क्या ओवैसी को चुनावी ‘सेक्युलर गठबंधन’ से बाहर करने की तैयारी है? मदनी की बैठक और भागवत के संवाद की पड़ताल
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मौलाना मदनी की बैठकें, ओवैसी की दूरी और आरएसएस प्रमुख की ‘सद्भावना पहल’: क्या कोई नई मुस्लिम रणनीति आकार ले रही है?
मुस्लिम नाउ विशेष रिपोर्ट | नई दिल्ली
बिहार विधानसभा चुनाव की आहट के बीच दिल्ली की सियासत में अचानक मुस्लिम नेतृत्व और बुद्धिजीवियों की गतिविधियाँ तेज़ हो गई हैं। जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी की अगुवाई में एक ओर जहां देशभर के मुस्लिम सांसदों की बैठक आयोजित की गई, वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने प्रमुख मुस्लिम शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से निजी संवाद की पहल की। लेकिन इन दोनों घटनाओं की पृष्ठभूमि और निहितार्थ को लेकर कई अहम सवाल उठ खड़े हुए हैं, जिनमें सबसे ज़्यादा चौंकाने वाला पहलू है—एआईएमआईएम प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी की इन दोनों मंचों से अनुपस्थिति।

मदनी की पंचतारा बैठक: मुद्दे गंभीर, मंशा संदिग्ध?
दिल्ली के पांच सितारा शांगरी-ला होटल में मौलाना महमूद मदनी ने विभिन्न विपक्षी दलों के सांसदों को आमंत्रित कर एक विशेष बैठक का आयोजन किया। इस बैठक में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, टीएमसी, डीएमके, बीजेडी, मुस्लिम लीग और अन्य पार्टियों के प्रभावशाली सांसदों ने शिरकत की। बैठक में फ़िलिस्तीन पर भारत सरकार के रुख, असम में बंगाली भाषी मुसलमानों पर कथित अत्याचार, नफरत फैलाने वाली घटनाएं और बिहार में जाति आधारित सर्वे जैसे संवेदनशील मुद्दों पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई।
मदनी ने फ़िलिस्तीन और असम को लेकर जो दो प्रमुख बिंदु उठाए, वे निश्चित ही गंभीर थे। उन्होंने कहा कि भारत की फिलिस्तीन नीति उसकी ऐतिहासिक नैतिकता और वैश्विक पहचान के विरुद्ध है। वहीं, असम में मुसलमानों की बेदखली को एक ‘संगठित, विधिविरुद्ध और साम्प्रदायिक कार्रवाई’ करार देते हुए सर्वदलीय जांच दल भेजे जाने की माँग की।
सांसदों ने इस पर सहमति भी जताई। लेकिन सवाल ये है कि इतने अहम मुद्दों पर इस प्रकार की बैठक पहले क्यों नहीं हुई? वक्फ संशोधन विधेयक जैसे मौलिक मुस्लिम अधिकारों के मामले पर क्या महमूद मदनी ने कभी इतनी सक्रियता दिखाई? क्या वे इस पंचतारा एकजुटता के ज़रिए उन मुस्लिम नेताओं को संदेश दे रहे हैं जो वक्फ विधेयक के खिलाफ जमीनी आंदोलन चला रहे हैं?

ओवैसी की गैरमौजूदगी: रणनीतिक चुप्पी या बहिष्कार?
इस समूची कवायद में असदुद्दीन ओवैसी की अनुपस्थिति चौंकाने वाली रही। ओवैसी, जो मुस्लिम मुद्दों पर सबसे स्पष्ट और निर्भीक आवाज़ माने जाते हैं, न तो मदनी की बैठक में शामिल हुए और न ही उस ‘बुद्धिजीवी संवाद’ में दिखे जो आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने आयोजित किया।
क्या यह उनकी सधी हुई रणनीति है? या फिर उन्हें जानबूझकर इन मंचों से दूर रखा गया? बिहार चुनाव के पहले इस तरह के घटनाक्रम क्या इस बात का संकेत हैं कि तथाकथित सेक्युलर खेमा ओवैसी को चुनावी दौड़ से बाहर करने की कोशिश कर रहा है?
यह सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं कि दिल्ली के पंचतारा होटल में इतनी बड़ी बैठक आयोजित करने में आखिर किसने खर्च उठाया? क्या वाकई ये एक स्वतंत्र मंच था या पर्दे के पीछे कोई और ताकत इसकी स्क्रिप्ट लिख रही थी?

संघ प्रमुख की पहल: ‘संवाद’ या ‘समझौता’?
इधर, ठीक उसी समय जब मदनी सांसदों के साथ ‘मुस्लिम मुद्दों’ पर बैठक कर रहे थे, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी मुस्लिम बुद्धिजीवियों से निजी संवाद कर रहे थे। इस बंद कमरे की बैठक में लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद और धर्मगुरु शामिल थे। भागवत ने इस संवाद में यह स्पष्ट किया कि संघ किसी भी धर्म के विरोध में नहीं है।
उन्होंने कहा, “हम जोड़ने का काम करते हैं, तोड़ने का नहीं।” उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिम समाज को शिक्षा, रोज़गार और समाज सेवा में आगे आकर राष्ट्र निर्माण में भूमिका निभानी चाहिए।
संघ प्रमुख की यह ‘सद्भावना पहल’ राजनीतिक रूप से चाहे जितनी भी परिपक्व लगे, लेकिन यह सवाल अनदेखा नहीं किया जा सकता कि क्या यह मुस्लिम समाज की असुरक्षा की भावना को शांत करने की एक रणनीति है या सचमुच ‘संघ’ में आत्मचिंतन की प्रक्रिया शुरू हुई है?
कई मुस्लिम प्रतिनिधियों ने इस बैठक में अपनी चिंता खुलकर व्यक्त की। मोहन भागवत ने संयम से सब सुना और आश्वस्त किया कि संघ किसी भी प्रकार के उन्माद या घृणा का समर्थन नहीं करता।
बुद्धिजीवियों का मंच या प्रयोगशाला?
अब सवाल यह है कि जिन मुस्लिम ‘बुद्धिजीवियों’ को आरएसएस से संवाद के लिए प्रस्तुत किया गया, उनमें कितने ज़मीनी स्तर के नेता थे? क्या वे वास्तव में मुस्लिम समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं? सूत्र बताते हैं कि इनमें कई ऐसे नाम शामिल हैं जो न तो जनसमर्थन रखते हैं, न ही उनकी कोई राजनीतिक हैसियत है। मसलन, हरियाणा के नूंह के निवासी उमर इलियास, जिनका ज़िक्र भागवत संवाद में हुआ—जिनके अपने गृहनगर में चार समर्थक भी न मिलें, उन्हें आखिर आरएसएस के संवाद में केंद्र में क्यों रखा गया?
क्या यह ‘मुस्लिम समाज’ के नाम पर एक चयनित वर्ग को आगे रखकर वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश नहीं है?
चुनावी संकेत और मुस्लिम समाज की अगली दिशा
बिहार चुनाव से ठीक पहले ऐसी बैठकों और बयानों की बाढ़ कोई संयोग नहीं हो सकती। यह ज़ाहिर करता है कि मुस्लिम समाज के नाम पर फिर से एक नया ‘राजनीतिक प्रोजेक्ट’ आकार ले रहा है। यह भी मुमकिन है कि इन घटनाओं के बहाने एआईएमआईएम जैसी पार्टियों को सेक्युलर गठबंधन से अलग रखा जाए, ताकि मुस्लिम वोटों का नियंत्रण एक ‘मान्यताप्राप्त धारा’ के पास बना रहे।
लेकिन सवाल यह है कि क्या मुस्लिम समाज अब इन प्रतीकों, बैठकों और संवादों से संतुष्ट होगा? या फिर वह ज़मीनी आंदोलनों, पारदर्शिता और असली प्रतिनिधित्व की मांग करेगा?
निष्कर्ष:
मौलाना मदनी की पांच सितारा बैठक हो, ओवैसी की चुप्पी हो, या आरएसएस प्रमुख का संवाद—ये घटनाएं संकेत हैं कि मुस्लिम समाज को लेकर नए समीकरण गढ़े जा रहे हैं। लेकिन ये समीकरण कब तक टिकेंगे, इसका निर्धारण वही समाज करेगा, जो अब जाग चुका है और जिसने बार-बार यह दिखाया है कि वह न तो किसी की ठेकेदारी स्वीकार करता है, न ही भावनात्मक जुमलों से बहकता है।

