मुहर्रम रस्म नहीं, जिम्मेदारी है: अफ्रीका के शिया धर्मगुरु ने दिया आत्मनिरीक्षण का पैग़ाम
मुस्लिम नाउ ब्यूरो,मोंबासा
केन्या के तटीय प्रांत स्थित अफ्रीका के सबसे पुराने और सबसे बड़े मोंबासा अस्पताल के निदेशक और प्रख्यात शिया धर्मगुरु मुल्ला अब्बास नासिर ने कहा है कि माहे मुहर्रम को केवल एक रस्म के तौर पर नहीं, बल्कि खुदा की सच्ची पहचान और किरदार (चरित्र) निर्माण का ज़रिया बनाना चाहिए।
मुल्ला अब्बास नासिर ने मौलाना रजानी से एक विशेष मुलाकात में कहा, “आज के दौर में अगर हम ईश्वर की वास्तविक पहचान (मआरिफ़त) चाहते हैं, तो हमें सबसे पहले अपना किरदार बेहतर बनाना होगा। यही रास्ता है खुदा तक पहुंचने का।” उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इमाम हुसैन अ.स. की कर्बला में दी गई कुर्बानी, अत्याचार और ज़ुल्म के खिलाफ एक सीसा पिलाई हुई किरदार की अभिव्यक्ति थी जिसने झूठ और अन्याय की हर दीवार को ढहा दिया।
उन्होंने भावुक लहजे में कहा, “अगर आज हमारे सामने कर्बला जैसी मिसाल न होती, तो हम किस राह पर होते?” इस पर मौलाना रजानी ने कहा, “इमाम हुसैन अ.स. ने अपनी कुर्बानी खुदा के लिए दी थी, न कि केवल मुहर्रम मनाने के लिए। हमें उनका उद्देश्य समझना होगा।”
मुल्ला अब्बास, जो कि मोंबासा हॉस्पिटल के निदेशक हैं, ने स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में हो रही प्रगति पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “विकास जीवन की एक सतत प्रक्रिया है, लेकिन यह सिर्फ मुनाफे और मील के पत्थरों की बात नहीं है, बल्कि यह लोगों की सेवा, करुणा और समर्पण की बात है।”
उन्होंने आगे कहा कि मोंबासा अस्पताल का यह सफर, अस्पताल के प्रबंधन बोर्ड की दूरदर्शी सोच, समर्पित स्टाफ की मेहनत और दुनियाभर से आने वाले मरीजों की वफादारी का प्रमाण है। नई सुविधाओं का निर्माण, मौजूदा व्यवस्थाओं का आधुनिकीकरण, उन्नत उपकरणों की खरीदारी और एक शांत, दोस्ताना माहौल ने मोंबासा अस्पताल को स्थानीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मरीजों के लिए भी पसंदीदा केंद्र बना दिया है।
उन्होंने बताया कि अस्पताल के ज़्यादातर वार्ड और सेवा क्षेत्र हिंद महासागर के सुंदर नज़ारों के साथ आते हैं, जो रोगियों के इलाज को और अधिक सहज और सौहार्दपूर्ण बनाते हैं।
अपनी कॉर्पोरेट सामाजिक ज़िम्मेदारी के तहत मोंबासा अस्पताल ने उन ज़रूरतमंदों के लिए निःशुल्क स्वास्थ्य शिविरों और चिकित्सा अभियानों का आयोजन किया है, जो महंगे इलाज का खर्च वहन नहीं कर सकते। इनमें हृदय रोग, मधुमेह, गुर्दा डायलिसिस, दमा और अन्य बीमारियों की सेवाएं शामिल हैं।
अंत में मुल्ला नासिर ने कहा, “हमें चाहिए कि हम माहे मुहर्रम को रोने और मातम के दायरे से निकाल कर उसे एक आत्मनिरीक्षण, चरित्र निर्माण और सामाजिक सेवा का ज़रिया बनाएं — यही इमाम हुसैन की सच्ची याद और हमारी ज़िम्मेदारी है।”

