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एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 जेपीसी को भेजा गया, जमाअत ने उठाई आवाज

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

विदेशी अंशदान विनियम संशोधन विधेयक 2026 संसद में चर्चा का प्रमुख केंद्र बन गया है। लोकसभा ने इस विधेयक को विस्तृत विचार विमर्श के लिए संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी के पास भेज दिया है। सरकार का कहना है कि इस कदम से विदेशी चंदे के इस्तेमाल में पारदर्शिता आएगी। दूसरी तरफ सिविल सोसाइटी और धार्मिक अल्पसंख्यक संगठनों ने इसके कुछ कड़े प्रावधानों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जमाअत ए इस्लामी हिंद ने जेपीसी के गठन का स्वागत किया है। इसके साथ ही संगठन ने मांग की है कि विधेयक के विवादित बिंदुओं की समीक्षा पारदर्शी तरीके से की जानी चाहिए।

मुख्य बिंदु और त्वरित सारांश

  • संसद ने एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 को समीक्षा के लिए संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा है।
  • विधेयक में एफसीआरए पंजीकरण रद्द या समाप्त होने पर संस्था की संपत्तियों को एक नामित प्राधिकरण के अधीन करने का प्रस्ताव है।
  • जमाअत ए इस्लामी हिंद ने इस प्रावधान पर गहरी चिंता व्यक्त की है।
  • संगठन के अनुसार छोटी प्रक्रियागत चूक पर भी अस्पताल, स्कूल और अनाथालयों की संपत्ति जब्त होने का खतरा रहेगा।
  • संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 300ए के तहत मिले अधिकारों पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है।
  • हितधारकों ने मांग की है कि जेपीसी सभी पक्षों से परामर्श करके एक संतुलित ढांचा तैयार करे।

क्या है एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026

केंद्र सरकार ने संसद के चालू सत्र में विदेशी अंशदान नियमन संशोधन विधेयक 2026 पेश किया था। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य विदेशी धन से बनाई गई संपत्तियों का प्रबंधन और नियमन करना है।

अगर किसी संस्था का एफसीआरए लाइसेंस रद्द होता है या समय पर रिन्यू नहीं हो पाता है, तो उसकी संपत्ति एक नामित अथॉरिटी यानी सरकार द्वारा तय प्राधिकारी के पास चली जाएगी। इसमें वह संपत्तियां भी शामिल हैं जो पूरी तरह या आंशिक रूप से विदेशी चंदे से बनाई गई हैं। सरकार का तर्क है कि इससे विदेशी फंडिंग का दुरुपयोग रुकेगा और राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होगी।

लेकिन गैर सरकारी संगठनों और सामाजिक संस्थाओं का मानना है कि इससे उनके अस्तित्व पर संकट आ सकता है। यदि कोई संस्था घरेलू फंड से अपना काम चलाना चाहती है और विदेशी चंदा लेना बंद कर देती है, तो भी उसकी पुरानी संपत्ति जब्त होने का डर बना रहेगा।

जमाअत ए इस्लामी हिंद का रुख और आपत्तियां

जमाअत ए इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष एस अमीनुल हसन ने मीडिया को दिए एक विस्तृत बयान में इस मुद्दे पर अपनी बात रखी। उन्होंने सरकार द्वारा इस बिल को जेपीसी के पास भेजने के निर्णय को एक सकारात्मक और स्वागत योग्य कदम बताया।

अमीनुल हसन ने कहा कि उम्मीद है कि जेपीसी अपनी अंतिम रिपोर्ट देने से पहले नागरिक समाज के प्रतिनिधियों से बात करेगी। इसमें अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों, धर्मार्थ ट्रस्टों, कानूनी विशेषज्ञों और संवैधानिक विद्वानों को शामिल किया जाना बेहद जरूरी है। बिना सभी पक्षों को सुने कोई भी कानून जल्दबाजी में लागू नहीं होना चाहिए।

नामित प्राधिकारी के अधिकारों पर चिंता

जमाअत उपाध्यक्ष ने विशेष रूप से नामित प्राधिकरण के असीमित अधिकारों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जिस संस्था का एफसीआरए पंजीकरण रद्द होता है या रिन्यू नहीं होता, उसकी पूरी संपत्ति का नियंत्रण एक अधिकारी के हाथ में चला जाना खतरनाक है।

इन संपत्तियों में ऐसे स्कूल, अस्पताल, कॉलेज और जनकल्याणकारी संस्थान शामिल हैं जो वर्षों की मेहनत से खड़े किए गए हैं। केवल एक छोटी सी कागजी या प्रक्रियागत गलती के लिए पूरी संस्था की जायदाद छीन लेना अन्यायपूर्ण होगा। इससे जनसेवा के काम में लगे निर्दोष संगठनों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक सद्भाव पर असर

जमाअत ए इस्लामी हिंद ने अपने वक्तव्य में संवैधानिक गारंटियों का हवाला दिया है। संगठन का कहना है कि नए बदलावों को नागरिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

बयान में मुख्य रूप से चार संवैधानिक अनुच्छेदों का जिक्र किया गया है:

  1. अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता का अधिकार।
  2. अनुच्छेद 25: किसी भी धर्म को मानने और उसका प्रचार करने की आजादी।
  3. अनुच्छेद 26: अपने धार्मिक मामलों और संपत्तियों के खुद प्रबंधन का अधिकार।
  4. अनुच्छेद 300ए: संपत्ति रखने और उसके संरक्षण का कानूनी अधिकार।

जमाअत का तर्क है कि नए नियमों से इन मूलभूत अधिकारों का हनन हो सकता है।

अल्पसंख्यकों के खिलाफ भ्रम फैलाने की कोशिश

अमीनुल हसन ने अपने बयान में देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ चलाए जा रहे दुष्प्रचार पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि हाल के सालों में मुस्लिम समुदाय को नागरिकता नियमों, संपत्ति अधिकारों और धार्मिक आजादी से जुड़े कई दबावों का सामना करना पड़ा है।

ठीक इसी तरह ईसाई समुदाय के खिलाफ भी झूठी बातें फैलाई जा रही हैं। यह दावा किया जाता है कि चर्च और मिशनरी संस्थाएं देश का जनसांख्यिकीय ढांचा बदलने की साजिश रच रही हैं।

अमीनुल हसन ने कहा कि यह भूलना नहीं चाहिए कि मुस्लिम, ईसाई, सिख और पारसी संगठनों ने पीढ़ियों से देश के विकास में योगदान दिया है। इन संस्थाओं ने बिना किसी भेदभाव के हर जाति और धर्म के गरीब लोगों की सेवा की है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में इनका काम देश के सामने है।

सरकार और नागरिक समाज के बीच संतुलन की जरूरत

विदेशी चंदे को विनियमित करना किसी भी देश की सुरक्षा के लिए जरूरी माना जाता है। लेकिन इसके नियम इतने सख्त नहीं होने चाहिए कि सामाजिक भलाई का काम ही ठप हो जाए।

जमाअत ए इस्लामी हिंद ने मांग की है कि जेपीसी को एक ऐसा कानूनी ढांचा तैयार करना चाहिए जो पारदर्शिता भी लाए और जनसेवा करने वालों को डराए भी नहीं। सरकार को विदेशी फंडिंग के नियमों को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। वैध धार्मिक गतिविधियों और मानवीय राहत कार्यों पर किसी भी तरह की बेजा रोक नहीं लगनी चाहिए।

क्या हो सकते हैं आगे के रास्ते

अब यह मामला संयुक्त संसदीय समिति के पास है। समिति में लोकसभा और राज्यसभा दोनों के सदस्य शामिल हैं। उम्मीद की जा रही है कि समिति आने वाले महीनों में विभिन्न हितधारकों के सुझाव सुनेगी।

सिविल सोसाइटी की प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:

  • किसी भी संस्था की संपत्ति जब्त करने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिलना चाहिए।
  • कागजी भूल या रिन्यूअल में देरी को आपराधिक कृत्य नहीं माना जाना चाहिए।
  • नामित प्राधिकरण की शक्तियों पर न्यायिक समीक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए।
  • अपील के लिए एक स्वतंत्र ट्रिब्यूनल का गठन किया जाना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 क्या है?

यह एक प्रस्तावित कानून है जिसके जरिए विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले संगठनों के नियमन, लाइसेंस रिन्यूअल और उनकी संपत्तियों के प्रबंधन के लिए नए नियम बनाए जा रहे हैं।

2. इस विधेयक में सबसे विवादित प्रावधान कौन सा है?

सबसे ज्यादा विवाद इस बात पर है कि एफसीआरए लाइसेंस खत्म या रद्द होने पर संस्था की विदेशी फंडिंग से बनी संपत्ति सरकार द्वारा तय नामित प्राधिकारी के कब्जे में चली जाएगी।

3. जेपीसी क्या काम करेगी?

संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी इस विधेयक के हर प्रावधान की बारीकी से जांच करेगी और विपक्ष, कानूनी जानकारों तथा सामाजिक संगठनों की आपत्तियों पर विचार करके अपनी रिपोर्ट संसद में पेश करेगी।

4. जमाअत ए इस्लामी हिंद ने क्या मुख्य मांग रखी है?

जमाअत ने मांग की है कि जेपीसी सभी अल्पसंख्यक और धर्मार्थ संगठनों के प्रतिनिधियों से पारदर्शी बात करे और विधेयक के नुकसानदायक प्रावधानों को हटाए।

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