क्या महिला थानेदार की इंसानियत बनी ‘अपराध’? पूर्णिया की शबाना आजमी पर सोशल मीडिया में विवाद, कार्रवाई की मांग
Table of Contents
मुस्लिम नाउ ब्यूरो,पटना/पूर्णिया
हम सभी ने वो भावनात्मक तस्वीरें देखी हैं—जहां कोई नव नियुक्त अधिकारी अपनी पहली कुर्सी पर बैठाकर अपने माता-पिता या बुजुर्ग परिजनों को वह सम्मान देता है, जो उन्हें बचपन से प्रेरित करता रहा है। कभी कोई अपने पिता को पुलिस की टोपी पहनाता है, तो कोई अपनी मां को कुर्सी पर बिठाकर अपनी उपलब्धि उनके चरणों में समर्पित करता है। सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरें खूब वायरल होती हैं, लोग सराहना करते हैं, प्रेरित होते हैं। लेकिन बिहार के पूर्णिया में कुछ अलग हो रहा है।
यहां महिला थानेदार शबाना आजमी को अपने दादा को थाने की कुर्सी पर बैठाने और उसके साथ एक तस्वीर इंस्टाग्राम पर साझा करने पर विवादों में घेरा जा रहा है। कुछ लोग इसे पुलिस मैनुअल का उल्लंघन बताकर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, तो कईयों को इसमें सांप्रदायिक दृष्टिकोण की बू आ रही है।
मामला क्या है?
27 जुलाई को पूर्णिया जिले के फणीश्वरनाथ रेणु टीओपी की प्रभारी महिला थानेदार शबाना आजमी के कुछ रिश्तेदार उनसे मिलने थाने पहुंचे थे। सामान्य शिष्टाचार के तहत शबाना ने अपने बुजुर्ग रिश्तेदार को थाने की कुर्सी पर बैठाया और कुछ तस्वीरें खिंचवाईं, जो बाद में उन्होंने इंस्टाग्राम पर साझा कीं। तस्वीरों में कहीं भी कोई असंवैधानिक या असभ्य गतिविधि नहीं थी—बल्कि यह एक भावनात्मक क्षण था, जिसे उन्होंने साझा किया।
लेकिन विवाद क्यों?
सोशल मीडिया पर कुछ यूज़र्स ने इसे पुलिस मैनुअल का उल्लंघन बताया और कहा कि सरकारी कुर्सी पर आम नागरिक को बैठाना नियमों के खिलाफ है। यह पोस्ट वायरल होने के बाद पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया है। सूत्रों के अनुसार, इस मामले की जांच शुरू हो चुकी है और डीआईजी स्तर पर कार्रवाई की बात कही जा रही है।
सवाल उठता है: क्या यही पहली बार है?
बिलकुल नहीं। इस देश में तमाम उदाहरण मिलते हैं जब अधिकारियों ने अपने माता-पिता, गुरु या प्रेरणास्रोत को अपनी कुर्सी पर बैठाकर सम्मान दिया है। यहां तक कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी ‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी को एक दिन का मुख्यमंत्री बनाकर अपनी कुर्सी पर बैठाया था। तब किसी ने नियम-कानून का हवाला नहीं दिया था।
क्या मुस्लिम अधिकारी होने के कारण निशाना?
अब यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या शबाना आजमी के मुस्लिम होने की वजह से उनके खिलाफ इतना शोर मचाया जा रहा है? क्या वही काम कोई अन्य अधिकारी करता तो बात इतनी आगे बढ़ती? यह एक सोचने योग्य सामाजिक प्रश्न है।
सोशल मीडिया पर सक्रियता भी बनी ‘गुनाह’
कुछ लोगों ने शबाना आजमी पर यह भी आरोप लगाया है कि वह थानेदारी से ज्यादा सोशल मीडिया पर सक्रिय रहती हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या एक कर्मठ महिला अधिकारी का डिजिटल रूप से जागरूक होना कोई अपराध है? क्या यह व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन नहीं है?
पूर्णिया : SHO शबाना आज़मी ने पिता-दादा को अपनी कुर्सी पर बैठाया तो DIG ने उन पर जांच बैठा दी 🤔
— Vishal JyotiDev Agarwal 🇮🇳 (@JyotiDevSpeaks) August 2, 2025
ये कौन सी बात हुई आखिर…यह उन्होंने सिर्फ अपने पिता व दादा को सम्मान देने के लिए किया होगा, इसमें जांच कराने जैसा क्या है ?? pic.twitter.com/s9270gdPo6
निष्कर्ष:
शबाना आजमी ने जो किया, वह एक भावनात्मक और मानवीय पहलू था। अगर इसे नियम-कानून की कसौटी पर जांचना है, तो पहले उस परंपरा की भी समीक्षा होनी चाहिए जिसमें देशभर के अधिकारी अपने परिजनों को अपनी उपलब्धियों में सम्मिलित करते आए हैं।
शबाना आजमी की एक तस्वीर पर हंगामा मचाने से बेहतर है कि हम भावनात्मक संवेदनाओं की इज्जत करना सीखें, बजाय उन्हें ‘नियम’ की आड़ में कुचलने के।
सवाल अब समाज से है: क्या इंसानियत भी अब अनुमति की मोहताज हो गई है?

