यादें : लक्ष्मण से एक थाई रेस्टोरेंट में मिली वह नसीहत, जिसने इरफान पठान की जिंदगी बदल दी
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नौशाद अख्तर
किसी खिलाड़ी की कामयाबी के पीछे सिर्फ घंटों की मेहनत, पसीना और मैदान पर किया गया अभ्यास नहीं होता। कई बार जिंदगी में किसी बड़े खिलाड़ी की कही हुई एक छोटी-सी बात भी करियर की दिशा बदल देती है। ऐसी ही एक बात ने कभी युवा इरफान पठान को भीतर से बदल दिया था।
आज इरफान पठान भारतीय क्रिकेट के उन खिलाड़ियों में गिने जाते हैं, जिन्होंने अपनी स्विंग, गति और हरफनमौला खेल से लंबे समय तक क्रिकेट प्रेमियों को रोमांचित किया। उन्होंने 29 टेस्ट, 120 वनडे और 24 टी-20 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले। मैदान पर उनकी उपलब्धियां किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक दौर में विदेश दौरे पर खाने की आदत को लेकर उन्हें एक ऐसी परेशानी हुई थी, जिसका असर उनके खेल पर भी पड़ सकता था?
और क्या आपको मालूम है कि एक वरिष्ठ खिलाड़ी ने उन्हें इस समस्या से निकालने के लिए ऐसा सबक दिया, जिसे इरफान ने जिंदगी भर के लिए अपनी आदत बना लिया?
इस दिलचस्प किस्से का जिक्र खुद इरफान पठान ने हाल ही में ‘सोनी स्पोर्ट्स नेटवर्क’ से बातचीत में किया। बातचीत में पूर्व भारतीय क्रिकेटर अजय जडेजा भी मौजूद थे। इरफान ने बताया कि उनके करियर के शुरुआती दिनों में वीवीएस लक्ष्मण की एक सलाह ने उनके क्रिकेट ही नहीं, बल्कि जिंदगी को देखने का नजरिया बदल दिया था।
इस कहानी को समझने के लिए करीब 23 साल पीछे लौटना होगा।
जब पहली बार विदेश की जमीन पर उतरे इरफान
यह वह दौर था जब इरफान पठान भारतीय क्रिकेट में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे थे। पहली बार उन्हें ऑस्ट्रेलिया दौरे पर जाने का मौका मिला। उनके लिए यह केवल एक क्रिकेट दौरा नहीं था, बल्कि एक बिल्कुल नई दुनिया से परिचय भी था।
ऑस्ट्रेलिया के एडिलेड में उन्होंने प्रैक्टिस मैच खेला। युवा इरफान ने वहां एक विकेट भी हासिल किया। उनके प्रदर्शन से प्रभावित तत्कालीन कप्तान सौरव गांगुली खुद उनके पास पहुंचे और पीठ थपथपाते हुए कहा, “वाह यार, तेजी गेंद तो अंदर घूमती है।”
एक युवा खिलाड़ी के लिए इससे बड़ी खुशी और क्या हो सकती थी! देश के कप्तान से मिली तारीफ आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए काफी थी।
लेकिन मैदान के बाहर इरफान के सामने एक दूसरी चुनौती खड़ी थी—खाना।
यह उनका पहला विदेशी दौरा था। घर से हजारों किलोमीटर दूर। भाषा अलग, माहौल अलग और खाने की आदतें भी बिल्कुल अलग।
भारतीय टीम के ड्रेसिंग रूम में जो खाना परोसा जा रहा था, वह इरफान की पसंद के बिल्कुल विपरीत था। उन्हें ‘लजान्या’ दिया जाता था। पास्ता, चीज और दूसरी चीजों से तैयार यह इटैलियन व्यंजन उनके लिए बिल्कुल नया था और उन्हें पसंद नहीं आया।
इरफान का मन तो चावल और चटनी में ही लगता था।
लेकिन विदेश में हर चीज अपनी पसंद की कहां मिलती है!
टीम में सभी खिलाड़ियों के लिए वही खाना था। लिहाजा इरफान ने अपना रास्ता निकाल लिया। उन्होंने दूध के साथ चावल खाना शुरू कर दिया।
क्रिकेट के लिए शरीर को जिस ऊर्जा और संतुलित पोषण की जरूरत होती है, उसके लिहाज से यह कोई आदर्श व्यवस्था नहीं थी। मगर उस वक्त इरफान को यही सबसे आसान रास्ता लगा।
एक सीनियर खिलाड़ी चुपचाप सब देख रहा था
इरफान को तब मालूम नहीं था कि ड्रेसिंग रूम में बैठा एक वरिष्ठ खिलाड़ी कई दिनों से उनकी इस आदत पर नजर रख रहा है।
इरफान के लिए परेशानी सिर्फ टीम के खाने तक सीमित नहीं थी। होटल के बाहर भी भारतीय अंदाज का भोजन आसानी से नहीं मिलता था। मटन और चिकन भी उस स्वाद और तरीके से तैयार नहीं होते थे, जिनका वह भारत में आदी थे।
ऐसे में दूध और चावल ही उनका सहारा बन गए थे।
वह युवा थे। पहली बार विदेश आए थे। नई जगह और नए माहौल में शायद उन्हें यह भी समझ नहीं आ रहा था कि इस परिस्थिति से कैसे निपटा जाए।
फिर एक दिन मैच खत्म होने के बाद इरफान अपने होटल के कमरे में आराम कर रहे थे। अचानक फोन की घंटी बजी।

उन्होंने फोन उठाया।
दूसरी तरफ आवाज थी—वीवीएस लक्ष्मण की।
“मैं लक्ष्मण बोल रहा हूं। पंद्रह मिनट में फटाफट नीचे आ जाओ। खाने चलना है।”
इरफान के लिए यह किसी दावत से कम नहीं था। एक वरिष्ठ खिलाड़ी खुद बुला रहा था। वह तुरंत तैयार हुए और नीचे पहुंच गए।
लक्ष्मण उन्हें लेकर एडिलेड में होटल हयात के सामने स्थित एक थाई रेस्टोरेंट में पहुंच गए।
लेकिन रेस्टोरेंट देखकर इरफान का उत्साह थोड़ा ठंडा पड़ गया।
उन्हें लगा था कि शायद लक्ष्मण उन्हें किसी भारतीय रेस्टोरेंट में ले जाएंगे, जहां उन्हें अपने घर जैसा खाना मिल जाएगा। लेकिन यहां तो थाई खाना सामने था—एक और बिल्कुल नया स्वाद!
लक्ष्मण ने शाकाहारी खाना ऑर्डर किया। इरफान ने भी वही मंगाया।
यह इरफान का थाई भोजन से पहला परिचय था। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें उसका स्वाद पसंद आने लगा।
उन्हें क्या पता था कि उस रात वह सिर्फ खाना नहीं खा रहे थे, बल्कि अपनी जिंदगी का एक बड़ा सबक भी सीखने वाले थे।
लक्ष्मण ने जो कहा, वह इरफान की जिंदगी का मंत्र बन गया
खाने के दौरान लक्ष्मण ने इरफान के कंधे पर हाथ रखा और कहा कि वह कई दिनों से उन्हें देख रहे हैं।
इरफान दूध और चावल खा रहे थे।
लक्ष्मण ने समझाया कि अगर उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लंबा और सफल करियर बनाना है तो सिर्फ गेंद और बल्ले पर मेहनत करना काफी नहीं होगा। उन्हें विदेशों के माहौल के साथ खुद को ढालना भी सीखना होगा।
विदेशी दौरे क्रिकेट का अभिन्न हिस्सा हैं। वहां अलग-अलग परिस्थितियां मिलेंगी। मौसम बदलेगा। पिच बदलेगी। यात्रा का तरीका बदलेगा। सबसे महत्वपूर्ण—खाने की आदतें भी बदलेंगी।
लक्ष्मण की सलाह का सार यही था कि एक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी को अपने शरीर और दिमाग को नई परिस्थितियों के लिए तैयार रखना चाहिए।
हर जगह अपने पसंद का खाना मिलने का इंतजार किया जाएगा तो मुश्किल होगी। तरह-तरह के भोजन को स्वीकार करना होगा। शरीर को पर्याप्त और संतुलित पोषण देना होगा। तभी लंबे दौरे, लगातार अभ्यास और मैचों की थकान के बावजूद प्रदर्शन का स्तर बनाए रखा जा सकता है।
यह सिर्फ खाने की सलाह नहीं थी।
यह दरअसल खुद को बदलती परिस्थितियों के मुताबिक ढालने की सलाह थी।
और यही बात इरफान के दिल में उतर गई।
दूध-चावल से लेकर दुनिया के हर स्वाद तक
उस दिन के बाद इरफान ने लक्ष्मण की बात को गांठ बांध ली।
विदेशी दौरे आने लगे तो उन्होंने खाने को लेकर अपनी झिझक छोड़ दी। जो नया था, उसे आजमाया। अलग-अलग देशों के अलग-अलग व्यंजनों को चखा। उन्होंने यह मानसिकता बनाई कि अगर उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के बीच टिकना है तो दुनिया को समझना होगा और उसके साथ खुद को ढालना होगा।

धीरे-धीरे भोजन को लेकर उनका नजरिया बदल गया।
लेकिन इसके साथ उनके व्यक्तित्व का एक और हिस्सा भी विकसित हुआ—अनुकूलन की क्षमता।
यही वह गुण है जो किसी भी खिलाड़ी को सिर्फ प्रतिभाशाली नहीं, बल्कि बड़ा खिलाड़ी बनाता है।
क्रिकेट में हर दिन परिस्थितियां बदलती हैं। कभी गेंद स्विंग करती है, कभी नहीं। कभी पिच तेज गेंदबाजों के अनुकूल होती है, कभी स्पिनरों के। कभी बल्लेबाज को धूप में खेलना पड़ता है तो कभी बादलों के नीचे। कभी शरीर थका होता है, कभी मन दबाव में।
जो खिलाड़ी परिस्थितियों से लड़ता रहता है, वह जल्दी थक जाता है।
लेकिन जो परिस्थितियों को समझकर खुद को बदल लेता है, वही लंबे समय तक टिकता है।
इरफान पठान ने शायद उस रात थाई रेस्टोरेंट में यही सबसे बड़ा सबक सीखा था।
एक वरिष्ठ की नजर, एक युवा का भविष्य
किसी खिलाड़ी के करियर में कोच, कप्तान और वरिष्ठ साथी की भूमिका कितनी बड़ी होती है, यह कहानी उसका खूबसूरत उदाहरण है।
लक्ष्मण चाहते तो इरफान की खाने की आदत को नजरअंदाज कर सकते थे। वह यह भी कह सकते थे कि युवा खिलाड़ी है, धीरे-धीरे सीख जाएगा।
लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
उन्होंने पहले देखा।
समस्या को समझा।
फिर इरफान को डांटने के बजाय अपने साथ खाना खिलाने ले गए।
और सबसे महत्वपूर्ण बात—उन्होंने आदेश नहीं दिया, बल्कि समझाया।
यही किसी वरिष्ठ की असली भूमिका होती है।
किसी जूनियर को सिर्फ यह बताना कि वह गलत कर रहा है, आसान है। लेकिन उसे यह समझाना कि वह गलती क्यों कर रहा है और उससे कैसे बाहर निकला जा सकता है, बड़ी बात है।
इरफान ने भी उस सलाह को सिर्फ सुना नहीं, बल्कि जीवन में उतारा।
असली कामयाबी का राज शायद यही है
आज जब इरफान पठान के क्रिकेट करियर की बात होती है तो उनकी तेज गेंदबाजी, स्विंग, बल्लेबाजी और ऑलराउंड प्रदर्शन का जिक्र होता है। उनके आंकड़े गिनाए जाते हैं। उनके शानदार स्पेल याद किए जाते हैं।
लेकिन किसी भी कामयाब इंसान की कहानी में कुछ ऐसे छोटे मोड़ होते हैं, जो आंकड़ों में दिखाई नहीं देते।
एडिलेड की वह शाम भी शायद इरफान की जिंदगी का ऐसा ही एक मोड़ थी।
एक युवा क्रिकेटर, जो विदेश में अपने मन का खाना न मिलने के कारण दूध और चावल पर निर्भर था, उसे एक वरिष्ठ खिलाड़ी ने समझाया कि दुनिया बड़ी है और उसे स्वीकार करने के लिए खुद को भी बड़ा करना होगा।
इरफान ने बात समझी।
अपनी आदत बदली।
नई चीजें अपनाईं।
और आगे बढ़ते गए।
इस कहानी का सबसे खूबसूरत पहलू यही है कि जिंदगी में बदलाव हमेशा किसी बड़े हादसे या बड़ी घटना से नहीं आता। कभी-कभी होटल के एक कमरे में बजती फोन की घंटी, किसी सीनियर का साथ और एक साधारण-सी डिनर टेबल भी इंसान की सोच बदल सकती है।
इरफान के लिए वह थाई रेस्टोरेंट सिर्फ एक जगह नहीं था।
वह उनकी जिंदगी की एक छोटी-सी क्लासरूम थी।
जहां शिक्षक थे वीवीएस लक्ष्मण और पाठ था—कामयाब होना है तो सिर्फ मेहनत मत करो, खुद को बदलना भी सीखो।
शायद यही वजह है कि इरफान पठान जब अपने क्रिकेट के दिनों को याद करते हैं तो उस एक सलाह को आज भी भूले नहीं हैं।
क्योंकि क्रिकेट में तेज गेंद फेंकना एक हुनर है, लेकिन बदलती परिस्थितियों के साथ खुद को ढाल लेना—यह जिंदगी का हुनर है।
और यही हुनर मैदान के बाहर भी इंसान को विजेता बनाता है।

