भोजशाला पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, सुप्रीम कोर्ट जाएगा मुस्लिम पक्ष
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, भोपाल
मध्य प्रदेश के धार स्थित बहुचर्चित भोजशाला विवाद पर हाई कोर्ट के फैसले ने नई कानूनी और राजनीतिक बहस छेड़ दी है। इंदौर बेंच ने 15 मई को अपने अहम फैसले में कहा कि भोजशाला का धार्मिक स्वरूप देवी सरस्वती के मंदिर का संकेत देता है। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि मुस्लिम पक्ष यदि चाहे तो धार जिले में मस्जिद निर्माण के लिए राज्य सरकार से अलग जमीन मांग सकता है। इस फैसले के बाद साफ हो गया है कि वर्षों पुराना यह विवाद अभी खत्म नहीं हुआ है। अब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचेगा।
मुस्लिम पक्ष ने हाई कोर्ट के फैसले पर असहमति जताई है और इसे सर्वोच्च अदालत में चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट इस आदेश को पलटेगा। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि इस फैसले में बाबरी मस्जिद मामले जैसी समानताएं दिख रही हैं और मुसलमानों को इंसाफ अब सुप्रीम कोर्ट से मिलने की उम्मीद है।
भोजशाला परिसर को लेकर दशकों से विवाद चला आ रहा है। हिंदू पक्ष इसे देवी सरस्वती का प्राचीन मंदिर मानता है। वहीं मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद कहता है। इस विवाद में जैन समुदाय ने भी दावा किया है कि यह स्थल एक प्राचीन जैन मंदिर और गुरुकुल रहा है। यही वजह है कि यह मामला सिर्फ दो समुदायों तक सीमित नहीं रहा बल्कि ऐतिहासिक और धार्मिक दावों का जटिल स्वरूप ले चुका है।
हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने अपने फैसले में कहा कि उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों, पुरातात्विक प्रमाणों और एएसआई की रिपोर्ट से यह संकेत मिलता है कि भोजशाला में कभी संस्कृत शिक्षा केंद्र और देवी सरस्वती का मंदिर मौजूद था। अदालत ने कहा कि विवादित परिसर का धार्मिक चरित्र मंदिर की ओर इशारा करता है।
फैसले में अदालत ने यह भी कहा कि यदि मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी मस्जिद निर्माण के लिए जमीन मांगती है तो राज्य सरकार इस पर विचार कर सकती है। हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट नहीं किया कि मस्जिद के लिए जमीन देना अनिवार्य होगा या नहीं। लेकिन इस टिप्पणी को फैसले का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
हाई कोर्ट ने साल 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई के उस आदेश को भी रद्द कर दिया जिसमें हिंदुओं को मंगलवार और मुसलमानों को शुक्रवार को पूजा और नमाज की अनुमति दी गई थी। इसी व्यवस्था के तहत वर्षों से शुक्रवार को नमाज और अन्य दिनों में पूजा होती रही थी। हिंदू पक्ष लंबे समय से इस व्यवस्था का विरोध कर रहा था और परिसर में विशेष पूजा अधिकार की मांग कर रहा था।
फैसले से पहले धार प्रशासन पूरी तरह सतर्क नजर आया। शुक्रवार की नमाज और कोर्ट के फैसले का समय एक ही दिन पड़ने के कारण सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। करीब 1200 पुलिसकर्मियों को भोजशाला परिसर और आसपास तैनात किया गया। प्रशासन ने इलाके में बैरिकेडिंग की और सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक सामग्री फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी।
धार कलेक्टर राजीव रंजन मीणा ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की थी। प्रशासन को आशंका थी कि फैसले के बाद माहौल संवेदनशील हो सकता है। हालांकि फैसले के बाद किसी बड़ी अप्रिय घटना की खबर सामने नहीं आई।
इस विवाद की कानूनी सुनवाई इसी साल तेज हुई थी। हाई कोर्ट की इंदौर बेंच के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर नियमित सुनवाई शुरू की थी। 6 मई से शुरू हुई सुनवाई के दौरान हिंदू, मुस्लिम और जैन पक्षों ने अपने अपने दावे अदालत के सामने रखे।
मामले की सुनवाई के दौरान हजारों दस्तावेज, ऐतिहासिक रिकॉर्ड और पुरातात्विक रिपोर्ट अदालत के सामने पेश की गईं। सुनवाई पूरी होने के बाद 12 मई को अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। आखिरकार 15 मई को इस बहुप्रतीक्षित फैसले का ऐलान हुआ।
इस पूरे मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट अहम रही। मार्च 2024 में हाई कोर्ट ने एएसआई को भोजशाला परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था। इसके बाद 22 मार्च से सर्वे शुरू हुआ और करीब 98 दिन तक चला। एएसआई ने 15 जुलाई को अपनी 2000 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट अदालत को सौंपी।
रिपोर्ट में दावा किया गया कि वर्तमान ढांचे से पहले यहां परमार राजाओं के समय की एक विशाल संरचना मौजूद थी। एएसआई ने यह भी कहा कि मौजूदा निर्माण में मंदिर से जुड़े अवशेषों का इस्तेमाल किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार खुदाई और सर्वे में मूर्तियां, सिक्के और शिलालेख जैसे कई प्रमाण मिले जो मंदिर की ओर संकेत करते हैं।
हालांकि मुस्लिम पक्ष ने एएसआई की रिपोर्ट को पक्षपातपूर्ण बताया। अदालत में दलील दी गई कि रिपोर्ट हिंदू पक्ष के दावों को मजबूत करने के मकसद से तैयार की गई है। इस पर एएसआई ने जवाब दिया कि सर्वे पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया से हुआ और विशेषज्ञों की टीम में मुस्लिम समुदाय के सदस्य भी शामिल थे।
फैसले के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गई हैं। ओवैसी ने जहां इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही, वहीं हिंदू संगठनों ने फैसले का स्वागत किया है। कुछ संगठनों ने इसे ऐतिहासिक फैसला बताया है। दूसरी तरफ मुस्लिम संगठनों का कहना है कि वे कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखेगा या उसमें बदलाव करेगा। बाबरी मस्जिद और ज्ञानवापी जैसे मामलों के बाद भोजशाला विवाद को भी देश के बड़े धार्मिक और संवैधानिक मामलों में गिना जाने लगा है।
फिलहाल इतना तय है कि हाई कोर्ट के फैसले ने बहस को खत्म नहीं किया बल्कि उसे नई अदालत की चौखट तक पहुंचा दिया है। अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं जहां यह तय होगा कि भोजशाला आखिर मंदिर है, मस्जिद है या इतिहास और आस्था के बीच उलझा एक ऐसा विवाद जो अभी लंबा चलने वाला है।

