Education

बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी नाम बदलने पर छिड़ा नया राजनीतिक विवाद

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, भोपाल

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी का नाम बदलने के प्रस्ताव ने नया राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा कर दिया है। विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने संस्थान का नाम बदलकर “वाग्देवी भोजपाल यूनिवर्सिटी” करने का प्रस्ताव पारित किया है, जिसे अब राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजा गया है। प्रस्ताव सामने आते ही सोशल मीडिया, शिक्षाविदों, इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच बहस तेज हो गई है।

विवाद की मुख्य वजह यह है कि विश्वविद्यालय का वर्तमान नाम स्वतंत्रता सेनानी मौलाना मोहम्मद बरकतुल्लाह भोपाली के सम्मान में रखा गया था। आलोचकों का कहना है कि नाम परिवर्तन केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि यह देश के स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण अध्याय को पीछे धकेलने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने इस प्रस्ताव पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि ऐसे फैसले सच्चे राष्ट्रवादियों की स्मृति को कमजोर करते हैं और समाज को धार्मिक आधार पर बांटने का काम करते हैं। उनके बयान के बाद यह मुद्दा और अधिक चर्चा में आ गया।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भी हजारों लोगों ने अपनी राय व्यक्त की है। कुछ लोगों ने नाम परिवर्तन का समर्थन किया है और कहा है कि नया नाम भोपाल की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को अधिक बेहतर ढंग से दर्शाता है। वहीं बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं जो इसे स्वतंत्रता आंदोलन के एक महत्वपूर्ण नायक की विरासत को कमजोर करने वाला कदम मान रहे हैं।

विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद की ओर से दिए गए तर्क में कहा गया है कि “वाग्देवी” ज्ञान की देवी सरस्वती का एक नाम है जबकि “भोजपाल” भोपाल के ऐतिहासिक नाम और राजा भोज से जुड़ा हुआ है। परिषद का मानना है कि यह नाम क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को अधिक व्यापक रूप से प्रतिबिंबित करता है।

हालांकि इस तर्क को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि किसी ऐतिहासिक या सांस्कृतिक पहचान को सम्मान देने के लिए स्वतंत्रता सेनानी का नाम हटाना आवश्यक नहीं है। उनका तर्क है कि दोनों विरासतें अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं और उन्हें एक-दूसरे के विरोध में खड़ा नहीं किया जाना चाहिए।

आखिर कौन थे मौलाना बरकतुल्लाह?

मौलाना मोहम्मद बरकतुल्लाह का जन्म 7 जुलाई 1854 को भोपाल में हुआ था। उनका पूरा नाम अब्दुल हाफिज मोहम्मद बरकतुल्लाह था। वे भारत के उन शुरुआती क्रांतिकारियों में शामिल थे जिन्होंने विदेशों में रहकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाया।

उन्होंने भोपाल के सुलेमानिया स्कूल से शिक्षा प्राप्त की। बाद में उच्च अध्ययन के लिए इंग्लैंड गए, जहां उनका संपर्क कई भारतीय क्रांतिकारियों से हुआ। ब्रिटिश शासन की आलोचना करने के कारण वे लगातार अंग्रेजी सरकार की निगरानी में रहे।

बरकतुल्लाह ने जापान में टोक्यो विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। वहां रहते हुए उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ कई लेख और पुस्तिकाएं प्रकाशित कीं। उनकी लेखनी भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों में पढ़ी जाती थी।

इसके बाद वे अमेरिका पहुंचे और गदर आंदोलन से जुड़े। वर्ष 1913 में स्थापित गदर पार्टी के प्रमुख नेताओं में उनका नाम शामिल था। गदर आंदोलन ने विदेशों में रहने वाले भारतीयों को आजादी की लड़ाई के लिए संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

उनकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि वर्ष 1915 में सामने आई। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में भारत की पहली निर्वासित अस्थायी सरकार का गठन किया गया। इस सरकार में राजा महेंद्र प्रताप राष्ट्रपति बने जबकि मौलाना बरकतुल्लाह को प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई। इतिहासकारों के अनुसार वे भारत की पहली निर्वासित सरकार के पहले प्रधानमंत्री थे।

बरकतुल्लाह हिंदू मुस्लिम एकता के मजबूत समर्थक थे। उन्होंने कई लेखों और पत्रों में यह विचार रखा कि भारत की स्वतंत्रता तभी संभव है जब सभी समुदाय मिलकर संघर्ष करें। उनके विचारों में राष्ट्रवाद, स्वतंत्रता और सामाजिक एकता प्रमुख विषय रहे।

20 सितंबर 1927 को उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के कई दशक बाद 1988 में भोपाल यूनिवर्सिटी का नाम बदलकर बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी रखा गया था। इसका उद्देश्य स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को सम्मान देना था।

अब लगभग चार दशक बाद फिर से विश्वविद्यालय का नाम बदलने का प्रस्ताव सामने आया है। यही कारण है कि यह मुद्दा केवल एक संस्थान के नाम तक सीमित नहीं रह गया है। यह इतिहास, पहचान, स्मृति और राजनीति से जुड़ी व्यापक बहस का रूप ले चुका है।

फिलहाल अंतिम निर्णय राज्यपाल की मंजूरी के बाद ही होगा। लेकिन इतना तय है कि मौलाना बरकतुल्लाह का नाम एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गया है। उनके समर्थक इसे स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत से जुड़ा विषय बता रहे हैं, जबकि समर्थक पक्ष इसे सांस्कृतिक पुनर्परिभाषा का प्रयास मान रहा है।

आने वाले दिनों में यह बहस और तेज होने की संभावना है। क्योंकि सवाल केवल एक विश्वविद्यालय के नाम का नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक स्मृति का भी है जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाना है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *