Culture

हैदराबाद में ‘डॉ. मोहम्मद हमीदुल्लाह मेमोरियल लेक्चर’: सूफियों की सेवाओं और सामाजिक समरसता पर मंथन

मुस्लिम नाउ ब्यूरो,हैदराबाद

Maulana Azad National Urdu University के इस्लामिक स्टडीज़ विभाग के तत्वावधान में “5वां डॉ. मोहम्मद हमीदुल्लाह मेमोरियल लेक्चर” एसए एंड एसएस (SA&SS) के कमेटी रूम में गरिमापूर्ण और विद्वत्तापूर्ण माहौल में आयोजित किया गया। इस वर्ष के व्याख्यान का विषय था— “भारतीय सूफी: सेवाएं, सहिष्णुता और सामाजिक समरसता का संवर्धन”। कार्यक्रम का उद्देश्य भारतीय सूफियों की सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका को रेखांकित करना और वर्तमान समय में शांति, सौहार्द तथा राष्ट्रीय एकता पर गंभीर संवाद स्थापित करना था।

कार्यक्रम की शुरुआत इस्लामिक स्टडीज़ विभाग के रिसर्च स्कॉलर मोहम्मद सलमान दानिश की कुरआन-ए-पाक की तिलावत से हुई। संचालन की जिम्मेदारी डॉ. मुफ्ती मोहम्मद सिराजुद्दीन, सहायक प्रोफेसर, इस्लामिक स्टडीज़ ने संभाली। उन्होंने पूरे कार्यक्रम को सुव्यवस्थित और सारगर्भित ढंग से आगे बढ़ाया, जिससे श्रोताओं को विषय की गहराई समझने में सहूलियत मिली।

सूफी विचारधारा आज भी प्रासंगिक: प्रो. मोहम्मद हबीब

स्वागत भाषण में विभागाध्यक्ष प्रो. मोहम्मद हबीब ने डॉ. मोहम्मद हमीदुल्लाह की बहुमूल्य शैक्षणिक सेवाओं को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि भारतीय सूफियों ने सेवा-ए-ख़लक़, नैतिक शिक्षा और धार्मिक सहिष्णुता के माध्यम से समाज में प्रेम और परस्पर सम्मान की मजबूत नींव रखी।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सूफी चिंतन केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने सामाजिक जीवन के हर पहलू को प्रभावित किया। आज के दौर में, जब समाज विभिन्न प्रकार की वैचारिक और सांप्रदायिक चुनौतियों से जूझ रहा है, सूफी विचारधारा राष्ट्रीय एकता और सामाजिक स्थिरता के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है।

“तौहीद के बाद सूफियों ने सबसे अधिक जोर सहिष्णुता पर दिया”

मुख्य अतिथि और मुख्य वक्ता प्रो. सैयद अलीम अशरफ जैसी, पूर्व अध्यक्ष, अरबी विभाग, मैनू ने अपने व्याख्यान में कहा कि सूफियों ने तौहीद (एकेश्वरवाद) के बाद सबसे अधिक ध्यान आपसी सहिष्णुता और सामाजिक समरसता पर केंद्रित किया।

उन्होंने स्पष्ट किया कि सूफी शिक्षाओं का मूल तत्व प्रेम, भाईचारा और मानवता है। इसी उद्देश्य से सूफियों ने स्थानीय भाषाएं सीखीं और आम जनता से निकट संबंध स्थापित किया। उनका दृष्टिकोण समावेशी था, जिसमें जाति, धर्म या वर्ग के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था।

अपने वक्तव्य में उन्होंने भारतीय सूफी परंपरा के महान संतों—Khwaja Moinuddin Chishti और Nizamuddin Auliya—का उल्लेख करते हुए कहा कि इन संतों की खानकाहें केवल आध्यात्मिक केंद्र नहीं थीं, बल्कि सामाजिक सेवा, धार्मिक सहिष्णुता और लोककल्याण के जीवंत संस्थान थीं। यहां हर वर्ग और हर धर्म के लोगों को समान सम्मान और आदर प्राप्त था।

उन्होंने कहा कि भारतीय समाज की बहुलतावादी संरचना को मजबूत करने में सूफी परंपरा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सूफियों ने संवाद, करुणा और सेवा को अपना माध्यम बनाकर समाज में स्थायी सौहार्द का वातावरण निर्मित किया।

न्याय के बिना स्थायी शांति संभव नहीं: प्रो. मोहम्मद महमूद सिद्दीकी

कार्यक्रम की अध्यक्षता डीन स्टूडेंट्स वेलफेयर प्रो. मोहम्मद महमूद सिद्दीकी ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने कहा कि न्याय और समानता ही स्थायी शांति की बुनियाद हैं। जब तक समाज में न्याय को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा, तब तक वास्तविक सामाजिक समरसता स्थापित नहीं हो सकती।

उन्होंने सूफी शिक्षाओं को न्याय, शांति और मानव समानता के प्रसार का प्रभावी माध्यम बताया। उनके अनुसार, सूफी संतों ने न केवल आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग दिखाया, बल्कि सामाजिक न्याय और नैतिक मूल्यों की स्थापना में भी अहम भूमिका निभाई।

बौद्धिक जागरूकता और सामाजिक संवाद का मंच

कार्यक्रम के अंत में समन्वयक डॉ. आतिफ इमरान, सहायक प्रोफेसर, इस्लामिक स्टडीज़ ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने मुख्य अतिथि, अध्यक्ष, शिक्षकों, छात्रों और आयोजन से जुड़े सभी लोगों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार की अकादमिक बैठकों से बौद्धिक जागरूकता को बढ़ावा मिलता है और समाज में सकारात्मक संवाद की संस्कृति विकसित होती है।

यह स्मारक व्याख्यान शैक्षणिक और वैचारिक दृष्टि से अत्यंत सफल और प्रेरक सिद्ध हुआ। कार्यक्रम ने भारतीय सूफियों की ऐतिहासिक सेवाओं, उनके प्रेम और सहिष्णुता के संदेश तथा समकालीन समाज में उनकी प्रासंगिकता को प्रभावी ढंग से उजागर किया।

वक्ताओं ने एक स्वर में इस बात पर बल दिया कि भारतीय बहुलतावादी समाज की आत्मा को समझने के लिए सूफी परंपरा का अध्ययन आवश्यक है। आज के समय में, जब वैश्विक स्तर पर असहिष्णुता और विभाजन की प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं, सूफी संतों का संदेश—प्रेम, करुणा और मानवता—समाज को नई दिशा देने की क्षमता रखता है।

इस प्रकार, “5वां डॉ. मोहम्मद हमीदुल्लाह मेमोरियल लेक्चर” न केवल एक अकादमिक आयोजन रहा, बल्कि सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता के लिए एक सार्थक पहल भी साबित हुआ।