बिहार में नफरत ने ली बुजुर्ग की जान: मुस्लिम समुदाय पर आपत्तिजनक टिप्पणी का विरोध करने पर पीट-पीटकर हत्या
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दरभंगा:
बिहार के दरभंगा जिले से एक दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है। यहाँ एक बुजुर्ग मुस्लिम व्यक्ति को सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार दिया गया क्योंकि उन्होंने अपने समुदाय के खिलाफ की गई अभद्र टिप्पणी का विरोध किया था। यह घटना न केवल मानवता को शर्मसार करती है बल्कि समाज में बढ़ती नफरत की गहरी खाई को भी उजागर करती है।
मृतक की पहचान अब्दुल सलाम के रूप में हुई है। उनकी बेटी रहमती खातून ने रोते हुए इस पूरी वारदात का खुलासा किया है।
क्या है पूरा मामला? रमजान और नफरती बोल
यह विवाद एक मामूली बहस से शुरू हुआ था। पड़ोस में रहने वाली विमला देवी नाम की महिला किसी बात पर झगड़ा कर रही थी। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक झगड़े के दौरान विमला देवी ने पूरे मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाते हुए कहा “सब शुगर खा-खा के, रमजान में रोजा रखते हैं सब मुसलमान।”
अब्दुल सलाम उस वक्त वहां से गुजर रहे थे। उन्होंने जब यह नफरती टिप्पणी सुनी तो वह चुप नहीं रह पाए। उन्होंने विनम्रता से विरोध करते हुए कहा “जिसने आपका बुरा किया है उस पर अपना गुस्सा निकालिए, पूरे समुदाय को बीच में मत घसीटिए।”
विरोध करने पर बेरहमी से हमला
अब्दुल सलाम की यह बात विमला देवी के बेटे रौशन को नागवार गुजरी। उसने तुरंत बुजुर्ग का कॉलर पकड़ लिया और दखल देने पर सवाल किया। इस पर अब्दुल सलाम ने निडर होकर जवाब दिया “अगर तुम सभी मुसलमानों के खिलाफ ऐसी बात कहोगे, तो मैं इसका विरोध जरूर करूँगा।”
इतना सुनते ही रौशन का बड़ा भाई मनीष पीछे से एक लोहे की रॉड लेकर आया। उसने अब्दुल सलाम की रीढ़ की हड्डी के पास जोर से वार किया। चोट इतनी गंभीर थी कि बुजुर्ग वहीं जमीन पर गिर पड़े। रहमती खातून ने बताया कि उनके पिता के गिरने के बाद भी हमलावरों का दिल नहीं पसीजा। वे मरने के बाद भी उनके शरीर पर लातें मारते रहे।
अब्दुल सलाम को तुरंत कीरतपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। वहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
बेटी की इंसाफ की पुकार: “कातिल को मिले फांसी”
रहमती खातून ने प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने कहा “हमें बस इतना इंसाफ चाहिए कि मनीष राम को मौत की सजा हो। उनके परिवार की महिलाओं को भी उम्रकैद मिले क्योंकि वे भी इस नफरत में शामिल थीं।”
परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है। गांव में मातम का माहौल है। अब्दुल सलाम को उनके शांत स्वभाव और नेक इंसान के तौर पर जाना जाता था। उनकी मौत ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है।
साजिश और झूठी कहानी का पर्दाफाश
घटना के तुरंत बाद आरोपी परिवार ने खुद को बचाने के लिए एक नई कहानी गढ़ी। उन्होंने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की और दावा किया कि मुस्लिम समुदाय के लोगों ने उनके घर पर हमला किया है।
हालांकि पुलिस ने जब गांव वालों से पूछताछ की तो सच सामने आ गया। ग्रामीणों ने बताया कि स्थिति बिल्कुल उलट थी। स्थानीय निवासियों ने पुलिस को बताया कि अगर मुस्लिम समुदाय के लोग सब्र न करते तो स्थिति भयावह हो सकती थी। पुलिस ने भी मुस्लिम समुदाय की सराहना की कि उन्होंने हिंसा का रास्ता नहीं अपनाया और कानून पर भरोसा जताया।
बिहार में बढ़ती नफरत की घटनाएं
यह पहली बार नहीं है जब बिहार में इस तरह की घटना हुई है। हाल ही में एक और मामला सामने आया था जहाँ रमजान का रोजा रख रही एक महिला को जबरन शराब और पेशाब मिला हुआ पानी पिलाया गया था जिससे उसकी मौत हो गई थी।
दरभंगा की यह घटना बताती है कि किस तरह छोटी-छोटी बातें अब सांप्रदायिक रंग ले रही हैं। सोशल मीडिया और राजनीतिक बयानों से उपजी नफरत अब पड़ोसियों के बीच की दीवार बन रही है।
पुलिस की कार्रवाई और सुरक्षा के इंतजाम
घटना के बाद इलाके में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपियों की तलाश तेज कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। शांति बनाए रखने के लिए स्थानीय शांति समिति की बैठकें भी बुलाई जा रही हैं।
निष्कर्ष: अब्दुल सलाम की हत्या महज एक आपराधिक मामला नहीं है। यह हमारे समाज के उस कड़वे सच का हिस्सा है जहाँ एक बुजुर्ग को सिर्फ सच बोलने और अपने सम्मान की रक्षा करने पर जान गंवानी पड़ी। क्या अब किसी के खिलाफ नफरत फैलाना इतना आसान हो गया है कि कोई भी कानून हाथ में ले ले?
क्या आपको लगता है कि इस तरह के नफरती अपराधों (Hate Crimes) के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई होनी चाहिए? अपनी राय साझा करें।
डिस्क्लेमर: यह खबर स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों पर आधारित है। पुलिस मामले की गहन जांच कर रही है।

