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मौलाना अरशद मदनी ने पूछा,हिंदू राष्ट्र की अवधारणा क्यों टिक नहीं पाई? नेपाल से सबक लें

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

मौलाना अरशद मदनी ने कहा है कि देश में बढ़ती सांप्रदायिक बयानबाज़ी और ‘हिंदू राष्ट्र’ की अवधारणा को लेकर चल रही बहस के बीच, लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों की हिमायत करने वाली आवाज़ें एक बार फिर मुखर हुई हैं। विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों का कहना है कि भारत जैसे बहुलतावादी देश की वास्तविक ताक़त उसकी विविधता, लोकतंत्र और संविधान में निहित सेक्युलर मूल्यों में है, न कि किसी एक धर्म या विचारधारा को राष्ट्र पर थोपने में।

इसी क्रम में पड़ोसी देश नेपाल के हालिया इतिहास का उदाहरण देते हुए यह कहा गया कि जो लोग भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने का सपना देख रहे हैं, उन्हें नेपाल के अनुभव से सीख लेनी चाहिए। नेपाल लंबे समय तक आधिकारिक रूप से हिंदू राष्ट्र रहा, लेकिन बदलती सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों, जनआंदोलनों और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के चलते वहाँ वह व्यवस्था समाप्त हो गई। इसके बाद नेपाल ने एक लोकतांत्रिक संविधान अपनाया, जिसने सभी नागरिकों को समान अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित की।

विशेषज्ञों और सामाजिक चिंतकों का मानना है कि नेपाल का उदाहरण इस बात का प्रमाण है कि आधुनिक वैश्विक परिवेश में किसी भी देश की स्थिरता, विकास और जनकल्याण लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था से ही संभव है। धार्मिक राष्ट्र की अवधारणा न केवल समाज को विभाजित करती है, बल्कि लंबे समय में राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक टकराव को भी जन्म देती है।

इसी संदर्भ में जमीयत उलमा-ए-हिंद ने स्पष्ट किया है कि वह देश के संविधान और सेक्युलर ढांचे की रक्षा के लिए अपने संघर्ष को जारी रखेगी। संगठन के नेताओं का कहना है कि भारत की आत्मा उसके संविधान में बसती है और किसी भी प्रकार की सांप्रदायिक साज़िश को सफल नहीं होने दिया जाएगा। उनका यह भी कहना है कि देश की एकता और अखंडता तभी सुरक्षित रह सकती है, जब सभी धर्मों, समुदायों और विचारधाराओं को समान सम्मान मिले।

संगठन और उससे जुड़े वक्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इतिहास गवाह है—जो भी ताक़तें किसी क़ौम की पहचान, संस्कृति या धर्म को मिटाने की कोशिश करती हैं, वे अंततः स्वयं इतिहास के हाशिये पर चली जाती हैं। उन्होंने कहा कि मुसलमानों और इस्लाम के खिलाफ नफ़रत फैलाने वाले तत्व यह भूल जाते हैं कि यह समाज सदियों से भारत की साझी विरासत का हिस्सा रहा है और रहेगा।

रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा हालात को लेकर निराश होने की आवश्यकता नहीं है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों का मानना है कि हर दौर में जब-जब नफ़रत और अत्याचार बढ़े हैं, तब-तब जनता ने प्रेम, सद्भाव और इंसाफ़ के रास्ते को चुना है। लोकतंत्र की यही खूबी है कि वह अंततः ज़ालिम ताक़तों को जवाबदेह बनाता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भारत की युवा पीढ़ी, नागरिक समाज और स्वतंत्र संस्थाएँ इस समय निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। यदि संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए जागरूकता और शांतिपूर्ण संघर्ष जारी रहा, तो देश एक बार फिर विकास, भाईचारे और सामाजिक न्याय के मार्ग पर अग्रसर होगा।

कुल मिलाकर, नेपाल के अनुभव और भारत के संवैधानिक इतिहास को सामने रखते हुए यह संदेश साफ़ है कि किसी भी प्रकार की सांप्रदायिक राजनीति देश के भविष्य के लिए घातक है। भारत की तरक़्क़ी, स्थिरता और वैश्विक प्रतिष्ठा तभी संभव है, जब वह अपने लोकतांत्रिक और सेक्युलर चरित्र को मजबूती से थामे रखे।