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कोटद्वार में इंसानियत की जीत: ‘मुहम्मद दीपक’ बनकर कट्टरपंथियों के सामने ढाल बने जिम ट्रेनर

कोई भी समाज नफरत की बुनियाद पर न तो बनता है और न ही लंबे समय तक टिकता है। भारत की विविधतापूर्ण संस्कृति की असली ताक़त आपसी सम्मान, सह-अस्तित्व और इंसानियत में निहित है। जब-जब देश को नफरत और विभाजन की ओर धकेलने की कोशिशें होती हैं, तब-तब कुछ घटनाएं सामने आकर यह याद दिला देती हैं कि ज़मीर अभी ज़िंदा है। उत्तराखंड के कोटद्वार से सामने आई एक ऐसी ही घटना ने सांप्रदायिक सोच रखने वालों को आईना दिखाया है और इंसानियत की जीत का संदेश दिया है।

कोटद्वार में लंबे समय से कपड़े और गारमेंट का व्यापार करने वाले एक बुजुर्ग दुकानदार हाल ही में कुछ कट्टरपंथी तत्वों के निशाने पर आ गए। उनकी ‘गलती’ सिर्फ़ इतनी थी कि उनकी दुकान के बाहर ‘बाबा’ नाम लिखा हुआ था। आम भारतीय समाज में ‘बाबा’ शब्द का इस्तेमाल बुजुर्गों के लिए सम्मानसूचक संबोधन के रूप में किया जाता है, लेकिन नफरत की राजनीति से प्रेरित कुछ लोगों ने इसे मुद्दा बनाकर बुजुर्ग को परेशान करना शुरू कर दिया। आरोप-प्रत्यारोप और दबाव का सिलसिला यहां तक पहुंच गया कि उनसे कहा जाने लगा—अगर दुकान का नाम ‘बाबा’ लिखा है तो बाबा बनकर दिखाओ, साधु बन जाओ।

स्थानीय लोगों के मुताबिक़, बुजुर्ग दुकानदार इलाके में अपनी ईमानदारी और सादगी के लिए जाने जाते हैं। वर्षों से उनका कारोबार शांति से चल रहा था और समाज के हर वर्ग के लोग उनसे सम्मानपूर्वक पेश आते रहे हैं। लेकिन हाल के दिनों में बढ़ती मुस्लिम-विरोधी मानसिकता के चलते कुछ तत्वों को उनका इस तरह शांति से जीवन जीना रास नहीं आया। नतीजतन, उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश की गई।

इसी दौरान वहां मौजूद एक युवा जिम ट्रेनर दीपक कुमार ने साहसिक पहल करते हुए बुजुर्ग का पक्ष लिया और कट्टरपंथियों के सामने ढाल बनकर खड़े हो गए। दीपक ने न सिर्फ़ उनका विरोध किया बल्कि स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी को भी धर्म के नाम पर परेशान करना गलत है। जब उकसाने के इरादे से उनसे उनका नाम पूछा गया, तो दीपक ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया—“मेरा नाम मुहम्मद दीपक है।” यह जवाब सुनकर वहां मौजूद लोग असहज हो गए और मामला वहीं शांत हो गया।

घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में दीपक का आत्मविश्वास, बेखौफ अंदाज़ और इंसानियत के पक्ष में खड़ा होना साफ़ दिखाई देता है। सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोग दीपक की सराहना कर रहे हैं। मुसलमानों के साथ-साथ सेक्युलर सोच रखने वाले लोग भी उन्हें ‘इंसानियत का सिपाही’ बता रहे हैं। कई यूज़र्स का कहना है कि ऐसे लोग ही भारत की असली पहचान हैं, जो नफरत के दौर में मोहब्बत की मिसाल पेश करते हैं।

खुद दीपक कुमार का कहना है कि उनके लिए हिंदू या मुसलमान से पहले इंसान होना मायने रखता है। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने एक बुजुर्ग को बेवजह परेशान होते देखा, तो चुप रहना उन्हें गवारा नहीं था। “अगर इंसानियत के नाम पर खड़ा होना पड़े, तो मैं हमेशा खड़ा रहूंगा,” दीपक ने दो टूक कहा।

कोटद्वार की यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि समाज में नफरत फैलाने वाले चाहे जितने सक्रिय हो जाएं, इंसानियत की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता। दीपक कुमार जैसे लोग उम्मीद की वह किरण हैं, जो अंधेरे समय में रास्ता दिखाती है। यह घटना न सिर्फ़ उत्तराखंड बल्कि पूरे देश के लिए एक संदेश है कि नफरत का जवाब नफरत नहीं, बल्कि साहस, समझदारी और इंसानियत से दिया जाना चाहिए।