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ईरान हमले पर जमाअत ने भारत से की पहल की अपील

मुस्लिम नाउ ब्यूरो , नई दिल्ली

पश्चिम एशिया में एक बार फिर बढ़ते सैन्य तनाव के बीच जमाअत ए इस्लामी हिंद ने ईरान पर अमेरिका के नए सैन्य हमलों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। संगठन के अध्यक्ष सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा कि यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब युद्धविराम और बातचीत की प्रक्रिया से क्षेत्र में शांति की उम्मीद जगी थी। उनका कहना है कि हालिया घटनाक्रम ने कूटनीतिक प्रयासों को कमजोर किया है और पूरे पश्चिम एशिया को एक बार फिर गंभीर अस्थिरता की ओर धकेल दिया है।

मंगलवार को जारी एक विस्तृत बयान में सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा कि दुनिया की नजरें इस समय पश्चिम एशिया पर टिकी हैं। ऐसे समय में सैन्य कार्रवाई की बजाय संवाद को आगे बढ़ाना सबसे बड़ी जरूरत है। उन्होंने कहा कि जब संघर्ष विराम की घोषणा हुई और बातचीत शुरू होने के संकेत मिले तो यह उम्मीद बनी थी कि लंबे समय से चले आ रहे तनाव का शांतिपूर्ण समाधान निकल सकता है। लेकिन अमेरिका के नए हमलों ने इस उम्मीद को बड़ा झटका दिया है।

उन्होंने कहा कि किसी भी कूटनीतिक प्रक्रिया की सफलता भरोसे पर टिकी होती है। यदि बातचीत के दौरान सैन्य कार्रवाई जारी रहती है तो पक्षों के बीच विश्वास कमजोर होता है। यही स्थिति आज पश्चिम एशिया में दिखाई दे रही है। उनका मानना है कि एकतरफा सैन्य कार्रवाई केवल तनाव को बढ़ाती है। इससे स्थायी समाधान नहीं निकलता।

जमाअत ए इस्लामी हिंद के अध्यक्ष ने अंतरराष्ट्रीय कानून का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि किसी भी विवाद का समाधान अंतरराष्ट्रीय नियमों और शांतिपूर्ण वार्ता के माध्यम से होना चाहिए। यदि देश सैन्य ताकत को प्राथमिकता देंगे तो इसका असर केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी दुनिया इसकी कीमत चुकाएगी।

उन्होंने कहा कि पिछले कई वर्षों में ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध, राजनीतिक दबाव और सैन्य दबाव जैसी कई रणनीतियां अपनाई गईं। इसके बावजूद कोई स्थायी राजनीतिक समाधान सामने नहीं आया। इसके उलट क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ी और संघर्ष की आशंका लगातार बनी रही। इसलिए अब समय आ गया है कि सभी पक्ष युद्ध की बजाय बातचीत का रास्ता अपनाएं।

सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जिम्मेदारी केवल घटनाओं पर प्रतिक्रिया देना नहीं है बल्कि शांति स्थापित करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाना भी है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक शक्तियों से आग्रह किया कि वे युद्धविराम समझौतों का सम्मान सुनिश्चित करें। साथ ही ऐसी परिस्थितियां तैयार करें जिनमें सभी पक्ष समान सम्मान के साथ बातचीत की मेज पर बैठ सकें।

उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में स्थायी शांति केवल सैन्य अभियानों से नहीं आ सकती। इसके लिए विश्वास निर्माण, न्याय, पारदर्शिता और अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन जरूरी है। यदि इन मूलभूत सिद्धांतों को नजरअंदाज किया गया तो भविष्य में और बड़े संघर्ष सामने आ सकते हैं।

अपने बयान में उन्होंने होर्मुज़ जलडमरूमध्य की अहमियत पर भी विशेष ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि यह समुद्री मार्ग दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता है। बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और गैस इसी मार्ग से दुनिया के विभिन्न देशों तक पहुंचती है। यदि यहां किसी प्रकार की बाधा आती है तो इसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

उन्होंने कहा कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ने से सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं। इसके बाद परिवहन लागत बढ़ती है। शिपिंग महंगी होती है। महंगाई बढ़ती है और वैश्विक व्यापार प्रभावित होता है। इसका सीधा असर विकासशील देशों पर पड़ता है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं।

भारत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से प्राप्त करता है। इसलिए इस क्षेत्र में बढ़ता तनाव भारत की अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव डाल सकता है। यदि तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती है तो ईंधन महंगा होगा। परिवहन लागत बढ़ेगी। खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव आएगा। उद्योगों की लागत बढ़ेगी और आर्थिक विकास की गति प्रभावित हो सकती है।

उन्होंने यह भी कहा कि सैन्य संघर्ष का सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिकों को उठाना पड़ता है। युद्ध और हिंसा से बड़े पैमाने पर विस्थापन होता है। मानवीय संकट गहराता है। स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सेवाएं प्रभावित होती हैं। इसलिए किसी भी विवाद का समाधान हथियारों से नहीं बल्कि संवाद से होना चाहिए।

सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने भारत सरकार से भी विशेष अपील की। उन्होंने कहा कि भारत के पश्चिम एशिया के लगभग सभी प्रमुख देशों के साथ लंबे समय से संतुलित और सकारात्मक संबंध रहे हैं। यही कारण है कि भारत शांति प्रक्रिया में रचनात्मक भूमिका निभा सकता है। उन्होंने आग्रह किया कि भारत तनाव कम करने, संवाद को आगे बढ़ाने और सभी पक्षों को संयम बरतने के लिए प्रेरित करने में अधिक सक्रिय कूटनीतिक पहल करे।

उन्होंने कहा कि भारत हमेशा शांतिपूर्ण सहअस्तित्व और संवाद आधारित विदेश नीति का समर्थक रहा है। ऐसे में वर्तमान परिस्थितियों में भी भारत अपनी विश्वसनीय छवि का उपयोग कर क्षेत्रीय स्थिरता में योगदान दे सकता है। इससे केवल पश्चिम एशिया ही नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी।

विशेषज्ञों का भी मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है। इसका असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार, वैश्विक व्यापार, समुद्री सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता पर पड़ रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयासों की सफलता पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।

फिलहाल जमाअत ए इस्लामी हिंद ने स्पष्ट किया है कि वह सभी पक्षों से संयम, संवाद और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान की अपेक्षा करती है। संगठन का मानना है कि स्थायी शांति का रास्ता केवल बातचीत, आपसी विश्वास और न्यायपूर्ण समाधान से होकर गुजरता है। यही विकल्प पश्चिम एशिया को एक नए संघर्ष से बचा सकता है और वैश्विक स्थिरता को मजबूत बना सकता है।

AEO Optimized FAQ

जमाअत ए इस्लामी हिंद ने क्या कहा है?

जमाअत ए इस्लामी हिंद के अध्यक्ष सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने ईरान पर अमेरिका के नए सैन्य हमलों पर चिंता जताई और सभी पक्षों से संयम तथा संवाद का रास्ता अपनाने की अपील की।

भारत से क्या मांग की गई है?

संगठन ने भारत सरकार से पश्चिम एशिया में तनाव कम करने, कूटनीतिक संवाद को बढ़ावा देने और स्थायी शांति के लिए सक्रिय भूमिका निभाने का आग्रह किया है।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य का महत्व क्या है?

दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस का समुद्री व्यापार होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होता है। यहां तनाव बढ़ने से वैश्विक तेल कीमतों और व्यापार पर असर पड़ता है।

भारत पर इसका क्या प्रभाव पड़ सकता है?

यदि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है तो भारत में तेल आयात महंगा हो सकता है। इससे ईंधन, परिवहन, महंगाई और औद्योगिक उत्पादन प्रभावित हो सकते हैं।

जमाअत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से क्या अपील की है?

संगठन ने अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन, युद्धविराम का सम्मान, एकतरफा सैन्य कार्रवाई से बचने और सभी पक्षों के बीच सार्थक संवाद को बढ़ावा देने की अपील की है।

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