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रचना ही अमर होती है, बाकी सब महज खोखलापन : साहित्यकार डॉ. सना अल-शालन

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साक्षात्कारकर्ता : इराकी पत्रकार राजी सुल्तान अल-जुहैरी

कलम उठा लेने भर से हर व्यक्ति इंसान की गहराइयों को समझ नहीं लेता। कुछ लोग केवल कहानी तक सीमित रहते हैं, जबकि कुछ ऐसे भी होते हैं जो कहानी के भीतर छिपी उन बातों को तलाशते हैं, जिन्हें जीवन ने अपने भीतर छिपा रखा है।

इसी साहित्यिक संसार से लेखिका, प्रोफेसर और डॉ. सना अल-शालन का व्यक्तित्व सामने आता है। वह अकादमिक, उपन्यासकार और आलोचक हैं, जिन्होंने शब्द को स्मृति, सवाल और विचार का रूप दिया है।

विश्वविद्यालय के कक्षों और कल्पना की दुनिया के बीच उनका अनुभव असाधारण रहा है। उन्होंने वयस्कों के साथ-साथ बच्चों के लिए भी उपन्यास, कहानी, नाटक, बाल साहित्य और आलोचना लिखी है। मानव जीवन और स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उनके लेखन के केंद्र में रहे हैं। उन्होंने इंसान की कमजोरी और ताकत तथा उन परिस्थितियों पर भी लिखा है, जिनके सामने साहित्य चुप नहीं रह सकता।

उनकी एक खास पहचान यह भी है कि उन्होंने अपने नाम के साथ अपनी मां का नाम जोड़ा और स्वयं को ‘सना अल-शालन बिंत नईमा’ कहा। यह उस स्मृति के प्रति सम्मान है, जिसे उन्होंने शब्दों में अमर करने का प्रयास किया।

लेकिन पुरस्कारों और उपाधियों के पीछे एक ऐसी महिला भी है जिसने लेखन के सवालों को जिया है और अपने विचारों की कीमत चुकाई है, ताकि वह ईमानदार बनी रह सके। इस बातचीत में उनके साहित्यिक कार्यों की सूची गिनाने के बजाय उस इंसान तक पहुंचने की कोशिश की गई है जो लेखिका के पीछे मौजूद है और उन कहानियों तक भी, जिन्हें अभी कागज पर उतरना बाकी है।

सवाल : आपकी साहित्यिक, अकादमिक, शोध और मानवाधिकार संबंधी उपलब्धियां बहुत बड़ी और अनेक हैं। जाहिर है, इससे आपके बहुत से ईर्ष्यालु और विरोधी भी बने होंगे। आप उनसे कैसे निपटती हैं?

सना अल-शालन :
सच यह है कि मैं ऐसे लोगों की बिल्कुल परवाह नहीं करती। खासकर उन लोगों की, जो साहित्य, लेखन, आलोचना और साहित्यिक गतिविधियों के मुखौटे के पीछे छिपे रहते हैं। इनमें खास तौर पर वे असफल और गुमनाम लोग शामिल हैं, जो किसी न किसी तरह मेरा नाम अपने साथ जोड़कर अपनी कम होती हैसियत बढ़ाने की कोशिश करते हैं।

वे चाहे मेरे खिलाफ अपमानजनक बातें करें, तीखी आलोचना करें या ऐसी खोखली टिप्पणियां लिखें जिन्हें उनके अलावा कोई पढ़ता तक नहीं, उनका उद्देश्य केवल इतना होता है कि लोग उन्हें मेरे नाम से जोड़कर जानने लगें।

मैं उनके किसी भी बयान या व्यवहार को महज खोखलापन मानती हूं। यह मेरे साए में खड़े होकर थोड़ी-सी रोशनी और ध्यान हासिल करने की उनकी दुखद, सस्ती और असफल कोशिश है। लेकिन मैं उन्हें यह अवसर नहीं देती। बल्कि मैं उन्हें अपनी खामोशी देती हूं। मेरी खामोशी उन्हें और अधिक हाशिये और अंधेरे की ओर धकेल देती है, जहां उनका स्वाभाविक स्थान है।

ऐसे लोगों के साथ मेरा व्यवहार इमाम शाफई के इस कथन पर आधारित है :

“जब मूर्ख बोले तो उसे जवाब मत दो,
क्योंकि उसके जवाब से बेहतर खामोशी है।
यदि तुम उसे जवाब दोगे तो उसकी परेशानी दूर कर दोगे,
और यदि उसे छोड़ दोगे तो वह दुख में मर जाएगा।”

सवाल : ईर्ष्या करने वाले, आलोचक और विरोधी किसी रचनाकार को आखिर क्या देते हैं?

सना अल-शालन :
वे उसे और अधिक प्रसिद्धि, चमक, उपस्थिति और लोगों का ध्यान देते हैं। वे उसके नाम को बार-बार सामने लाते हैं। उसे जनता की सहानुभूति मिलती है और उसके व्यक्तित्व के चारों ओर एक ऐसा आकर्षण पैदा होता है, जो लोगों को उसे करीब से जानने और उसकी रचनाओं को खोजने के लिए प्रेरित करता है।

इसके विपरीत, ईर्ष्या करने वालों और विरोधियों को इससे केवल तिरस्कार, उपेक्षा और अधिक अंधकार मिलता है।

वे जितना अधिक बोलते हैं, उतना ही अपनी खालीपन को उजागर करते हैं। आखिर लोग उनसे पूछते हैं कि अपनी रचनाएं दिखाइए। अपनी कथित उपलब्धियां दिखाइए। वे पुरस्कार दिखाइए, जिनमें से वास्तव में आपको एक भी हासिल नहीं हुआ।

सवाल : क्या आपको आखिरी ऐसा अवसर याद है, जब किसी की उतावली या कटु आलोचना ने आपको दुख पहुंचाया हो?

सना अल-शालन :
बिल्कुल नहीं। मुझे ऐसी कोई घटना याद नहीं। मेरी स्मृति में सुंदरता, अच्छाई, रचनात्मकता और मेरे जीवन में मौजूद बहुत से प्रिय लोग हैं। जहां तक नफरत करने वालों और मानसिक रूप से परेशान लोगों का सवाल है, उनका इलाज मेरे पास नहीं है और मैं उनकी परवाह भी नहीं करती।

मेरा ध्यान उन खूबसूरत लोगों की बड़ी संख्या पर है, जो मुझे प्यार करते हैं, मुझसे संपर्क रखते हैं और मेरी गतिविधियों में रुचि लेते हैं। मैं केवल उन्हीं को देखती हूं, उन्हीं की सुनती हूं और उन्हीं को याद रखती हूं।

सवाल : नफरत और ईर्ष्या करने वालों के लिए आपका जवाब क्या है?

सना अल-शालन :
मेरा एक ही आदर्श जवाब है : बहुत सारी सफलता, सफलता और सफलता, और उसके साथ थोड़ी-सी उपेक्षा।

मेरा नारा है :

“कुत्ते भौंकते रहते हैं और काफिला चलता रहता है।”

सवाल : क्या किसी की आवाज आपकी राह, आपकी कार्यप्रणाली या आपके विचारों को बदल सकती है?

सना अल-शालन :
बिल्कुल नहीं। कौन क्या कहता है, इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। कौन चिल्लाता है, यह भी मेरे लिए मायने नहीं रखता। मैं केवल अपनी आवाज सुनती हूं। हां, यदि कोई ऐसी बात कहे जिसे सुनना मुझे अच्छा लगे, तो जरूर सुनती हूं।

सवाल : क्या आप उपेक्षा को एक सौंदर्यबोध, श्रेष्ठता और नैतिक मूल्य के रूप में स्वीकार करती हैं?

सना अल-शालन :
बिल्कुल। मेरे लिए यह पूरी तरह एक नैतिक और सौंदर्यपरक दर्शन है। हर उस व्यक्ति पर पत्थर फेंकने में समय बर्बाद नहीं किया जा सकता जो बिना जाने कुछ भी बोलता रहता है।

खासकर उन असफल लोगों पर समय क्यों खर्च किया जाए, जो अपनी असफलता और नफरत के पीछे छिपे रहते हैं और पूरे अस्तित्व को इसलिए दंडित करना चाहते हैं क्योंकि स्वयं कोई पहचान नहीं बना सके।

मैं पूरी तरह उस कवि की बात से सहमत हूं जिसने कहा है :

“अगर हर भौंकते कुत्ते के मुंह में एक पत्थर डालता,
तो पत्थर सोने जितना महंगा हो जाता।”

सवाल : आपके विचार में अधिक महत्वपूर्ण क्या है, रचना यानी साहित्यिक पाठ या उसके आसपास होने वाली आलोचनात्मक गतिविधि?

सना अल-शालन :
स्थायित्व और अमरता रचना की है। जिसे हम आलोचना कहते हैं और जिन्हें हम आलोचक कहते हैं, वे सब उसकी छाया में हैं। रचना के बिना आलोचना की क्या कीमत है? कुछ भी नहीं।

हर कोई साहित्यिक रचना पढ़ता है। उसके बारे में लिखी गई आलोचनाओं की परवाह जरूरी नहीं होती। किसी रचना का आनंद लेने के लिए पाठक को आलोचना या आलोचक की जरूरत नहीं होती।

इसके बावजूद कुछ आलोचक, खासकर वे जिनकी अपनी कोई पहचान नहीं है, यह मानते रहते हैं कि हर दिन सूरज केवल उनके अस्तित्व के सम्मान में निकलता है।

मुझे यह प्रसिद्ध कहावत दिलचस्प लगती है कि “आलोचक असफल साहित्यकार होता है।” मैं इससे भी अधिक यह मानती हूं कि नकारात्मक आलोचना अक्सर अपमान, नफरत, ईर्ष्या और असफलता की अभिव्यक्ति बन जाती है।

सवाल : क्या आप नकारात्मक आलोचना में बिल्कुल विश्वास नहीं करतीं?

सना अल-शालन :
नहीं। मेरा विश्वास है कि आलोचना सुंदरता के पक्षों को सामने लाने का एक सौंदर्यपरक साधन है। उसे इससे अलग नहीं होना चाहिए।

सवाल : खराब साहित्यिक रचना से कैसे निपटना चाहिए?

सना अल-शालन :
खराब रचना का सवाल बहुत लंबी चर्चा मांगता है। लेकिन अगर हम यह मान भी लें कि कोई रचना खराब है, हालांकि मैं इस निष्कर्ष को स्वीकार करने के लिए बहुत कठिन शर्तें रखती हूं, तो जो व्यक्ति स्वयं को आलोचक कहता है, उसके लिए बेहतर होगा कि वह उस खराब रचना को खामोशी, विस्मृति और उपेक्षा के हवाले कर दे।

इसका क्या फायदा है कि वह हमारे सामने खराब रचनाएं प्रस्तुत करके हमारा समय बर्बाद करे और हमारे वातावरण को खराब करे? हमें इसकी क्या जरूरत है? और उसे इसकी क्या जरूरत है?

मैं इस व्यवहार में केवल बदमाशी, कुरूपता और रचना तथा उसके लेखक से जुड़कर किसी तरह का ध्यान हासिल करने की खुली कोशिश देखती हूं। कुछ कम हिम्मत और कम उदारता वाले लोग इसी तरह की बदसलूकी और बदमाशी को अपना पेशा बना लेते हैं ताकि किसी तरह अपने अस्तित्व को साबित कर सकें।

सवाल : क्या सना अल-शालन दूसरे लेखकों की रचनाओं के बारे में नकारात्मक आलोचना पढ़ती हैं?

सना अल-शालन :
बिल्कुल नहीं। मेरे पास इस बकवास के लिए बिल्कुल समय नहीं है। मैं सुंदरता और उसके रचनाकारों को पढ़ती हूं।

जहां तक बदमाशी, गाली-गलौज और नफरत का सवाल है, मैं उस पर ध्यान नहीं देती और उसके लेखकों का सम्मान नहीं करती। खासकर उन असफल और निष्क्रिय लोगों का, जो जीवन की सारी ट्रेनें खो चुके हैं और लगातार आलोचना करते रहते हैं।

सच यह है कि मैं और मेरे जैसे दूसरे लोग उनकी रचनाएं पढ़ते तक नहीं। हम उनके संदेश और लेख बिना पढ़े ही मिटा देते हैं, क्योंकि हम उनसे पूरी तरह आगे निकल चुके हैं। इसके बाद हम अपनी सुबह की कॉफी शांति से पीते हैं और सुबह तथा उसके सुंदर लोगों की खूबसूरती का आनंद लेते हैं।

ऐसे लोग हर चीज की आलोचना करते हैं। साहित्य, आलोचना, लोग, परिस्थितियां, बातचीत, सुंदरता, खुशियां और हर वह सुंदर चीज जो उनके पास नहीं है। लेकिन वे खुद की, अपनी कुरूपता, अपनी विफलता और अपने घटिया लेखन के माध्यम से दूसरों पर थोपने की कोशिश की आलोचना नहीं करते।

सवाल : आपके साहित्य पर होने वाली आलोचना में डॉ. सना अल-शालन का ध्यान सबसे ज्यादा किस बात पर जाता है?

सना अल-शालन :
मेरा ध्यान इस बात पर जाता है कि शोधकर्ता या आलोचक ने मुझे किस कोण से देखा। उसने किन चीजों को पकड़ लिया जिन्हें मैंने जानबूझकर नहीं कहा था। या उसने उन हिस्सों को कैसे देख लिया, जिन्हें मैं छिपाना चाहती थी।

मुझे उसकी ग्रहण करने और समझने की शैली और भी ज्यादा चकित करती है। कई बार किसी रचना को पढ़ने और समझने का उसका तरीका स्वयं एक नई रचनात्मकता बन जाता है।

सवाल : क्या आपने कभी एक अनुभवी आलोचक और आधुनिक साहित्य की प्रोफेसर होने के नाते किसी साहित्यिक रचना या रचनाकार के बारे में नकारात्मक आलोचना लिखी है?

सना अल-शालन :
ऐसा करना मेरे लिए असंभव है और मैं ऐसा कभी नहीं करूंगी। सुंदर रचना पर मैं ठहरती हूं और उसे ध्यान से पढ़ती हूं। जो रचना मुझे पसंद नहीं आती, उसे छोड़ देती हूं।

मैं साहित्य के नाम पर गाली देने और अपशब्द कहने वाली नहीं हूं। कवि ने ठीक कहा है :

“सबसे बुरे लोग वे हैं जिन्हें गाली देने का शौक होता है।”

शिक्षण और लोगों के साथ व्यवहार में भी मेरा यही तरीका है। जो सुंदर और सही है, उसकी प्रशंसा करती हूं, उसकी ओर संकेत करती हूं और उसे आगे बढ़ाती हूं। जो इसके विपरीत है, उसे नजरअंदाज कर देती हूं।

मैं कुरूपता, पतन, अपमान और छोटी-छोटी बातों से कहीं ऊपर हूं।

सवाल : क्या डॉ. सना अल-शालन कभी गुस्से या उत्तेजना की स्थिति में साहित्य लिखती हैं?

सना अल-शालन :
मैं “गुस्से” से आपका मतलब पूरी तरह नहीं समझती। यदि इसका अर्थ स्वयं पर नियंत्रण खो देना, लेखन में उद्देश्यहीन हो जाना, बदला लेने, अपमान करने और मूर्खतापूर्ण क्रोध की ओर बह जाना है, तो मैं इससे बिल्कुल दूर हूं।

मैं जनता को खुश करने के लिए भी नहीं लिखती। मैं ऐसे लोगों की स्वीकृति पाने की कोशिश नहीं करती जिनकी स्वीकृति मेरे लिए महत्वपूर्ण ही नहीं है। मैं किसी से कुछ मांगती नहीं हूं और मुझे किसी की स्वीकृति की जरूरत नहीं है।

मेरी कलम मेरी मान्यताओं, मेरी इच्छा और मेरे उद्देश्य की अभिव्यक्ति है। खासकर उन लोगों की राय मेरे लिए महत्वपूर्ण नहीं है जो गंभीरता, स्पष्टता, ईमानदारी और दृढ़ता से बोलने वाले हर व्यक्ति को “गुस्सैल” कह देते हैं, जबकि स्वयं झूठ, पाखंड और दिखावे को अपना जीवन बना चुके हैं।

लेकिन अगर “गुस्से” से आपका मतलब वह भावनात्मक स्थिति है जिसमें तीव्र अनुभूति, प्रबल भावना और सच्ची अभिव्यक्ति मौजूद हो, तो मैं लेखन में भी भावुक और तीव्र हूं और जीवन में उससे भी अधिक। मैं बदमाशों, पतन, मूर्खता और इन सबके लोगों को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर सकती।

सवाल : अक्सर कहा जाता है कि आप एक रचनात्मक और सुंदर लेखिका हैं। क्या सुंदरता के इस वर्णन से आपको परेशानी होती है?

सना अल-शालन :
बिल्कुल नहीं। इससे मुझे बहुत खुशी होती है। सुंदरता कई प्रकार की होती है। जब दूसरे लोग मेरी सुंदरता के विभिन्न रूपों को देखते हैं तो यह मेरे लिए कुरूपता पर एक जीत है।

यह मेरे और मेरे साहित्य तथा मेरी ओर से निकलने वाली हर चीज के एक अर्थ से दूसरे अर्थ की ओर जाने जैसा है।

मुझे सुंदरता पसंद है। मैं सुंदरता के लिए जीती हूं और उसे इंसान का अभिन्न हिस्सा मानती हूं। जब सुंदरता इंसान से अलग हो जाती है तो वह कुरूप हो जाता है।

अल्लाह का शुक्र है कि मैं सुंदर हूं, कुरूप नहीं, और लोग मुझे इसी तरह देखते हैं। यह एक नेमत पर दूसरी नेमत और एक कृपा पर दूसरी कृपा है।

सवाल : क्या आप अपनी सुंदर तस्वीरें अपनी किताबों के कवर पर इसलिए लगाती हैं क्योंकि आप सुंदर हैं?

सना अल-शालन :
मैं अपनी किताबों के कवर पर अपनी सुंदर तस्वीरें इसलिए लगाती हूं क्योंकि मैं चाहती हूं कि पाठक मेरा चेहरा जाने। बहुत से लेखक और प्रकाशन से जुड़े लोग भी अपनी किताबों के साथ ऐसा करते हैं।

यह मेरा चेहरा है और इसे छिपाने का कोई तर्क नहीं है। दूसरे लोग इसे सुंदर देखते हैं और मुझे इस पर गर्व है। मैं अल्लाह का शुक्र अदा करती हूं कि उसने मुझे ऐसा चेहरा दिया, जिसके साथ मैं उसके बनाए लोगों के सामने आती हूं।

अल्लाह की उन तमाम नेमतों के लिए शुक्र है, जिन्हें हम जानते हैं और जिन्हें हम नहीं जानते।

क्या रचनाकार के लिए यह जरूरी है कि वह बदसूरत हो, तभी उसे अपनी तस्वीर किताब के कवर पर लगाने की अनुमति मिले?

सवाल : जो व्यक्ति स्वयं को साहित्यकार, आलोचक, शिक्षक या दार्शनिक बताता है, लेकिन सुंदरता के खिलाफ खड़ा होता है और उसे जीता नहीं है, उसे आप किस तरह देखती हैं?

सना अल-शालन :
लोग जो देखना चाहते हैं, उसके लिए स्वतंत्र हैं। न मेरे पास उनके खिलाफ कोई तर्क है और न उनके पास मेरे खिलाफ कोई तर्क है।

हर व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार जीता है और मैं अपनी पसंद के अनुसार जीती हूं। हम किसी इंसान से ऐसी सुंदरता जीने की मांग नहीं कर सकते, जो उसके भीतर मौजूद ही नहीं है।

हर बर्तन से वही छलकता है जो उसके भीतर होता है।

सवाल : पाठक आपको उपन्यासकार, अकादमिक, आलोचक, लेखिका और मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में जानते हैं। अगर आप इन सभी विशेषणों और उपाधियों को हटा दें तो सना अल-शालन कौन हैं?

सना अल-शालन :
दूसरों द्वारा दिए गए खिताबों को हम तब छोड़ सकते हैं जब वे केवल बनाए हुए लबादे और उनकी मुफ्त दी हुई भेंट हों। लेकिन उपलब्धियों को छोड़ना उचित नहीं है।

इसलिए मैं अपनी कलम, अपनी अकादमिक मेहनत और उसमें हासिल अपनी रैंक, अपने मानवीय और मानवाधिकार संबंधी सरोकारों को नहीं छोड़ती। मैं अपनी किसी उपलब्धि या अर्जित सम्मान से मुंह नहीं मोड़ती।

ये मेरे हैं और मैं इन्हें कभी नहीं छोड़ूंगी, क्योंकि इन्हें मैंने अपनी मेहनत, परिश्रम और योग्यता से हासिल किया है।

मेरा मानना है कि हर इंसान वही है जो उसने अपने जीवन में किया है। मैंने अपनी उपलब्धियों के लिए मेहनत की है, उनके प्रति ईमानदार रही हूं और मुझे उन पर बहुत गर्व है।

सवाल : आपने अपनी मां नईमा का नाम अपने साहित्यिक नाम के साथ जोड़कर ‘सना अल-शालन बिंत नईमा’ रखा। क्या यह सिर्फ मां के प्रति प्रेम और सम्मान है या आप यह कहना चाहती हैं कि जिसने आपको बनाया, वह आपके हर हासिल किए हुए मुकाम में मौजूद रहने की हकदार है?

सना अल-शालन :
यह मेरी मां के मुझ पर किए गए उपकार की स्वीकारोक्ति है। यह उनके प्रति मेरा गर्व और मेरी ओर से उनके लिए पूर्ण निष्ठा है। मैं उनके पवित्र नाम को अस्तित्व में अमर करना चाहती हूं।

किताब ही वह चीज है जो हम सभी के चले जाने के बाद बचती है। इसलिए मैं अपनी मां को किताब के माध्यम से अमर करना चाहती थी। मैं नहीं चाहती थी कि उनका नाम किसी अज्ञात कब्र के पत्थर पर लिखे एक नाम तक सीमित रह जाए।

मेरी मां मुझसे यही पाने की हकदार हैं। हर व्यक्ति के मन में अपनी मां और पिता की एक अलग जगह होती है और उसे अपनी भावना व्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता है।

सवाल : ऐसे समय में जब बहुत से लेखकों के लिए प्रसिद्धि एक लक्ष्य बन गई है, क्या आप अब भी मानती हैं कि वास्तविक लेखन प्रसिद्धि की रोशनी से दूर पैदा हो सकता है और अंततः केवल रचना ही बचती है?

सना अल-शालन :
प्रसिद्धि कोई अपराध नहीं है। यह एक वैध उपलब्धि है, जिसे किसी से नकारा नहीं जाना चाहिए। कई बार प्रसिद्धि खुद इंसान के पास आती है, इंसान उसके पीछे नहीं भागता।

हर व्यक्ति प्रसिद्धि चाहता है, खासकर सकारात्मक प्रसिद्धि। इसमें कोई बुराई नहीं है। बुराई तब है जब प्रसिद्धि ऐसी चीज से मिले जो इंसान को शर्मिंदा करे, उसकी गरिमा, नैतिकता और सम्मान को कम करे।

जहां तक रचनात्मक लेखन की बात है, वह अपने प्रचार के बिना जीवित नहीं रह सकता। हम लिखकर अपनी रचनाओं को दराज में बंद नहीं कर सकते और न ही उन्हें लोगों से छिपा सकते हैं। अगर लेखन प्रकाशित ही न हो तो उसका उद्देश्य क्या है?

हां, निजी डायरी, व्यक्तिगत संस्मरण, निजी विचार या ऐसी आत्मकथात्मक बातें अलग हैं जिनमें शर्मनाक बातें, निजी रहस्य या ऐसी सामग्री हो जिसे प्रकाशित नहीं किया जाना चाहिए।

साहित्यिक रचना भी नवजात इंसान की तरह है। उसे प्रकाश चाहिए, उसे सामने आना चाहिए और उसका अपना जीवन होना चाहिए। कोई रचना बंद दराज या अलमारी में दबी रहकर कैसे जीवित रह सकती है?

यह तर्क के विरुद्ध है। रचना को प्रकाश में आना चाहिए। उसका पहला प्रचार उसका प्रकाशन है, ताकि वह अपना स्वाभाविक जीवन जी सके और वह मुकाम हासिल कर सके जिसकी वह हकदार है।

जहां तक प्रसिद्धि की बात है, वह अलग विषय है और उस पर लंबी चर्चा हो सकती है। लेकिन निश्चित रूप से सबसे पहले और अंततः जीवन रचना का है।

सवाल : आप आधुनिक साहित्य और उसकी आलोचना की प्रोफेसर हैं। एक प्रसिद्ध आलोचक भी हैं और साथ ही उपन्यास, कहानी, नाटक, बाल साहित्य और किशोर साहित्य लिखती हैं। क्या लेखिका के भीतर मौजूद आलोचक लेखन के दौरान उसकी निगरानी करता है या कलम उठाते समय आप अकादमिक दृष्टिकोण से बाहर निकलने की कोशिश करती हैं?

सना अल-शालन :
हर रचनाकार के भीतर एक आंतरिक निगरानी करने वाला होता है। वह उसके काम को देखता है, उसका मूल्यांकन करता है और एक अर्थ में तय करता है कि वह रचना जीवित रहेगी या मर जाएगी और उपेक्षित होगी।

उस आंतरिक निगरानी करने वाले को हम आलोचक, जानकार, स्वीकृति देने वाला, संतुष्ट होने वाला, न्यायाधीश या कभी-कभी जल्लाद तक कह सकते हैं।

वास्तविक रचनात्मकता को अपने भीतर या बाहर किसी औपचारिक आलोचक की आवश्यकता नहीं होती। वह इन सबसे बड़ी चीज है। लेकिन वह अपने उत्पाद को सबसे पहले अपने साथ कुछ मूल्यों के अनुरूप फिल्टर जरूर करता है और बाद में शायद समाज के साथ भी उसका सामंजस्य देखता है।

जब कोई रचनाकार मेरे जैसे किसी क्षेत्र में अकादमिक रूप से विशेषज्ञ हो, तो वह आम तौर पर अपने साहित्य की विधा और स्वरूप को पहचान सकता है, लेकिन वह उसे उसी आधार पर बांधता या जज नहीं करता। अगर वह ऐसा करने लगे तो रचनात्मकता स्वाभाविक न रहकर कृत्रिम हो जाएगी।

अगर साहित्य आलोचना की ताकत से पैदा होता, तो आलोचक ही वे लोग होते जो शून्य से साहित्यिक रचनाएं पैदा करते। ऐसा नहीं है। आंकड़े इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं।

सवाल : कुछ साहित्यिक रचनाएं हम लिखते हैं और कुछ रचनाएं हमें लिखती हैं। सना अल-शालन की कौन-सी रचना ऐसी है जिसमें आपको लगता है कि आपके व्यक्तित्व का कोई ऐसा हिस्सा उजागर हुआ जिसे सामने लाने के लिए आप तैयार नहीं थीं?

सना अल-शालन :
मैं साहित्य की निरर्थकता और उसके उद्देश्यहीन होने में बिल्कुल विश्वास नहीं करती। साहित्य की ऐसी व्याख्या कि वह रचनाकार की इच्छा और नियंत्रण से बाहर किसी अराजक शक्ति की इच्छा है, मेरे लिए निराधार है।

यह सब ऐसी कल्पनाएं और झूठे दावे हैं जिनका कोई मूल्य नहीं। उद्देश्यपूर्णता साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है। इसके विपरीत हो तो वह साहित्य ही नहीं रह जाता।

इसी दृष्टि से कोई भी रचना रचनाकार की इच्छा, उद्देश्य और चुनावों से बाहर कागज पर पैदा नहीं होती। इसके विपरीत दावा करना महज मजाक, झूठ और प्रेरणा को ऐसी शक्तियों के हवाले करने की असफल कोशिश है जो रचनाकार के नियंत्रण से बाहर हों।

वास्तव में यह रचनात्मकता को ऊपर उठाना नहीं बल्कि नीचे गिराना है।

सवाल : आपकी बहुत-सी रचनाओं में इंसान, हाशिये के लोग, महिला, बच्चा, सामाजिक न्याय और अत्याचार, दमन, विस्थापन तथा कब्जे के खिलाफ इंसान के संघर्ष जैसे विषय आते हैं। क्या आपको लगता है कि लेखक दर्द और अन्याय के सामने निष्पक्ष रह सकता है, या कुछ मुद्दों पर चुप रहना भी अपने आप में एक موقف बन जाता है?

सना अल-शालन :
ऐसे समय में जब बहुत से लोग विश्वासघात, पतन, गिरावट और अश्लीलता को भी विचार का एक रूप बताने लगे हैं, कलम जल्लाद और अन्याय की साझेदार बन सकती है। कई बार वह आज भी ऐसी ही भूमिका निभाती है।

लेकिन मूल रूप से कलम सत्य और न्याय की तस्वीर होनी चाहिए। उसे सच्चाई के पक्ष में खड़ा होना चाहिए। हर व्यक्ति इस मामले में अपना चुनाव करता है।

किसी गद्दार या कायर को बहादुर और स्वतंत्र बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। ये नैतिक मूल्य हैं और जिसके पास वे नहीं हैं, वह उन्हें खरीद नहीं सकता।

सवाल : साहित्य किस हद तक प्रतिरोध का माध्यम बन सकता है? क्या साहित्यिक रचना किसी विचार को हरा सकती है या किसी इंसान की चेतना बदल सकती है, भले ही वह राजनीतिक और सामाजिक वास्तविकता को न बदल पाए?

सना अल-शालन :
साहित्य का प्रतिरोध का माध्यम बनना स्वीकार्य है और इसके बहुत से प्रसिद्ध उदाहरण हैं। हर व्यक्ति अपने तरीके से प्रतिरोध कर सकता है।

लेकिन असली सवाल यह है कि ऐसी लेखन शक्ति हथियार, सैन्य ताकत, तकनीक, हिंसा और अधिकारों पर कब्जा करने वाले अत्याचारियों तथा कब्जाधारियों के सामने किस हद तक खड़ी हो सकती है?

यहीं वास्तविक सवाल पैदा होता है। इसका उत्तर हमें कवि अबू तम्माम की प्रसिद्ध कविता की ओर ले जाता है, जिसकी शुरुआत है :

“तलवार किताबों से अधिक सच्ची खबर देती है,
उसकी धार ही सत्य और खेल के बीच अंतर करती है।”

एक बार मैंने एक ऐसे व्यक्ति को सुना, जो खुद को अनुभवी आलोचक बताता था। वास्तव में वह करोड़ों में बीसवें दर्जे का आलोचक भी नहीं था। वह कह रहा था कि शब्द शिकारी बंदूक हैं और किसी भी जीत से पहले ही शब्द जीत दिला देते हैं।

मैं उसकी अज्ञानता भरी और बनावटी बात पर हंसी। वह अपनी कायरता और कमजोरी के लिए मशहूर है। जिसकी कलम खुद निष्क्रिय है, वह अपनी हारी हुई बातों और अपने शरीर में छिपी कायरता से हमें कैसे जीत दिला सकता है?

सवाल : फिलिस्तीनी मुद्दा आपके साहित्यिक, वैचारिक और मानवाधिकार संबंधी अनुभव का हिस्सा है और समकालीन अरब स्मृति का भी हिस्सा है। क्या आपको लगता है कि अरब साहित्य फिलिस्तीन को उस तरह सामने ला सका है जैसा उसे लाना चाहिए था? या इस त्रासदी के आकार को व्यक्त करने में साहित्यिक असमर्थता रही है?

सना अल-शालन :
फिलिस्तीनी मुद्दे पर बहुत अधिक बातें, भाषण और राजनीतिक दिखावा हो चुका है। उसे वास्तविक कार्रवाई की जरूरत है, न कि और अधिक शब्दों, अवसरवादियों और भाषणबाजी की।

यह मामला केवल एक शब्द से कहीं अधिक गंभीर है। किसी लेख या कविता से कहीं अधिक बड़ा और निर्णायक है। लेखन की अपनी अहमियत है और मैं उसका सम्मान करती हूं, लेकिन जरूरत केवल शब्दों, कविताओं और शायरी से कहीं बड़ी है।

सवाल : क्या आपको कभी डर लगता है कि साहित्य में फिलिस्तीनी मुद्दा केवल नारों में बदल जाएगा, जबकि उसे पात्रों और घटनाओं के भीतर गहरे मानवीय अनुभव के रूप में मौजूद होना चाहिए?

सना अल-शालन :
मुझे नहीं लगता कि आधुनिक मानव इतिहास में किसी और मुद्दे पर फिलिस्तीनी मुद्दे जितना अवसरवाद, विश्वासघात और स्वार्थ हुआ है।

लेकिन इसके साथ ही सच यह भी है कि अधिकार कभी मरता नहीं। ईमानदार कलम स्पष्ट होती है। नायक पहचाने जाते हैं और इतिहास सच्चाई दर्ज करता है, चाहे झूठ बोलने वाले उसे कितना भी विकृत करने की कोशिश करें।

सवाल : आप उन लेखिकाओं में हैं जिन्होंने महिला के विषय पर लिखा है। लेकिन ‘नारीवादी साहित्य’ शब्द आज भी बहस पैदा करता है। क्या आपको लगता है कि महिला द्वारा लिखे गए साहित्य को अलग से ‘नारीवादी साहित्य’ कहना जरूरी है? या कभी-कभी यह वर्गीकरण लेखिका के साथ अन्याय करता है?

सना अल-शालन :
मेरा सरोकार इंसान से है, चाहे वह महिला हो या पुरुष, बच्चा हो या बुजुर्ग। मैं इंसान और समाज के भीतर गहराई से उतरकर काम करती हूं।

साहित्य के बाहरी वर्गीकरणों में मेरी कोई खास रुचि नहीं है। पुरुष लिखे या महिला, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। महत्वपूर्ण चीज उसकी विषयवस्तु, मुद्दे, दृष्टि, संरचना, उद्देश्य और संदेश हैं।

सवाल : जब कोई महिला लेखिका ऊंची आवाज में सच बोलने का फैसला करती है तो उसे क्या खोना पड़ता है? क्या आपने अपने विचारों या लेखन के कारण इसकी व्यक्तिगत कीमत चुकाई है?

सना अल-शालन :
सच बोलने पर केवल महिला लेखिका ही नहीं, बल्कि पुरुष भी नुकसान उठाता है। दुनिया झूठ, पतन, दबाव, जबरदस्ती और प्रभावशाली शक्तियों की दुनिया है।

जो भी व्यक्ति सच को व्यवहार या शब्दों में अपनाता है, उसके खिलाफ दुश्मनों और नफरत करने वालों की कतार खड़ी हो जाती है। उसके साथ वैसा ही व्यवहार किया जाता है, जैसा उसकी सच्चाई और उसके द्वारा बदमाशों, भ्रष्ट लोगों और दूसरों का अधिकार छीनने वालों को पहुंचाई गई परेशानी के अनुपात में होता है। ये लोग उसके बेहद करीबी भी हो सकते हैं।

हम केवल सच बोलने पर नहीं हारते। हम उससे ज्यादा तब हारते हैं जब सच नहीं बोलते। इसलिए इस नकली जीवन में हमारी हारें कितनी अधिक हैं।

सवाल : आपने वयस्कों के लिए भी लिखा और बच्चों तथा किशोरों के लिए भी। आपके बाल साहित्य पर पूरी अकादमिक पढ़ाई हुई है। सना अल-शालन ने बच्चों की दुनिया में ऐसा क्या पाया जो उसे वयस्कों की दुनिया में नहीं मिला?

सना अल-शालन :
मैं वयस्कों की दुनिया में खोई हुई कोई चीज बच्चों और किशोरों की दुनिया में तलाशने नहीं गई।

मैं इस विश्वास से काम करती हूं कि अरब बच्चे और अरब युवाओं के लिए एक पवित्र जिम्मेदारी के रूप में साहित्य प्रस्तुत किया जाना चाहिए, ताकि उनकी पहचान, व्यक्तित्व और ज्ञान का निर्माण हो सके।

सवाल : क्या हम अरब लोग बाल साहित्य को वह स्थान देते हैं जिसका वह हकदार है? या हम उसे दूसरे दर्जे का साहित्य मानते हैं, जबकि बच्चे के दिमाग और व्यक्तित्व के निर्माण में उसका प्रभाव बहुत बड़ा है?

सना अल-शालन :
मैं आंकड़ों के महत्व में विश्वास करती हूं। आंकड़े सभी विज्ञानों के आधार हैं।

अगर हम अरब दुनिया में बाल साहित्य के उत्पादन, उसके स्वरूप, गुणवत्ता, लेखकों की संख्या, संस्थानों और उसके लिए उपलब्ध बजट की तुलना दूसरे देशों से करें तो इस क्षेत्र में अरब दुनिया की स्थिति बहुत निराशाजनक दिखाई देगी।

दुर्भाग्य से इस क्षेत्र में रचनात्मक, शैक्षिक और नैतिक क्रांति की जरूरत है। बाल साहित्य को बच्चे की तरह ही एक राष्ट्रीय मुद्दा माना जाना चाहिए। यह अरब समाज की सुरक्षा, उसके भविष्य और उसकी चुनौतियों से जुड़ा विषय है।

इसे महज शब्दों, व्यक्तिगत प्रयासों या बिना योजना के काम तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके लिए स्पष्ट दृष्टि और बड़े स्तर पर आर्थिक समर्थन की जरूरत है।

सवाल : आप फोन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामग्री पढ़ने वाली नई पीढ़ी को कैसे देखती हैं? उनमें लंबा उपन्यास पढ़ने का धैर्य शायद नहीं है। क्या उपन्यास तकनीक के खिलाफ अपनी लड़ाई हार रहा है?

सना अल-शालन :
पढ़ने का तरीका महत्वपूर्ण नहीं है। चाहे पढ़ना इलेक्ट्रॉनिक हो या कागज पर, ज्ञान, सौंदर्य और भावनात्मक प्रभाव की दृष्टि से दोनों समान हैं।

महत्वपूर्ण यह है कि नई पीढ़ी पढ़े, चाहे वह किसी भी माध्यम से पढ़े।

जहां तक साहित्य में लंबाई की बात है, साहित्य को विज्ञान, गति और तकनीक की वास्तविकताओं को स्वीकार करना होगा। आज की तेज जिंदगी, व्यस्तता और हर क्षेत्र में लगातार बढ़ती सामग्री के बीच साहित्य को संक्षिप्तता और सघनता की ओर बढ़ना होगा।

इस तेज, संक्षिप्त और सघन दुनिया में हजार पृष्ठों का उपन्यास कितना सार्थक होगा? साहित्य को वर्तमान की वास्तविकताओं के अनुसार खुद को ढालना होगा, वरना पाठक उसे पूरी तरह छोड़ देगा।

सवाल : एक प्रोफेसर के रूप में आप विश्वविद्यालयों में अरब साहित्य का भविष्य कैसे देखती हैं? क्या अरब छात्र अब भी उत्साह से पढ़ते हैं या किताब स्क्रीन के सामने अपनी लड़ाई हार रही है?

सना अल-शालन :
अगर पूरा समाज पढ़ने की ओर ध्यान नहीं देता तो विश्वविद्यालय की भूमिका भी सीमित हो जाती है।

पढ़ने की शुरुआत परिवार, माता-पिता, स्कूल और समाज से होती है। विश्वविद्यालय बाद में इसे बेहतर रूप देता है।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि पढ़ाई कागज से हो रही है या आधुनिक तकनीकी उपकरणों की स्क्रीन से। असली लड़ाई पढ़ने और न पढ़ने के बीच है, कागज और इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन के बीच नहीं।

सवाल : आपको बहुत से पुरस्कार और सम्मान मिले हैं। आपकी रचनाओं पर अलग-अलग देशों और कई भाषाओं में विश्वविद्यालयी तथा अकादमिक शोध हुए हैं। क्या पुरस्कार अब आपके लिए महत्वपूर्ण हैं या महत्वहीन? या लेखक एक समय के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि सबसे बड़ा पुरस्कार यह है कि उसकी रचना जीवित रहे?

सना अल-शालन :
मुझे मिलने वाली हर उपलब्धि मेरे लिए महत्वपूर्ण है। मैं कभी यह दावा नहीं करती कि मैं उपलब्धियों, पुरस्कारों और मान्यता से ऊपर हूं।

ये सभी चीजें मेरे लिए एक मजबूत रचनात्मक इमारत तैयार करती हैं। वे मेरे काम की मान्यता को मजबूत करती हैं और रचनात्मकता की दिशा को मेरी ओर आकर्षित करती हैं।

मैं उपलब्धि, मान्यता, पाठक, प्रेम और रचना के जीवन में विश्वास करती हूं। मैं यह नहीं मानती कि इनमें से अधिक कुछ हासिल करना व्यर्थ है।

जो लोग सार्वजनिक रूप से ऐसा कहते हैं, वे वास्तव में पर्दे के पीछे इन्हीं चीजों के लिए बहुत लालायित रहते हैं।

सवाल : लंबे समय तक लेखन करने के बाद क्या सफलता के साथ आपका संबंध बदला है? क्या अब आप पाठक तक पहुंचने के लिए अधिक उत्सुक हैं या अपनी बात कहने के लिए, भले ही वह सबको पसंद न आए?

सना अल-शालन :
मैं सबके खिलाफ नहीं हूं। मैं सबके साथ हूं और केवल उस छोटी-सी जमात के खिलाफ हूं जो अहंकार से भरी हुई है, बशर्ते बहुमत या अधिकांश लोग सही पक्ष पर हों।

लेखन में मेरा रास्ता एक ही है। मैं अपने लिए, सुंदरता के लिए, अच्छाई के लिए और अच्छे लोगों के लिए लिखती हूं। मैं उन लोगों के खिलाफ हूं जो इस अच्छाई और सुंदरता को विकृत करते हैं।

सवाल : अगर समय आपको आपकी शुरुआती जिंदगी में वापस ले जाए तो अनुभवी और स्थापित सना अल-शालन शुरुआती सना अल-शालन को क्या सलाह देंगी?

सना अल-शालन :
मैं उससे कहूंगी : उन लोगों की कम परवाह करो जो तुम्हारी परवाह के योग्य नहीं हैं। आगे बढ़ो और पीछे या अपने दोनों ओर मत देखो।

यह तुम्हारा काम नहीं है कि गिरने वालों के पतन का मूल्यांकन करो या असफल लोगों की ठोकरें ठीक करो।

संक्षेप में, मैं अपने प्रति अधिक ईमानदार रहती और कम महत्वाकांक्षी, कम प्रतिभाशाली और कम उपलब्धि वाले लोगों पर अपना ध्यान कम खर्च करती।

सवाल : अंत में एक ऐसा सवाल, जो शायद आपसे बहुत कम पूछा जाता है। ऐसी कौन-सी चीज है जिसे आप अब तक लिख नहीं पाई हैं, जबकि वह आपके भीतर मौजूद है?

सना अल-शालन :
हमारे भीतर हमेशा कुछ ऐसी विशाल और रहस्यमय जगहें होती हैं, जहां हम अभी तक पहुंच नहीं पाए हैं।

जब किस्मत हमारा साथ देती है और हम उन जगहों तक पहुंच जाते हैं, तब हम उनमें घूम सकते हैं और उनके बारे में वह सब लिख सकते हैं, जिसके बारे में हमें पहले यह पता ही नहीं था कि हमारे भीतर उसे लिखने की क्षमता मौजूद है।

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