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OIC की निंदा पर भड़के मुसलमान: क्या ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन’ अब सिर्फ ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ कंडमनेशन’ बनकर रह गया है?

दुबई/तेहरान:

मिडिल ईस्ट में बारूद की गंध और आसमान से बरसती मिसाइलों के बीच एक बार फिर मुस्लिम देशों के सबसे बड़े संगठन ‘ओआईसी’ (OIC) ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। लेकिन यह चुप्पी किसी ठोस कार्रवाई के लिए नहीं, बल्कि एक बार फिर उसी घिसे-पिटे ‘निंदा पत्र’ के लिए टूटी है। इजरायल और ईरान के बीच छिड़े भीषण युद्ध और वेस्ट बैंक में फिलिस्तीनियों के कत्लेआम पर ओआईसी के ताजा बयान ने दुनिया भर के मुसलमानों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है।

सोशल मीडिया से लेकर गलियारों तक, लोग अब खुलेआम पूछ रहे हैं कि क्या यह संगठन केवल कागजी शेर बनकर रह गया है?


सऊदी अरब पर ईरान का हमला: भारत और बांग्लादेश के नागरिकों की मौत

इस युद्ध की आग अब खाड़ी देशों के रिहायशी इलाकों तक पहुंच चुकी है। रविवार को सऊदी अरब के अल-खर्ज (Al-Kharj) शहर में एक बड़ा हादसा हुआ। ईरान की ओर से दागी गई एक मिसाइल (Projectile) सीधे रिहायशी इलाके में जा गिरी।

सऊदी सिविल डिफेंस के मुताबिक, इस हमले में दो निर्दोष लोगों की जान चली गई। मरने वालों में एक भारतीय और एक बांग्लादेशी नागरिक शामिल है। इसके अलावा 12 अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने इस हमले की जिम्मेदारी लेते हुए दावा किया कि उन्होंने अल-खर्ज में स्थित रडार सिस्टम और अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया था।

यह घटना दर्शाती है कि ईरान अब उन खाड़ी देशों को भी नहीं बख्श रहा है, जो अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका या इजरायल की मदद कर रहे हैं।


वेस्ट बैंक में कत्लेआम और ओआईसी की ‘जुबानी जंग’

एक तरफ खाड़ी में मिसाइलें बरस रही हैं, वहीं दूसरी तरफ कब्जे वाले वेस्ट बैंक में इजरायली सेना और चरमपंथी बसने वालों (Settlers) का आतंक चरम पर है। रविवार को वेस्ट बैंक के कई गांवों में पांच फिलिस्तीनी नागरिकों की हत्या कर दी गई।

इस घटना के बाद ओआईसी के जनरल सेक्रेटेरिएट ने एक बयान जारी किया। उन्होंने इसे ‘व्यवस्थित आतंकवाद’ और ‘घिनौना अपराध’ करार दिया। ओआईसी ने कहा कि इजरायल अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन कर रहा है और दुनिया को इस पर प्रतिबंध लगाने चाहिए।

लेकिन, मुस्लिम जगत के आम नागरिक अब इन शब्दों से ऊब चुके हैं। लोगों का कहना है कि जब हकीकत में अपनों का खून बह रहा हो, तब ‘कड़े शब्दों में निंदा’ करना किसी मजाक से कम नहीं लगता।


सोशल मीडिया पर फूटा गुस्सा: ‘ओआईसी’ या ‘ओह आई सी’?

जैसे ही ओआईसी ने अपना बयान एक्स (ट्विटर) पर पोस्ट किया, आलोचनाओं की बाढ़ आ गई। मुस्लिम समुदाय के युवाओं और बुद्धिजीवियों ने संगठन को आईना दिखाना शुरू कर दिया।

  • मोहम्मद नाम के एक यूजर ने लिखा, “हम आपकी खाली निंदाओं से थक चुके हैं। या तो ईरान और फिलिस्तीन के साथ खड़े हो जाओ, या अपने नाम से इस्लाम शब्द हटा दो।”
  • लियोन स्मिथ ने तंज कसते हुए इसे “ओह आई सी…” (Oh I See) करार दिया। उन्होंने याद दिलाया कि ओआईसी के 31 सदस्य देश तो इजरायल को मान्यता देते हैं, फिर कार्रवाई की उम्मीद किससे करें?
  • इरफान अली ने तो संगठन का नया नाम ही रख दिया— ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ इजरायल कोऑपरेशन’

ज्यादातर यूजर्स का एक ही सवाल था कि जब आपके देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं, जिनसे ईरान पर हमले हो रहे हैं, तो आपकी निंदा का क्या मतलब रह जाता है?


क्या ओआईसी सच में अप्रासंगिक हो चुका है?

जानकारों का मानना है कि ओआईसी इस वक्त अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। संगठन के भीतर गुटबाजी चरम पर है। एक तरफ सऊदी अरब, यूएई और जॉर्डन जैसे देश हैं जो अमेरिका के साथ संतुलन बनाकर चलना चाहते हैं। दूसरी तरफ ईरान है जो सीधे तौर पर इजरायल से लोहा ले रहा है।

इस खींचतान में सबसे ज्यादा नुकसान फिलिस्तीन के आम नागरिकों का हो रहा है। ओआईसी के पास न तो अपनी कोई सेना है और न ही वह अपने सदस्यों को इजरायल के साथ व्यापारिक रिश्ते तोड़ने के लिए मजबूर कर पा रहा है।


ट्रंप और इजरायल की बढ़ती धमकियां

इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया है। ट्रंप का कहना है कि अगर ईरान ने उनकी शर्तों पर आत्मसमर्पण नहीं किया, तो अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहे। इजरायल ने भी साफ कर दिया है कि वह ईरान के परमाणु ठिकानों और नए नेतृत्व को निशाना बनाने से पीछे नहीं हटेगा।

ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर कलीबाफ ने पलटवार करते हुए कहा है कि तेहरान घुटने नहीं टेकेगा और हमलावरों को सजा दी जाएगी।

निष्कर्ष: शब्दों से आगे बढ़ने की जरूरत

दुनिया भर के मुसलमानों के लिए ओआईसी एक उम्मीद की किरण हुआ करता था। लेकिन आज यह संगठन केवल एक ‘डिबेटिंग क्लब’ बनकर रह गया है। अल-खर्ज में मरे भारतीय और बांग्लादेशी नागरिक हों, या वेस्ट बैंक में शहीद हुए फिलिस्तीनी—इनकी मौत पर केवल ट्वीट करना काफी नहीं है।

मुस्लिम उम्माह अब ठोस आर्थिक और कूटनीतिक कदमों की मांग कर रहा है। अगर ओआईसी ने जल्द ही अपनी नीतियों में बदलाव नहीं किया, तो वह इतिहास के पन्नों में एक ‘बेअसर संस्था’ बनकर सिमट जाएगा।