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नेतन्याहू का ‘अंधेरे का सच’ और गाज़ा नरसंहार पर मुस्लिम जगत की चुप्पी: यूएई की भूमिका पर गंभीर सवाल

मुस्लिम नाउ विशेष

हाल ही में इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक विस्फोटक बयान दिया, जिसने अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के विरोधाभासों को उजागर कर दिया। उन्होंने दावा किया कि जो देश सार्वजनिक रूप से उनकी कार्रवाइयों का विरोध करते हैं, दरअसल उनके राष्ट्राध्यक्ष रात के अंधेरे में निजी तौर पर उनकी कार्रवाई की तारीफ़ करते हैं। नेतन्याहू का यह बयान तब आया जब संयुक्त राष्ट्र में उनके संबोधन से पहले, ग़ाज़ा में हो रहे नरसंहार के विरोध में अधिकांश देशों के प्रतिनिधि सभा को छोड़कर बाहर चले गए थे।

नेतन्याहू का विरोध करने वाले वे राष्ट्र थे जो इज़रायल द्वारा ग़ाज़ा में 80 हज़ार से अधिक निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतारने का विरोध कर रहे हैं। हालाँकि, किसी भी देश की अपील या धमकी नेतन्याहू पर काम नहीं कर रही है। इज़रायली सेना न केवल ग़ाज़ा को लगातार रौंद रही है, बल्कि उस पर क़ब्ज़ा कर इज़रायल का झंडा गाड़ने की फिराक में है। इस ख़ूँख़ार कार्रवाई का पूरी दुनिया में विरोध हो रहा है, यहाँ तक कि इंटरनेशनल कोर्ट ने उनके ख़िलाफ़ गिरफ्तारी वारंट तक जारी कर रखा है।


मुस्लिम देशों की निष्क्रियता और नेतन्याहू का दावा

नेतन्याहू का यह दावा, कि मुस्लिम देशों के राष्ट्राध्यक्ष अंदरखाने उनसे मिल रहे हैं, सच होता प्रतीत होता है। यदि ऐसा नहीं होता तो मुस्लिम और अरब देश अब तक अपने संयुक्त और शक्तिशाली प्रयासों से इज़रायल पर दबाव बनाकर उसकी “नट-बोल्ट टाइट” कर चुके होते। इस्लामिक देशों का संगठन (OIC) इस मामले में मानो बिना दाँत के शेर की तरह निष्क्रिय नज़र आ रहा है। यूएई (संयुक्त अरब अमीरात) और अरब अमीरात खुद को ताकतवर देश मानते हैं, मगर उनकी ओर से इस दिशा में अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गई है, जिससे ग़ाज़ावासियों की बदहाल स्थिति में कोई सुधार आता।


यूएई और नेतन्याहू की ‘ऐतिहासिक बैठक’: कूटनीतिक ख़ामोशी पर सवाल

इस बीच, खुद को रणनीतिक और राजनीतिक मामलों के अमीराती विशेषज्ञ, विश्लेषक और शोधकर्ता बताने वाले अमजद ताहा के एक एक्स पोस्ट ने यूएई की कथित ख़ामोशी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ताहा ने एक्स पर एक वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा:

“संयुक्त राष्ट्र में सबसे प्रभावशाली क्षण: संयुक्त अरब अमीरात ने महामहिम @ABZayed और @IsraeliPM के बीच ऐतिहासिक बैठक के साथ दुनिया को आशा और शांति की ओर अग्रसर किया। केवल मेरा प्रिय देश, संयुक्त अरब अमीरात ही मध्य पूर्व में लोगों की जान बचाने के लिए साहसिक निर्णय लेता है।”

दरअसल, इस वीडियो में संयुक्त राष्ट्र के एक हिस्से में बेहद खुशनुमा माहौल में नेतन्याहू और यूएई के महामहिम (संभवतः विदेश मंत्री अब्दुल्ला बिन ज़ायेद) हाथ मिलाते और बतियाते नज़र आ रहे हैं। यह वीडियो नेतन्याहू के संयुक्त राष्ट्र को संबोधित करने से ठीक पहले या बाद का है।


यूएई की भूमिका पर उठते गंभीर प्रश्न

इस असामान्य गर्मजोशी ने ग़ाज़ा में जारी भयानक त्रासदी के बीच यूएई की भूमिका और मंशा पर कई गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं:

  1. ग़ाज़ा अत्याचार पर चुप्पी क्यों? यूएई ने अब तक ग़ाज़ा में अत्याचार बंद करवाने के लिए इतनी शक्तिशाली और तत्काल प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी, जिसकी उम्मीद एक मज़बूत देश से की जाती है?
  2. क़तर की मध्यस्थता से असंतोष? क्या यूएई को क़तर द्वारा इज़रायल और हमास के बीच समझौता कराने का प्रयास पसंद नहीं था, जिसके चलते इज़रायली हमले के बाद उसकी प्रतिक्रिया कमज़ोर रही?
  3. इज़रायल और यूएई की मिलीभगत? क्या इस ‘ऐतिहासिक बैठक’ और यूएई के रणनीतिक विशेषज्ञ की नेतन्याहू की तारीफ़ करने वाली पोस्ट से यह संकेत मिलता है कि इज़रायल और यूएई के बीच कोई गुप्त मिलीभगत है, जिसके कारण ग़ाज़ा के मुद्दे पर मुस्लिम जगत एकजुट होकर इज़रायल पर दबाव नहीं बना पा रहा है?

अमजद ताहा का यह एक्स पोस्ट, जिसमें वह यूएई के इस कदम को “लोगों की जान बचाने के लिए साहसिक निर्णय” बताते हैं, उस समय आया है जब ग़ाज़ावासी इज़रायली बमबारी से जूझ रहे हैं। यह स्थिति न केवल अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के दोहरे मापदंडों को दर्शाती है, बल्कि उन अरब देशों की नैतिक ज़िम्मेदारी पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है, जो ख़ुद को मुस्लिम जगत का नेतृत्वकर्ता मानते हैं।