कश्मीर में घटती प्रजनन दर से बदल रहा जनसांख्यिकीय परिदृश्य
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नौशाद अख्तर
जम्मू कश्मीर में प्रजनन दर में आई तेज गिरावट अब केवल स्वास्थ्य या परिवार नियोजन का विषय नहीं रह गई है। इसका असर आने वाले वर्षों में समाज, रोजगार, अर्थव्यवस्था, परिवार की संरचना और जनसांख्यिकीय संतुलन पर भी दिखाई दे सकता है। उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि जम्मू कश्मीर की कुल प्रजनन दर यानी Total Fertility Rate लगातार नीचे आई है। NFHS के आंकड़ों के मुताबिक 2005 06 में यह दर 2.4 थी। 2015 16 में घटकर 1.7 हुई और 2019 21 में 1.4 तक पहुंच गई। यानी करीब डेढ़ दशक में प्रति महिला औसत बच्चों की संख्या में एक बच्चे की कमी दर्ज हुई।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2.1 की TFR को सामान्य तौर पर रिप्लेसमेंट लेवल माना जाता है। इसका मतलब ऐसी प्रजनन दर से है जो बिना प्रवासन के लंबे समय में आबादी को लगभग स्थिर रखने में मदद करती है। जम्मू कश्मीर की दर इसके काफी नीचे है। स्रोत में SRS के आंकड़ों के हवाले से 2005 में TFR 2.400 और 2019 तथा 2020 में 1.500 दर्ज की गई है।
ग्रामीण इलाकों से शहरों तक दिख रहा असर
घटती प्रजनन दर का असर ग्रामीण और शहरी इलाकों में अलग अलग दिखाई देता है। NFHS 5 के अनुसार जम्मू कश्मीर में ग्रामीण TFR 1.50 और शहरी TFR 1.20 रही। इसका एक अर्थ यह है कि शहरों में छोटे परिवार की प्रवृत्ति अधिक मजबूत हो चुकी है।
शहरी जीवन में बढ़ता खर्च इसकी एक वजह हो सकता है। घर का किराया, बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य सेवाएं और रोजमर्रा का खर्च परिवारों के फैसलों को प्रभावित करते हैं। संयुक्त परिवारों के कमजोर होने से बच्चों की देखभाल में मिलने वाला पारिवारिक सहयोग भी कम हुआ है। स्रोत के अनुसार श्रीनगर और जम्मू जैसे शहरों में कई दंपति जगह की कमी, शिक्षा के खर्च और पारिवारिक सहयोग की सीमाओं के कारण एक या दो बच्चों तक परिवार सीमित रखने का निर्णय ले रहे हैं।
देर से शादी और बदलती जीवनशैली
प्रजनन दर में गिरावट के पीछे केवल एक कारण नहीं है। शादी की उम्र बढ़ना भी इनमें महत्वपूर्ण है। स्रोत में GMC श्रीनगर की प्रसूति विभाग की पूर्व प्रमुख डॉ. फरहत जबीन के हवाले से देर से शादी और बढ़ते मोटापे को बांझपन से जुड़े प्रमुख कारणों में बताया गया है।
युवाओं की बदलती आकांक्षाएं भी परिवार के आकार को प्रभावित कर रही हैं। शिक्षा पूरी करने, रोजगार हासिल करने और आर्थिक रूप से स्थिर होने में अधिक समय लग रहा है। इसके बाद विवाह होता है। परिणाम यह है कि पहला बच्चा देर से होता है और दूसरे बच्चे के बीच अंतर बढ़ सकता है।
महिलाओं की शिक्षा और रोजगार को इस बदलाव के संदर्भ में केवल समस्या के रूप में देखना सही नहीं होगा। बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं अक्सर परिवारों को अपने बच्चों की संख्या और जन्म के अंतराल के बारे में अधिक सोच समझकर निर्णय लेने में सक्षम बनाती हैं। इसलिए इस बदलाव को समझने के लिए महिला स्वास्थ्य, रोजगार, परिवार की आर्थिक स्थिति और सामाजिक अपेक्षाओं को एक साथ देखना जरूरी है।
बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा बड़ी चुनौती
जम्मू कश्मीर में रोजगार की स्थिति भी परिवार के फैसलों को प्रभावित कर सकती है। स्रोत में PLFS 2024 के हवाले से बेरोजगारी दर 30 प्रतिशत बताई गई है। ऐसे माहौल में युवा दंपति बच्चे पैदा करने से पहले आर्थिक सुरक्षा को प्राथमिकता दे सकते हैं।
बच्चे का जन्म केवल अस्पताल का खर्च नहीं है। उसके बाद पोषण, शिक्षा, कपड़े, स्वास्थ्य और आवास से जुड़े खर्च लंबे समय तक चलते हैं। आर्थिक अनिश्चितता में परिवार स्वाभाविक रूप से सीमित बच्चों का विकल्प चुन सकता है।
यही वजह है कि प्रजनन दर में गिरावट को केवल परिवार नियोजन कार्यक्रमों की सफलता या विफलता के रूप में देखना अधूरा होगा। इसके पीछे रोजगार, महंगाई, आवास, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसे कई पहलू जुड़े हैं।
नशे की समस्या और प्रजनन स्वास्थ्य
कश्मीर में युवाओं के बीच नशीले पदार्थों की समस्या भी चिंता का विषय है। स्रोत के अनुसार नशीले पदार्थ अंतःस्रावी तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं और पुरुषों में शुक्राणु स्वास्थ्य तथा महिलाओं में मासिक धर्म चक्र पर असर डाल सकते हैं। नशे के साथ खराब पोषण और अस्वास्थ्यकर जीवनशैली जैसी समस्याएं भी जुड़ सकती हैं।
इसलिए प्रजनन स्वास्थ्य पर चर्चा केवल जन्म दर बढ़ाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। युवाओं को नशे से बचाना, पुनर्वास सुविधाओं का विस्तार करना, मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना और प्रजनन स्वास्थ्य के बारे में सही जानकारी देना भी जरूरी है।
परिवार नियोजन की सफलता का दूसरा पहलू
जम्मू कश्मीर में परिवार नियोजन की बढ़ती स्वीकार्यता भी प्रजनन दर में गिरावट की एक वजह है। स्रोत में परिवार कल्याण विभाग के महानिदेशक के हवाले से इस गिरावट को परिवार कल्याण कार्यक्रमों की सफलता से जोड़ा गया है। NFHS 5 में गर्भनिरोधक इस्तेमाल बढ़ने और दूसरे बच्चे के जन्म में अधिक अंतर रखने की प्रवृत्ति का उल्लेख है।
इसका मतलब यह है कि घटती TFR को अपने आप में संकट कहना भी सही नहीं होगा। कम प्रजनन दर तब चुनौती बन सकती है जब लंबे समय तक जन्म दर बहुत कम रहे और उसके साथ वृद्ध आबादी बढ़ने लगे तथा कामकाजी उम्र की आबादी का हिस्सा घटने लगे।
भविष्य की चुनौती केवल जनसंख्या नहीं
जनसांख्यिकीय बदलाव का सबसे बड़ा असर भविष्य के कार्यबल पर पड़ सकता है। आज कम जन्म लेने वाले बच्चे दो या तीन दशक बाद कामकाजी उम्र में पहुंचेंगे। अगर उस समय युवा आबादी का हिस्सा काफी कम हो गया तो रोजगार बाजार, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक विकास पर इसका असर पड़ सकता है।
स्रोत भी कम प्रजनन दर के संभावित परिणामों में बढ़ती आश्रित आबादी और सिकुड़ते कार्यबल का उल्लेख करता है। इसके अलावा परिवार की संरचना और सामाजिक परंपराओं में बदलाव की संभावना भी बताई गई है।
हालांकि, इन बदलावों को किसी एक धार्मिक या सामाजिक समुदाय के खिलाफ जनसांख्यिकीय संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यात्मक विश्लेषण को कमजोर करता है। जम्मू कश्मीर में जनसंख्या से जुड़े सवालों पर नीति की दिशा स्वास्थ्य, रोजगार, शिक्षा और परिवारों की वास्तविक जरूरतों के आधार पर तय होनी चाहिए।
मुस्लिम संगठनों और सरकार की भूमिका
कश्मीर के मुस्लिम सामाजिक और धार्मिक संगठनों की भूमिका इस विषय में महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन लक्ष्य किसी दूसरे समुदाय की आबादी को पीछे छोड़ना नहीं, बल्कि परिवारों को बेहतर स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराना होना चाहिए।
सरकार और सामुदायिक संगठन मिलकर प्रजनन स्वास्थ्य जागरूकता अभियान चला सकते हैं। बांझपन से जुड़े उपचार को अधिक सुलभ बनाया जा सकता है। विवाह और परिवार से जुड़े परामर्श केंद्र बनाए जा सकते हैं। नशे की समस्या के खिलाफ स्थानीय स्तर पर अभियान चलाए जा सकते हैं। कामकाजी दंपतियों के लिए बच्चों की देखभाल की सुविधाएं बढ़ाई जा सकती हैं।
स्रोत में भी बांझपन उपचार, प्रजनन स्वास्थ्य शिक्षा, आवास और बाल देखभाल सहायता तथा सामुदायिक नेताओं की भागीदारी जैसे उपाय सुझाए गए हैं।
सवाल परिवार के फैसलों को समझने का है
कश्मीर में घटती प्रजनन दर पर बहस को आरोपों और आशंकाओं से बाहर निकालने की जरूरत है। उपलब्ध आंकड़े एक वास्तविक बदलाव की ओर इशारा करते हैं। लेकिन इस बदलाव की वजहों को समझने के लिए विस्तृत जिला स्तर के अध्ययन, महिलाओं और पुरुषों से बातचीत, स्वास्थ्य संबंधी आंकड़े और आर्थिक परिस्थितियों का विश्लेषण जरूरी है।
सरकार को यह पता लगाना चाहिए कि युवा परिवार कम बच्चे क्यों चाहते हैं। क्या वजह रोजगार है। क्या शिक्षा का खर्च है। क्या आवास की समस्या है। क्या विवाह में देरी है। क्या स्वास्थ्य या बांझपन से जुड़ी परेशानी है। या फिर यह बदलती जीवनशैली और व्यक्तिगत पसंद का परिणाम है।
ऐसे सवालों के जवाब आंकड़ों से मिलेंगे। अनुमान और साजिश की धारणाओं से नहीं।
कश्मीर के लिए संतुलित नीति की जरूरत
जम्मू कश्मीर की TFR का 1.4 तक पहुंचना निश्चित तौर पर गंभीर जनसांख्यिकीय संकेत है। लेकिन समाधान किसी समुदाय की संख्या को दूसरे समुदाय के मुकाबले बढ़ाने की राजनीतिक रणनीति नहीं हो सकता। बेहतर रास्ता ऐसी नीतियां हैं जो परिवारों को सुरक्षित और सम्मानजनक परिस्थितियों में अपने बच्चों के बारे में निर्णय लेने में मदद करें।
सरकार, स्वास्थ्य विशेषज्ञ, महिला संगठन, मुस्लिम सामाजिक संस्थाएं और स्थानीय समुदाय मिलकर इस दिशा में काम कर सकते हैं। प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत हों। नशे पर नियंत्रण हो। युवाओं को रोजगार मिले। परिवारों को आवास और बाल देखभाल की सुविधा मिले। बांझपन के इलाज तक पहुंच आसान हो। विवाह और पारिवारिक जीवन से जुड़ी सामाजिक चुनौतियों पर खुली चर्चा हो।
कश्मीर की बदलती जनसांख्यिकी को समझने का यही संतुलित रास्ता है। घटती प्रजनन दर केवल बच्चों की संख्या का सवाल नहीं है। यह आने वाली पीढ़ियों, कार्यबल, परिवार और पूरी अर्थव्यवस्था के भविष्य से जुड़ा विषय है। इसलिए इस पर भावनात्मक दावों के बजाय आंकड़ों, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा के आधार पर गंभीर सार्वजनिक बहस जरूरी है।
AEO प्रश्न:
जम्मू कश्मीर में प्रजनन दर कितनी है? NFHS 5 के अनुसार जम्मू कश्मीर की TFR 1.4 है, जो 2.1 के रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे है।
कश्मीर में प्रजनन दर क्यों घट रही है? इसके पीछे देर से विवाह, आर्थिक असुरक्षा, शहरीकरण, छोटे परिवार की प्रवृत्ति, परिवार नियोजन, बदलती जीवनशैली और कुछ मामलों में प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं जैसे कई कारण बताए गए हैं।
क्या जम्मू कश्मीर की शहरी TFR ग्रामीण क्षेत्रों से कम है? हां। स्रोत में ग्रामीण TFR 1.50 और शहरी TFR 1.20 बताई गई है।
रिप्लेसमेंट लेवल क्या होता है? 2.1 TFR को सामान्य परिस्थितियों में ऐसी दर माना जाता है जो बिना प्रवासन के लंबी अवधि में आबादी को स्थिर रखने में मदद करती है।


