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Mossad: 7 अक्टूबर हमले और वॉशिंगटन गोलीकांड ने खोल दी ‘दुनिया की सबसे खतरनाक एजेंसी’ की पोल।

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मुस्लिम नाउ विशेष

मोसाद की नाकामी: दो बड़े झटके

  1. हमास का 7 अक्टूबर हमला
    यह हमला न केवल इज़रायल के सैन्य प्रतिष्ठानों के लिए बल्कि मोसाद जैसी खुफिया एजेंसी के लिए भी सबसे शर्मनाक क्षणों में से एक बन गया। इज़रायली एजेंसियों को ज़रा भी भनक नहीं लगी कि एक आतंकवादी संगठन उनकी सीमाओं को तोड़ते हुए इतना बड़ा हमला करने जा रहा है।
  2. वॉशिंगटन डीसी गोलीकांड (22 मई 2025)
    अमेरिका जैसे सहयोगी देश की राजधानी में, वह भी यहूदी संग्रहालय के पास, दो इज़रायली दूतावास कर्मचारियों की हत्या यह साबित करने के लिए काफी है कि मोसाद अब वैश्विक धरातल पर खतरे की पहचान करने में असमर्थ होती जा रही है। हमलावरों ने ‘फ्री फ़िलिस्तीन’ के नारे लगाए, जिससे स्पष्ट होता है कि यह हमला एक राजनीतिक संदेश भी दे रहा था – और मोसाद यह संदेश पढ़ने में विफल रही।

क्या खत्म हो गई मोसाद की धार?

मोसाद की विफलताओं की सूची केवल इन दो घटनाओं तक सीमित नहीं है। इतिहास में भी इसके कई असफल ऑपरेशन रहे हैं:

  • 1997: हमास नेता खालिद मिशाल की हत्या की विफल कोशिश – जॉर्डन में पकड़े गए एजेंट्स।
  • 1954: लावोन अफेयर – मिस्र में बम हमलों की असफल साजिश।
  • 1973: यौम किप्पुर युद्ध – मिस्र और सीरिया के संयुक्त हमले की पूर्व जानकारी देने में असफलता।

मीडिया में मिथक और मोसाद की हकीकत

मोसाद पर बनी किताबें और फिल्में उसे एक परफेक्ट एजेंसी के रूप में प्रस्तुत करती हैं। लेकिन हकीकत यह है कि दुनिया के बाकी खुफिया संगठनों की तरह मोसाद भी विफल हो सकती है, और हाल के वर्षों में उसकी विफलताओं की संख्या बढ़ी है।

तकनीक में माहिर, रणनीति में कमजोर?

मोसाद आधुनिक तकनीकों जैसे AI, रिमोट-कंट्रोल्ड मशीनगन और माइक्रो रोबोट्स का उपयोग करती है। 2020 में ईरानी परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फख्रजादा की हत्या इसका उदाहरण है। लेकिन सवाल ये है कि क्या तकनीक के भरोसे मोसाद खुफिया सूझबूझ को नज़रअंदाज़ कर रही है?

भारत की ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसी सफलताएं – एक तुलना

जब भारत का ऑपरेशन सिंदूर जैसे मिशन वैश्विक स्तर पर सराहे जा रहे हैं, वहीं इज़रायल की सबसे शक्तिशाली खुफिया एजेंसी मोसाद का बार-बार चूक जाना, उसकी प्रतिष्ठा पर सवाल खड़ा करता है। अब तुलना भी होने लगी है कि क्या भारत की RAW जैसी एजेंसियां मोसाद से अधिक प्रभावी हो गई हैं?

क्या मोसाद को पुनः आकलन की ज़रूरत है?

मोसाद के पास 2.8 बिलियन डॉलर का बजट है, 7000 से अधिक एजेंट्स हैं, लेकिन जब हमास जैसे संगठन और स्वतंत्र हमलावर उसकी आंखों के सामने से निकल जाते हैं, तब यह बजट, तकनीक और ताकत बेमानी लगती है। अब मोसाद को अपनी रणनीति, नेतृत्व और खुफिया नेटवर्क की समीक्षा करनी चाहिए।


निष्कर्ष:
मोसाद की प्रतिष्ठा अब एक संक्रमण काल से गुजर रही है। उसकी ऐतिहासिक सफलताएं अब वर्तमान की असफलताओं के आगे फीकी पड़ती जा रही हैं। यह वक्त मोसाद के लिए आत्मनिरीक्षण का है – क्या वह फिर से दुनिया की सबसे भरोसेमंद एजेंसी बन पाएगी, या इतिहास में उसकी पहचान एक चूकती हुई ताक़त के रूप में दर्ज होगी?