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। उनका कहना था कि भारत का लोकतांत्रिक और सेक्युलर ढांचा विविध आस्थाओं के सम्मान पर आधारित है, इसलिए किसी भी धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतीक को अनिवार्य बनाने से पहले व्यापक संवाद आवश्यक है।
संगठन के प्रतिनिधियों ने यह भी कहा कि वे राष्ट्रगान और राष्ट्र के प्रति सम्मान को लेकर प्रतिबद्ध हैं, लेकिन किसी विशेष रचना के अनिवार्य पाठ को धार्मिक दृष्टि से विवादित मानते हैं। उनका आग्रह है कि सरकार इस आदेश की पुनर्समीक्षा करे, ताकि किसी भी समुदाय की भावनाएं आहत न हों।
बैठक में प्रमुख उलेमा की मौजूदगी
इस महत्वपूर्ण बैठक में कई वरिष्ठ धार्मिक हस्तियां और विद्वान मौजूद रहे। इनमें मौलाना मोहम्मद अमानुल्लाह रज़ा (खतीब व इमाम, मस्जिद क़ुबा), मौलाना खलीलुर्रहमान नूरी, मौलाना फरीदुज़्ज़मां, मौलाना मुफ्ती मोहम्मद मंज़र हसन खान अशरफी मिस्बाही, मौलाना कमर रज़ा अशरफी, मौलाना मोहम्मद शफीक आलम नूरी, कारी नियाज़ अहमद कादरी (कोलाबा) और कारी शहज़ाद साहब सहित अनेक उलेमा और बुद्धिजीवी शामिल थे।
सभी वक्ताओं ने सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया कि सरकार से इस आदेश को तत्काल वापस लेने की मांग की जाए। यदि ऐसा नहीं होता है तो न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से संवैधानिक व्याख्या की मांग की जाएगी।
राष्ट्रीय बहस का मुद्दा
‘वंदे मातरम्’ को लेकर समय-समय पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस होती रही है। कुछ वर्ग इसे राष्ट्रभक्ति का प्रतीक मानते हैं, जबकि अन्य इसे ऐतिहासिक और धार्मिक संदर्भों में देखते हुए वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। ऐसे में यह मुद्दा केवल प्रशासनिक आदेश तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक समरसता से भी जुड़ जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के विषयों पर संवाद और सहमति की प्रक्रिया लोकतांत्रिक समाज के लिए अधिक उपयुक्त होती है। अदालत में मामला जाने की स्थिति में यह देखना दिलचस्प होगा कि न्यायपालिका इस आदेश की व्याख्या किस प्रकार करती है और धार्मिक स्वतंत्रता तथा राष्ट्रहित के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाता है।
آل انڈیا سنی جمعیت العلماء کی جانب سے وندے ماترم کے سلسلے میں حالیہ سرکاری حکم نامے کے خلاف عدالت سے رجوع کرنے کا فیصلہ کیا گیا ہے۔
— Raza Academy (@razaacademyho) February 17, 2026
واضح رہے کہ حکومتِ ہند کی جانب سے حال ہی میں ایک حکم نامہ جاری کیا گیا ہے، جس کے تحت سرکاری تقریبات اور تعلیمی اداروں میں وندے ماترم پڑھنے کو لازمی… pic.twitter.com/gFTn7XYFtk
आगे की रणनीति
ऑल इंडिया सुन्नी जमीयत उलेमा ने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य टकराव नहीं, बल्कि संवैधानिक समाधान है। संगठन का कहना है कि वह कानून के दायरे में रहते हुए अपने अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय का सहारा लेगा।
फिलहाल इस निर्णय ने देश में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। आने वाले दिनों में सरकार की प्रतिक्रिया और न्यायिक प्रक्रिया की दिशा पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।

