क्या दलाई लामा अब मुसलमानों के दर्द से कतराते हैं?
मुस्लिम नाउ विशेष
तिब्बत के निर्वासित बौद्ध धर्मगुरु और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता दलाई लामा दशकों से अहिंसा, करुणा और धार्मिक सौहार्द्र के प्रतीक माने जाते हैं। लेकिन आज जब ग़ाज़ा, सीरिया, इराक, लेबनान और ईरान जैसे देशों में मुसलमानों पर इज़रायल की बर्बर कार्रवाई हो रही है, तब दलाई लामा की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। क्या यह वही धर्मगुरु हैं जिन्होंने कभी म्यांमार और श्रीलंका में मुसलमानों पर हो रहे बौद्ध हमलों के खिलाफ खुलकर बोला था?
आज ग़ाज़ा में रोज़ा भूखे-नंगों की लाशें गिनती से बाहर हैं, लेकिन शांतिदूत का यह मौन असहज कर देता है। भारत में रह रहे दलाई लामा उस देश में निवास करते हैं जहाँ एक खास विचारधारा मुसलमानों की सांस्कृतिक पहचान को योजनाबद्ध तरीके से मिटाने में जुटी है। मुस्लिम बहुल मोहल्लों में सामूहिक नमाज़ पर आपत्ति जताई जाती है, उनके त्योहारों, नामों और प्रतीकों को निशाना बनाया जाता है। लेकिन इस मौन में न तो कोई नैतिक प्रतिरोध है, न कोई संवेदना।
विडंबना यह है कि जो दलाई लामा कभी बौद्ध बहुल म्यांमार और श्रीलंका में मुसलमानों पर अत्याचार के खिलाफ बुद्ध की करुणा का स्मरण कराते थे, वही अब ग़ाज़ा की बर्बादी पर खामोश हैं। जो धर्मगुरु इस्लाम को आतंकवाद से अलग करने की पुरजोर वकालत करते थे, वही आज उस इस्लाम के अनुयायियों पर हो रहे युद्ध अपराधों के समय कहीं नहीं दिखते।
2014 में उन्होंने लेह में अपने जन्मदिन के अवसर पर हजारों अनुयायियों के सामने बौद्धों से अपील की थी कि वे मुसलमानों पर हमला करने से पहले बुद्ध की छवि की कल्पना करें। उन्होंने कहा था, “बुद्ध प्रेम और करुणा का उपदेश देते हैं। यदि बुद्ध वहाँ होते, तो वे उन मुसलमानों की रक्षा करते जिन पर बौद्ध हमला कर रहे हैं।”
दलाई लामा ने 2016 में यूरोपीय संसद में स्पष्ट शब्दों में कहा था कि “मुस्लिम आतंकवादी” कहना ही गलत है। जो हिंसा करता है, वह असली मुसलमान नहीं हो सकता। उन्होंने धर्मों को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश करते हुए कहा था कि सभी धार्मिक परंपराएँ प्रेम, करुणा, सहिष्णुता, क्षमा और आत्म-अनुशासन का संदेश देती हैं।
तो फिर अब क्या बदल गया? क्या बढ़ती उम्र और राजनीतिक संन्यास ने दलाई लामा की नैतिक मुखरता को जकड़ लिया है? या फिर उन्हें भी अब कूटनीतिक चुप्पी और रणनीतिक तटस्थता का आवरण ओढ़ लेना पड़ा है?
दलाई लामा आज भी चीन के खिलाफ तिब्बत की “सार्थक स्वायत्तता” की बात करते हैं, लेकिन जब दुनिया के सबसे सताए गए समुदाय — फिलीस्तीन के मुसलमानों — पर आधुनिक हथियारों से हमला हो रहा है, तब उनकी चुप्पी उन्हें एकतरफा बना देती है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि भारत और पश्चिम के रणनीतिक गठबंधनों को देखते हुए उन्होंने उन बातों से परहेज़ करना शुरू कर दिया है जो कभी उनके स्वभाव का हिस्सा थीं?
शायद अब दलाई लामा को कोई यह याद नहीं दिला रहा कि शांतिदूत वही होता है जो सिर्फ अपने धर्म या भूभाग के नहीं, बल्कि पूरे मानव समाज की पीड़ा पर बोलने का साहस रखता है।
आज की दुनिया में जब मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को “राजनीतिक अनिवार्यता” की तरह देखा जा रहा है, तब दलाई लामा की चुप्पी भी एक राजनीतिक संकेत बन जाती है — एक असहज और खतरनाक संकेत।

