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ईरान-अमेरिका युद्ध: ट्रंप की दो टूक, ‘धमकियों के साये में बात नहीं’ बोला तेहरान

वाशिंगटन/तेहरान।

मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ एक नए परमाणु समझौते की उम्मीद जताई है। ट्रंप का दावा है कि वह ईरान के साथ जिस नई डील पर बातचीत कर रहे हैं, वह 2015 के ऐतिहासिक समझौते से कहीं ज्यादा बेहतर और प्रभावी होगी। हालांकि दूसरी तरफ ईरान ने साफ कर दिया है कि वह धमकियों के दबाव में आकर कोई बातचीत नहीं करेगा।

घेराबंदी हटाने को तैयार नहीं ट्रंप राष्ट्रपति ट्रंप ने सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर अपनी बात रखी। उन्होंने लिखा कि नई डील ‘जेसीपीओए’ यानी पुराने ईरान न्यूक्लियर डील से काफी बेहतर होगी। 2018 में ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान इस पुराने समझौते को ‘इतिहास का सबसे खराब सौदा’ बताते हुए अमेरिका को इससे बाहर कर लिया था। अब युद्ध और तनाव के बीच ट्रंप का कहना है कि ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी तब तक जारी रहेगी, जब तक तेहरान उनकी शर्तों पर समझौता नहीं कर लेता।

सात हफ्तों से जारी है संघर्ष अमेरिका और इजरायल ने करीब सात हफ्ते पहले ईरान पर हमले शुरू किए थे। ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि इस सैन्य कार्रवाई का मकसद ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना है। वर्तमान में दो हफ्ते का युद्धविराम खत्म होने वाला है। इसके बाद पाकिस्तान में होने वाली दूसरे दौर की बातचीत पर भी अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। ट्रंप ने साफ कहा कि वह किसी दबाव में नहीं हैं, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि सब कुछ बहुत जल्द ठीक हो जाएगा।

इजरायल ने तोड़ा युद्धविराम एक तरफ वाशिंगटन में बातचीत की मेज सजाने की तैयारी है, तो दूसरी तरफ सीमा पर बारूद बरस रहा है। इजरायल ने दक्षिणी लेबनान पर बमबारी जारी रखी है। ताजा हमलों में काकायत अल-जिस्र और खियाम जैसे कस्बों को निशाना बनाया गया है। खियाम में कई रिहायशी मकानों को जमींदोज कर दिया गया। इन हमलों में छह लोग घायल हुए हैं। इसे 10 दिनों के संघर्षविराम का खुला उल्लंघन माना जा रहा है।

तेहरान का कड़ा रुख ईरान के राजनयिकों का कहना है कि अमेरिकी प्रतिबंधों और सैन्य घेराबंदी के बीच शांति की बात बेमानी है। तेहरान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि जब तक अमेरिका अपनी आक्रामक नीति नहीं बदलता, तब तक सार्थक संवाद संभव नहीं है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि 2015 जैसा जटिल समझौता, जिसे तैयार करने में दो साल और सैकड़ों विशेषज्ञों की मदद लगी थी, उसे इतने कम समय में फिर से बनाना बेहद मुश्किल है।

फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें गुरुवार को वाशिंगटन में होने वाली अगली बैठक पर टिकी हैं। क्या ट्रंप अपनी शर्तों पर ईरान को झुका पाएंगे या मध्य पूर्व एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध की आग में झुलस जाएगा, यह आने वाले कुछ दिन तय करेंगे।

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