ईरान में आर्थिक भूचाल: रियाल रिकॉर्ड निचले स्तर पर, जनता में हड़कंप
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो | तेहरान
ईरान इस समय अपने हालिया इतिहास के सबसे गहरे आर्थिक और राजनीतिक संकटों में से एक से गुजर रहा है। अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ बढ़ते सैन्य-राजनीतिक तनाव के बीच ईरान की राष्ट्रीय मुद्रा ईरानी रियाल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई है। मंगलवार, 27 जनवरी 2026 को तेहरान के खुले बाजार में एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 15 लाख ईरानी रियाल दर्ज की गई, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है।
ईरान की कई प्रमुख मुद्रा ट्रैकिंग वेबसाइटों ने इस गिरावट की पुष्टि की है। राजधानी तेहरान की एक्सचेंज दुकानों में मंगलवार को यही दर देखने को मिली, जिससे आम जनता की आर्थिक परेशानियां और गहरी हो गई हैं। दशकों से जारी आर्थिक कुप्रबंधन, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और राजनीतिक अस्थिरता ने पहले ही ईरानी अर्थव्यवस्था को कमजोर कर रखा था, अब मुद्रा के इस ऐतिहासिक पतन ने हालात को और बदतर बना दिया है।

“बाजार सामान्य है”—सरकारी दावा, ज़मीनी हकीकत अलग
ईरान के नव नियुक्त केंद्रीय बैंक गवर्नर अब्दोलनासेर हेम्मती ने रियाल में आई भारी गिरावट को कमतर आंकने की कोशिश करते हुए कहा कि “विदेशी मुद्रा बाजार अपने स्वाभाविक क्रम में काम कर रहा है।” हालांकि आर्थिक विशेषज्ञ और आम नागरिक इस दावे से इत्तेफाक नहीं रखते। बाजार में डॉलर की भारी मांग, महंगाई और बचत के मूल्य में तेज़ गिरावट ने जनता का भरोसा बुरी तरह तोड़ दिया है।
विश्लेषकों का कहना है कि सरकार के बयान और ज़मीनी सच्चाई के बीच फासला लगातार बढ़ता जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि आम ईरानी के लिए रोज़मर्रा की ज़रूरतों का सामान खरीदना भी मुश्किल होता जा रहा है।
बाज़ार बंद, सड़कों पर आक्रोश
रियाल की गिरती कीमत, बेकाबू महंगाई और सरकारी सब्सिडी में कटौती के खिलाफ गुस्सा बीते महीने खुलकर सड़कों पर आ गया था। 28 दिसंबर 2025 को तेहरान के ऐतिहासिक ग्रैंड बाज़ार के दुकानदारों ने विरोध में अपनी दुकानें बंद कर दी थीं। यह विरोध जल्द ही राजधानी से निकलकर पूरे देश में फैल गया।
देखते ही देखते यह आंदोलन सिर्फ आर्थिक मुद्दों तक सीमित न रहकर सरकार विरोधी प्रदर्शनों में बदल गया। प्रदर्शनकारी राजनीतिक बदलाव, जवाबदेही और बेहतर आर्थिक नीतियों की मांग करने लगे।
हिंसक दमन और ऐतिहासिक इंटरनेट ब्लैकआउट
ईरानी सरकार ने इन प्रदर्शनों का जवाब बेहद सख्ती से दिया। सुरक्षा बलों द्वारा की गई हिंसक कार्रवाई की असल तस्वीर अब धीरे-धीरे सामने आ रही है, क्योंकि सरकार ने देश में दो सप्ताह से अधिक समय तक इंटरनेट पूरी तरह बंद रखा—जो ईरान के इतिहास का सबसे व्यापक इंटरनेट ब्लैकआउट माना जा रहा है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इन प्रदर्शनों में कम से कम 3,117 लोगों की मौत हुई, जिनमें से 2,427 को “नागरिक और सुरक्षा बल” बताया गया, जबकि बाकी को “आतंकी” करार दिया गया।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के आंकड़े कहीं अधिक भयावह तस्वीर पेश करते हैं।
मानवाधिकार संगठनों का दावा: मौतों का आंकड़ा कहीं ज़्यादा
अमेरिका स्थित ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज़ एजेंसी ने मंगलवार को जारी अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि प्रदर्शनों के दौरान कम से कम 6,126 लोग मारे गए। संगठन के अनुसार, मृतकों में—
- 5,777 प्रदर्शनकारी
- 214 सरकारी या सुरक्षा बलों से जुड़े लोग
- 86 बच्चे
- 49 ऐसे नागरिक शामिल हैं जो प्रदर्शनों में शामिल नहीं थे
इसके अलावा, रिपोर्ट में 41,800 से अधिक गिरफ्तारियों का भी ज़िक्र किया गया है। एजेंसी ने बताया कि वह हर मौत की पुष्टि ईरान के भीतर मौजूद अपने कार्यकर्ताओं के नेटवर्क से करती है।
एसोसिएटेड प्रेस (AP) ने कहा है कि इंटरनेट बंद होने और संचार बाधित किए जाने के कारण वह इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं कर सका।
विश्लेषकों का मानना है कि यह मौतों का आंकड़ा बीते कई दशकों में ईरान में हुए किसी भी आंदोलन से कहीं अधिक है और यह 1979 की इस्लामी क्रांति के दौर की अराजकता की याद दिलाता है।

अमेरिकी दबाव और युद्ध की आहट
ईरान के आंतरिक संकट के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को कहा कि ईरान को लेकर स्थिति “फ्लक्स में है”। उन्होंने खुलासा किया कि उन्होंने मध्य पूर्व क्षेत्र में एक “बड़ा नौसैनिक बेड़ा” भेजने का आदेश दिया है।
सोमवार को अमेरिकी विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन और उसके साथ चल रहे गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर यूएस सेंट्रल कमांड के क्षेत्र में दाखिल हो चुके हैं। इसे ईरान के नजदीक अमेरिकी सैन्य तैनाती में बड़ा इज़ाफा माना जा रहा है।
हालांकि खाड़ी देशों ने संकेत दिए हैं कि वे किसी संभावित हमले से खुद को दूर रखना चाहते हैं, बावजूद इसके उनके यहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं।
“डिप्लोमेसी अभी भी विकल्प है”—ट्रंप
तनाव के बीच ट्रंप ने यह भी कहा कि कूटनीति का रास्ता अभी बंद नहीं हुआ है।
“वे समझौता करना चाहते हैं। मुझे यह पता है। उन्होंने कई बार संपर्क किया है। वे बात करना चाहते हैं,” ट्रंप ने कहा।
हालांकि तेहरान में इस बयान को दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
ईरान का पलटवार और क्षेत्रीय अस्थिरता
ईरान समर्थित कई सशस्त्र गुटों ने भी संकेत दिए हैं कि यदि अमेरिका या इज़रायल ने हमला किया, तो वे जवाबी कार्रवाई करेंगे। यमन के हूती विद्रोहियों ने रेड सी में शिपिंग पर हमले फिर से शुरू करने की चेतावनी दी है।
इराक में काताइब हिज़्बुल्लाह के नेता अहमद “अबू हुसैन” अल-हमदावी ने कहा,
“इस्लामी गणराज्य के खिलाफ युद्ध कोई पिकनिक नहीं होगा। दुश्मनों को मौत का सबसे कड़वा स्वाद चखना पड़ेगा।”
लेबनान के हिज़्बुल्लाह प्रमुख शेख नाइम क़ासिम ने भी कहा कि संगठन किसी भी संभावित आक्रमण के लिए तैयार है, हालांकि उसने अपनी रणनीति को लेकर स्पष्टता नहीं दी।
गिरती अर्थव्यवस्था, टूटती उम्मीदें
ईरान पहले ही भ्रष्टाचार कम करने के नाम पर सब्सिडी वाली मुद्रा दरों को काफी हद तक सीमित कर चुका है। सरकार आम नागरिकों को महंगाई से राहत देने के लिए महीने के करीब 7 डॉलर के बराबर सहायता देती है, लेकिन यह राशि बढ़ती कीमतों के सामने नाकाफी साबित हो रही है।
हकीकत यह है कि एक दशक पहले जहां एक डॉलर 32,000 रियाल के बराबर था, वहीं आज वही डॉलर 15 लाख रियाल तक पहुंच चुका है। इस गिरावट ने आम ईरानियों की जीवनभर की बचत को लगभग खत्म कर दिया है।
निष्कर्ष: संकट का चक्र गहराता हुआ
विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक दबाव, राजनीतिक अस्थिरता और संभावित युद्ध की आशंका मिलकर ईरान को एक ऐसे मोड़ पर ले आई है, जहां किसी भी छोटी चिंगारी से बड़ा विस्फोट हो सकता है। रियाल की ऐतिहासिक गिरावट सिर्फ एक आर्थिक संकेत नहीं, बल्कि उस व्यापक संकट का प्रतीक है, जिसमें आज ईरान फंसा हुआ है।
अगर हालात में जल्द सुधार नहीं हुआ, तो यह संकट न सिर्फ ईरान बल्कि पूरे पश्चिम एशिया को एक नई और खतरनाक अनिश्चितता की ओर धकेल सकता है।

