हेनले इंडेक्स 2026: पासपोर्ट पावर 2026 में UAE ने अमेरिका-ब्रिटेन को पछाड़ा
भारत 75वें, पाकिस्तान 97वें पायदान पर,नेपाल भी आगे निकला
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, दुबई
वैश्विक परिदृश्य में किसी देश की वास्तविक ताकत को मापने के कई पैमाने होते हैं—आर्थिक विकास, सैन्य शक्ति, कूटनीतिक प्रभाव और तकनीकी क्षमता। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा सूचकांक भी है, जो किसी देश की वैश्विक स्वीकार्यता और नागरिकों की अंतरराष्ट्रीय गतिशीलता को सीधे तौर पर दर्शाता है—पासपोर्ट की ताकत। इसी कसौटी पर दुनिया के देशों को परखता है प्रतिष्ठित Henley & Partners द्वारा जारी किया जाने वाला Henley Passport Index। वर्ष 2026 के लिए जारी ताजा इंडेक्स ने कई स्थापित धारणाओं को चुनौती दी है और यह दिखाया है कि वैश्विक शक्ति संतुलन किस तरह बदल रहा है।
ताजा रैंकिंग में एशियाई देशों का दबदबा बरकरार है। पहले स्थान पर सिंगापुर का पासपोर्ट है, जो अपने नागरिकों को सर्वाधिक देशों में वीज़ा-फ्री या वीज़ा-ऑन-अराइवल प्रवेश की सुविधा देता है। दूसरे स्थान पर जापान और दक्षिण कोरिया संयुक्त रूप से काबिज हैं, जबकि तीसरे स्थान पर यूरोप का कल्याणकारी राष्ट्र स्वीडन है।
लेकिन सबसे चौंकाने वाली उपलब्धि खाड़ी क्षेत्र से आई है। संयुक्त अरब अमीरात ने चौथा स्थान हासिल कर अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, चीन और रूस जैसे परंपरागत रूप से शक्तिशाली देशों को पीछे छोड़ दिया है। यह उपलब्धि केवल एक रैंकिंग नहीं, बल्कि बीते वर्षों में अमीरात की आक्रामक कूटनीति, निवेश-आधारित विकास मॉडल और वैश्विक संपर्कों की सफलता का प्रमाण है। दुबई और अबू धाबी को अंतरराष्ट्रीय व्यापार, पर्यटन और निवेश के हब के रूप में स्थापित करने की रणनीति ने पासपोर्ट की ताकत को भी नई ऊंचाई दी है।
दूसरी ओर, सूची के अंतिम पायदान पर अफगानिस्तान का नाम दर्ज है। लंबे समय से जारी राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और अंतरराष्ट्रीय अलगाव के कारण अफगान पासपोर्ट धारकों को विश्व में सबसे कम देशों में वीज़ा-फ्री प्रवेश मिलता है। यह स्थिति इस बात की भी गवाही देती है कि वैश्विक समुदाय किसी देश की आंतरिक स्थिरता और शासन व्यवस्था को कितनी अहमियत देता है।
दक्षिण एशिया के परिप्रेक्ष्य में देखें तो कई दिलचस्प तथ्य सामने आते हैं। बांग्लादेश ने 93वां स्थान हासिल किया है, जो पाकिस्तान से चार पायदान बेहतर है। पाकिस्तान 97वें स्थान पर है, जबकि नेपाल 95वें स्थान पर रहते हुए पाकिस्तान से आगे है। यह तुलना क्षेत्रीय राजनीति और आर्थिक विकास की बदलती तस्वीर को उजागर करती है।

भारत की स्थिति भी बहुत संतोषजनक नहीं है। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले लोकतंत्र भारत को इस वर्ष 75वां स्थान मिला है। हालांकि भारत की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है और वैश्विक मंचों पर उसकी भूमिका सशक्त हुई है, लेकिन पासपोर्ट की ताकत के मामले में अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि वीज़ा-फ्री समझौतों की संख्या और द्विपक्षीय संबंधों का विस्तार इस दिशा में महत्वपूर्ण कारक होंगे।
खाड़ी और मुस्लिम बहुल देशों की स्थिति पर नजर डालें तो कई देश अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं। मलेशिया ने छठा स्थान प्राप्त कर अमेरिका और ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देशों से बेहतर प्रदर्शन किया है। यह उपलब्धि मलेशिया की स्थिर अर्थव्यवस्था, संतुलित विदेश नीति और दक्षिण-पूर्व एशिया में मजबूत क्षेत्रीय सहयोग का परिणाम मानी जा रही है।
इसी तरह कतर 46वें, कुवैत 48वें और मालदीव 49वें स्थान पर हैं। सऊदी अरब 52वें, बहरीन 53वें और ओमान 54वें स्थान पर हैं। मध्य एशिया का कजाकिस्तान 58वें स्थान पर है, जबकि इंडोनेशिया और मोरक्को 62वें स्थान पर संयुक्त रूप से मौजूद हैं।
वहीं मिस्र और जॉर्डन 81वें स्थान पर हैं, जबकि यमन और इराक क्रमशः 98वें और 99वें पायदान पर हैं। इन रैंकिंग्स से स्पष्ट होता है कि जिन देशों में राजनीतिक अस्थिरता, आंतरिक संघर्ष या आर्थिक संकट अधिक है, वहां पासपोर्ट की वैश्विक स्वीकार्यता भी कमज़ोर होती है।
दरअसल, पासपोर्ट इंडेक्स केवल यात्रा की सुविधा का आंकड़ा नहीं है; यह किसी देश की अंतरराष्ट्रीय साख, आर्थिक विश्वसनीयता और कूटनीतिक नेटवर्क का प्रतिबिंब है। जिन देशों के पासपोर्ट मजबूत हैं, वे व्यापक वीज़ा-फ्री समझौतों और भरोसेमंद राजनयिक संबंधों के कारण वैश्विक मंच पर अधिक स्वीकार्य होते हैं। इसके विपरीत, जिन देशों में अस्थिरता, संघर्ष या प्रतिबंधों का माहौल है, वहां के नागरिकों को यात्रा प्रतिबंधों और कठोर वीज़ा प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता है।
2026 का यह इंडेक्स बताता है कि शक्ति का पारंपरिक पैमाना बदल रहा है। अब केवल सैन्य ताकत या जीडीपी ही निर्णायक नहीं है, बल्कि वैश्विक भरोसा और कूटनीतिक पहुंच भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। खाड़ी और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई मुस्लिम बहुल देशों ने इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है।
स्पष्ट है कि पासपोर्ट की ताकत किसी देश की समग्र स्थिरता, आर्थिक प्रगति और वैश्विक सहभागिता का दर्पण है। जो देश निचले पायदान पर हैं, वहां आंतरिक चुनौतियां अधिक हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का भरोसा सीमित है। वहीं शीर्ष पर मौजूद देश यह संदेश देते हैं कि स्थिर शासन, मजबूत अर्थव्यवस्था और संतुलित विदेश नीति नागरिकों को वैश्विक गतिशीलता का विशेषाधिकार दिला सकती है।
दुबई से जारी इस रिपोर्ट का सार यही है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में पासपोर्ट केवल यात्रा दस्तावेज नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता का प्रतीक बन चुका है।

