ईरान का नया ‘रहबर’: अली खामेनेई का साया बने मोजतबा, क्या पिता से भी ज्यादा खतरनाक साबित होंगे नए सुप्रीम लीडर?
रहस्यमयी मौलवी से सुप्रीम लीडर बनने तक की कहानी
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, तेहरान
ईरान की सत्ता के गलियारों में अब सन्नाटा नहीं बल्कि एक खौफनाक हलचल है। अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत ने तेहरान की नींव हिला दी है। अमेरिका और इजरायल के संयुक्त ऑपरेशन ने न केवल एक सर्वोच्च नेता को खत्म किया, बल्कि उस ढांचे को भी चुनौती दी है जिसे खामेनेई ने दशकों तक सींचा था। लेकिन इस भारी संकट के बीच ईरान ने अपना नया उत्तराधिकारी चुन लिया है। यह नाम पूरी दुनिया की चिंताएं बढ़ाने वाला है। यह नाम मोजतबा खामेनेई है।
तमाम अटकलों को विराम देते हुए ईरान की एक्सपर्ट्स असेंबली ने पूर्व नेता के दूसरे सबसे बड़े बेटे मोजतबा खामेनेई को ईरान का नया सुप्रीम लीडर घोषित कर दिया है। यह चयन केवल एक प्रक्रिया नहीं थी। यह एक कड़ा संदेश है। तेहरान की सड़कों पर जो धुआं उठ रहा है, उसके बीच यह नियुक्ति बताती है कि ईरान अब झुकने के मूड में नहीं है। बल्कि वह और भी अधिक आक्रामक रुख अपनाने की तैयारी कर रहा है।
साया जो अब सूरज बन गया है
मोजतबा खामेनेई का नाम अचानक सामने नहीं आया है। वे बरसों से परदे के पीछे से ईरान की असली ताकत को नियंत्रित कर रहे थे। एक वरिष्ठ पत्रकार के नजरिए से देखें तो मोजतबा वह व्यक्ति हैं जिन्होंने खामेनेई के दफ्तर को एक खुफिया मुख्यालय में बदल दिया था। उनके पिता अयातुल्ला अली खामेनेई एक वैचारिक नेता थे। वे भाषण देते थे। वे शरिया के सिद्धांतों की बात करते थे। लेकिन मोजतबा का व्यक्तित्व पूरी तरह अलग है। वे एक ‘पावर ब्रोकर’ हैं। वे जानते हैं कि सत्ता को कैसे हथियाना है और उसे कैसे बनाए रखना है।
अली खामेनेई के दौर में भी मोजतबा ही थे जो रिवोल्यूशनरी गार्ड्स यानी आईआरजीसी के साथ समन्वय बिठाते थे। वे परदे के पीछे से सरकारी नीतियां तय करते रहे हैं। अब वे परदे के सामने हैं। उनके पास अपने पिता का वह धार्मिक प्रभाव तो नहीं है जिसकी वे अपेक्षा करते थे, लेकिन उनके पास आईआरजीसी की वह क्रूर ताकत है जो बंदूक की नोक पर शासन करती है।
क्या मोजतबा अपने पिता से ज्यादा खतरनाक हैं?
यह सवाल वॉशिंगटन और तेल अवीव के नीति निर्माताओं की रातों की नींद उड़ा रहा है। जानकारों का मानना है कि मोजतबा अपने पिता से कहीं ज्यादा खतरनाक साबित हो सकते हैं। इसकी ठोस वजहें हैं। अली खामेनेई का एक ‘पिता तुल्य’ चेहरा था। वे बुजुर्ग थे और उनके फैसलों में एक प्रकार का ठहराव था। मोजतबा के साथ ऐसा नहीं है। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा आईआरजीसी के सैन्य और खुफिया तंत्र के बीच बिताया है।
वे युद्ध के मैदान को समझते हैं। उन्होंने 2005 और 2009 के चुनावों में जिस तरह से हस्तक्षेप किया, उससे यह साफ हो गया था कि वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बजाय ‘परिणामों के प्रबंधन’ में विश्वास रखते हैं। जब 2009 में जनता सड़कों पर उतरी, तो मोजतबा ही थे जिन्होंने प्रदर्शनकारियों को कुचलने के लिए सुरक्षा बलों को खुली छूट दी थी। उनका इतिहास बताता है कि वे असहमति को बातचीत से हल नहीं करते। वे उसे जड़ से उखाड़ फेंकने में विश्वास रखते हैं।
एक ऐसे दौर में जब ईरान अमेरिका और इजरायल के साथ सीधा युद्ध लड़ रहा है, मोजतबा का नेतृत्व इस संघर्ष को और भी अधिक हिंसक बना सकता है। उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है। वे उन कट्टरपंथियों के उत्पाद हैं जो मानते हैं कि रियायतें देना कमजोरी की निशानी है।
सत्ता का हस्तांतरण: एक रिपब्लिक या राजशाही?
ईरान के इस्लामिक रिपब्लिक का दावा हमेशा से यह रहा है कि वह वंशवाद के खिलाफ है। वे राजशाही की आलोचना करते हैं। लेकिन पिता से बेटे तक सत्ता का यह हस्तांतरण उस पूरे दावे की पोल खोल देता है। यह चुनाव विशेषज्ञों की सहमति से नहीं, बल्कि आईआरजीसी के भारी दबाव में हुआ है।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि एक्सपर्ट्स असेंबली के मौलवियों को आईआरजीसी की ओर से स्पष्ट निर्देश थे। मोजतबा का चयन यह दर्शाता है कि अब ईरान में धार्मिक नेतृत्व और सैन्य नेतृत्व का अंतर पूरी तरह मिट चुका है। जो ईरान कभी एक थियोक्रेसी हुआ करता था, वह अब एक सैन्य तानाशाही में तब्दील हो चुका है। मोजतबा खामेनेई केवल एक धार्मिक नेता नहीं हैं। वे उस सैन्य तंत्र के चेहरा हैं जिसने ईरान की अर्थव्यवस्था, उसकी राजनीति और उसकी पूरी विदेश नीति पर कब्जा कर लिया है।
चुनावी दखल से लेकर सत्ता के गलियारों तक
मोजतबा का व्यक्तित्व रहस्यमयी रहा है। उन्होंने अपनी शिक्षा कोम के मदरसों में ली। लेकिन उनके गुरु किताबें नहीं, बल्कि सत्ता की चालें थीं। 2005 के राष्ट्रपति चुनाव में महमूद अहमदीनेजाद का अचानक उदय और जीत, मोजतबा की राजनीतिक चतुराई का ही परिणाम माना जाता है। उन्होंने उस वक्त साबित कर दिया था कि वे ईरान के भीतर किसी भी राजनीतिक समीकरण को बदल सकते हैं।
उनका व्यक्तित्व उन लोगों से बना है जो बंद कमरों में देश का भविष्य तय करते हैं। उन्हें आम जनता से संवाद करने की जरूरत महसूस नहीं होती। वे जानते हैं कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। इसी सोच के कारण वे ईरान के भीतर के उदारवादी गुटों के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं।
एक अनिश्चित भविष्य की ओर
मोजतबा खामेनेई का नेतृत्व ईरान को किस दिशा में ले जाएगा, यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न है। अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर जो हमले किए हैं, मोजतबा उन्हें एक व्यक्तिगत चुनौती के रूप में लेंगे। वे अपने पिता की हत्या का बदला लेने की सनक में भी हो सकते हैं। उनके पास अली खामेनेई जैसी धैर्यवान राजनीति का अनुभव नहीं है। वे भावनाओं में बहकर ऐसे कदम उठा सकते हैं जो पूरे मध्य पूर्व को राख में तब्दील कर दें।
ईरान में अब एक ऐसा नेतृत्व है जिसे न तो जनता के गुस्से की परवाह है और न ही अंतरराष्ट्रीय दबाव की। वे जानते हैं कि उन्हें आईआरजीसी का समर्थन हासिल है। यही समर्थन उन्हें बेलगाम बनाता है।
निष्कर्ष
मोजतबा खामेनेई का उदय ईरान के उस अध्याय की शुरुआत है जहां तर्क और कूटनीति के लिए बहुत कम जगह बची है। वे एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने सत्ता के गलियारों में ही जन्म लिया और वहीं पले बढ़े। उनके लिए राजनीति कोई सेवा नहीं बल्कि एक रणनीतिक खेल है।
दुनिया को इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि ईरान का नया चेहरा कहीं अधिक आक्रामक, कहीं अधिक जिद्दी और कहीं अधिक अप्रत्याशित होगा। वे अपने पिता का उत्तराधिकारी नहीं हैं। वे उस सैन्य क्रांति के नए कमांडर हैं जिसने ईरान को एक ऐसे रास्ते पर डाल दिया है जहां से वापसी की गुंजाइश लगभग खत्म हो चुकी है। आने वाले दिन न केवल ईरान के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए बहुत कठिन होने वाले हैं। मोजतबा का खामोश व्यक्तित्व एक बड़े तूफ़ान का संकेत है। अब देखना यह है कि यह तूफ़ान तेहरान के बाहर कितनी दूर तक तबाही मचाता है।

