टॉलीवुड में बांग्लादेशी कलाकारों पर बहस
मुस्लिम नाउ ब्यूरो | ढाका/कोलकाता
दो बंगाल। एक भाषा। साझा संस्कृति। फिल्मों, संगीत और कला के जरिए दशकों से बना गहरा रिश्ता। लेकिन अब इसी रिश्ते के बीच एक नया सवाल खड़ा हो गया है। क्या टॉलीवुड में बांग्लादेशी कलाकारों के लिए काम करना मुश्किल होने वाला है?
पश्चिम बंगाल की राजनीति में हालिया बदलाव के बाद कोलकाता के फिल्म उद्योग में एक नई बहस शुरू हो गई है। बहस का केंद्र हैं बांग्लादेशी कलाकार। सवाल यह है कि क्या उन्हें पहले की तरह टॉलीवुड में काम करने की आजादी मिलती रहेगी, या नए हालात इस रिश्ते को प्रभावित करेंगे।
यह चर्चा अचानक नहीं उठी। इसकी शुरुआत हाल ही में कोलकाता के टेक्नीशियन स्टूडियो में हुई एक अहम बैठक से हुई। बैठक की अगुवाई अभिनेता और नव निर्वाचित भाजपा विधायक रुद्रनील घोष ने की। इसमें टॉलीवुड से जुड़े कई बड़े नाम शामिल हुए। अभिनेता परमब्रता चटर्जी, फिल्म निर्देशक सृजीत मुखर्जी, संगीतकार इंद्रदीप दासगुप्ता और उद्योग से जुड़े कई तकनीशियन मौजूद थे।
बैठक का मकसद फिल्म उद्योग की समस्याओं पर चर्चा करना था। लेकिन बातचीत के दौरान अचानक बांग्लादेशी कलाकारों का मुद्दा सामने आ गया।
कुछ तकनीशियनों ने खुलकर नाराजगी जताई।
उनका कहना था कि जब भारतीय तकनीशियन काम के सिलसिले में बांग्लादेश जाते हैं, तो कई बार उन्हें मुश्किलों और अपमान का सामना करना पड़ता है। दूसरी तरफ बांग्लादेशी कलाकार कोलकाता में बिना किसी बड़ी रुकावट के काम करते हैं। ऐसे में यह असंतुलन सवाल खड़ा करता है।
एक तकनीशियन ने बैठक में कहा कि यह स्थिति स्वीकार करने लायक नहीं है। अगर भारतीय कलाकारों और तकनीशियनों को वहां समान सम्मान नहीं मिलता, तो यहां भी नियमों पर चर्चा होनी चाहिए।
यही वह क्षण था, जब यह मुद्दा निजी शिकायत से निकलकर सार्वजनिक बहस बन गया।
रुद्रनील घोष ने तकनीशियनों की नाराजगी को गंभीर बताया। उन्होंने कहा कि एक भारतीय होने के नाते ऐसी घटनाएं दुखद हैं। अगर मौका मिला तो वह इस मुद्दे को सरकार के सामने रखेंगे।
हालांकि उन्होंने एक संतुलित बात भी कही।
रुद्रनील घोष ने साफ किया कि पूरे बांग्लादेश को कुछ घटनाओं के आधार पर नहीं देखा जा सकता। उनके मुताबिक बांग्लादेश में ऐसे बहुत लोग हैं, जो भारत को दिल से पसंद करते हैं। कुछ चरमपंथी घटनाओं या सीमित समूहों के व्यवहार के आधार पर पूरे देश की छवि तय करना ठीक नहीं होगा।
उनके इस बयान ने बहस को और दिलचस्प बना दिया। क्योंकि एक तरफ उद्योग से जुड़े लोगों की नाराजगी है। दूसरी तरफ दोनों बंगाल के लंबे सांस्कृतिक रिश्तों की हकीकत भी मौजूद है।
दरअसल, कोलकाता और ढाका का मनोरंजन जगत हमेशा से एक दूसरे के करीब रहा है।
कई बांग्लादेशी कलाकारों ने टॉलीवुड में काम कर लोकप्रियता हासिल की। वहीं भारतीय अभिनेता, निर्देशक और तकनीशियन भी बांग्लादेशी फिल्मों और ओटीटी प्रोजेक्ट्स का हिस्सा बनते रहे हैं। भाषा एक होने की वजह से दोनों देशों के दर्शकों के बीच भी गहरा जुड़ाव है।
बांग्लादेश की कई अभिनेत्रियां और कलाकार कोलकाता में लंबे समय तक सक्रिय रहे हैं। उनकी फिल्मों को दर्शकों ने पसंद किया। इसी तरह कोलकाता के फिल्मकारों ने भी बांग्लादेशी कलाकारों को अपनी कहानियों का हिस्सा बनाया।
लेकिन राजनीति और कला का रिश्ता हमेशा आसान नहीं होता।
जब राजनीतिक माहौल बदलता है, तो उसका असर अक्सर सांस्कृतिक क्षेत्रों तक पहुंचता है। पश्चिम बंगाल में चुनावी बदलाव के बाद फिल्म उद्योग में उठे ये सवाल उसी बदलाव की एक झलक माने जा रहे हैं।
फिल्म उद्योग के कुछ लोग मानते हैं कि अगर दोनों देशों के कलाकारों के लिए समान अवसर और सम्मान हो, तो सहयोग जारी रहना चाहिए। लेकिन अगर एक तरफ कठिनाई हो और दूसरी तरफ खुलापन, तो इस पर चर्चा जरूरी है।
वहीं कुछ कलाकारों का मानना है कि कला को सीमाओं से ऊपर रखना चाहिए। कलाकारों को राजनीति का शिकार नहीं बनना चाहिए। उनके मुताबिक फिल्म और संगीत ऐसे पुल हैं, जो देशों के बीच रिश्ते मजबूत करते हैं।
इस बहस के बीच सबसे बड़ी चिंता उन कलाकारों की है, जो दोनों बंगाल के बीच काम करते रहे हैं। उन्हें डर है कि अगर नियम सख्त हुए या माहौल बदला, तो सहयोग पर असर पड़ सकता है।
टॉलीवुड के लिए यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि वहां लंबे समय से सीमा पार प्रतिभाओं को जगह मिलती रही है। बांग्लादेशी कलाकारों की मौजूदगी ने कई फिल्मों को नया दर्शक वर्ग दिया है। वहीं तकनीकी सहयोग ने भी उद्योग को फायदा पहुंचाया है।
अब नजर इस बात पर है कि नई सरकार या संबंधित संस्थाएं इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती हैं। क्या कोई नई नीति बनेगी? क्या कलाकारों के काम पर नए नियम लागू होंगे? या फिर यह बहस कुछ समय बाद ठंडी पड़ जाएगी?
फिलहाल सवाल ज्यादा हैं और जवाब कम।
लेकिन इतना साफ है कि यह मामला सिर्फ फिल्म उद्योग तक सीमित नहीं है। इसके पीछे सम्मान, समान अवसर और सांस्कृतिक रिश्तों की बड़ी बहस भी छिपी है।
दोनों बंगाल के लोगों ने लंबे समय तक एक दूसरे की कहानियां देखी और सुनी हैं। अब देखना यह है कि राजनीति की नई हवा इस रिश्ते को बदलती है या फिर कला एक बार फिर सीमाओं से ऊपर उठकर अपना रास्ता बना लेती है।

