पहलगाम हमला: शहादत की वो कहानी जिसने नफरत के मंसूबों को राख कर दिया
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मुस्लिम नाउ विशेष
पहलगाम की वादियों में चिनार के पत्ते आज भी उसी तरह गिर रहे हैं। बर्फ से ढकी चोटियां शाम के वक्त चांदी की तरह चमकती हैं। लेकिन इस खूबसूरती के पीछे एक ऐसा जख्म है जो रह-रहकर टीस मारता है। आज 22 अप्रैल 2026 है। ठीक एक साल पहले इसी दिन आतंकियों ने मिनी स्विट्जरलैंड कही जाने वाली बैसरन घाटी को बेगुनाह सैलानियों के खून से रंग दिया था। उस हमले में 26 लोगों की जान गई थी। आज जब हम इस त्रासदी की पहली बरसी पर खड़े हैं, तो सन्नाटा बहुत कुछ कहता है।
इंसानियत का सिपाही: शहीद सैयद आदिल हुसैन
पहलगाम के हपतनार गांव का वह छोटा सा रास्ता आज नम आंखों से भरा है। पिछले साल तक सैयद आदिल हुसैन महज एक ‘पोनीवाला’ थे। वह घोड़े पर बैठाकर सैलानियों को पहाड़ों की सैर कराते थे। लेकिन 22 अप्रैल 2025 की दोपहर ने उन्हें हमेशा के लिए अमर कर दिया। जब आतंकी निहत्थे पर्यटकों पर गोलियां बरसा रहे थे, आदिल अपनी जान बचाकर भाग सकते थे। लेकिन उन्होंने शहादत का रास्ता चुना।
आदिल सीधे आतंकी से भिड़ गए। उन्होंने राइफल छीनने की कोशिश की। इसी दौरान उन्हें गोलियां लगीं। आदिल के पिता सैयद हैदर शाह का गला भर आता है। वह कहते हैं कि आतंकियों ने नाम पूछकर गोली मारी थी। लेकिन उनके बेटे ने किसी का मजहब नहीं देखा। उसने सिर्फ इंसानियत को चुना। आज पूरे देश को आदिल की बहादुरी पर नाज है। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने अपना वादा पूरा किया है। आदिल के परिवार को एक नया घर बनाकर सौंपा गया है। पिता कहते हैं कि मेरा बेटा मरा नहीं है। वह आज भी हमारे साथ है।
शादी की खुशियां और मातम का वो मंजर
पहलगाम हमले की सबसे दर्दनाक तस्वीर नेवी अफसर विनय नरवाल की थी। विनय की शादी हमले से महज छह दिन पहले हुई थी। 16 अप्रैल को मसूरी में फेरे हुए थे। 19 अप्रैल को रिसेप्शन था। घर में अभी शगुन के गाने गूंज ही रहे थे कि 22 अप्रैल को सब कुछ खत्म हो गया। विनय का शव जब जमीन पर पड़ा था, उनकी पत्नी हिमांशी निशब्द पास बैठी थीं। उस तस्वीर ने पूरे हिंदुस्तान को रुला दिया था।
विनय के पिता राजेश नरवाल करनाल में रहते हैं। वह कहते हैं कि सांसों का चलना ही जिंदगी नहीं है। हम तो उसी दिन अंदर से मर गए थे। विनय ने अपनी डायरी में भविष्य के लिए बहुत सी योजनाएं लिखी थीं। अब पिता उन सपनों को समाज सेवा के जरिए पूरा करना चाहते हैं। वह कहते हैं कि हम 22 अप्रैल को पुण्यतिथि नहीं मनाएंगे। हम 1 मई को विनय का जन्मदिन मनाएंगे। यह एक पिता की कोशिश है अपने बेटे को यादों में जिंदा रखने की।
नजाकत अली: वो गाइड जिसने 11 जानें बचाईं
उस खौफनाक मंजर के बीच कुछ ऐसे भी थे जो फरिश्ता बनकर आए। टूरिस्ट गाइड नजाकत अली उनमें से एक हैं। नजाकत उस दिन 11 मेहमानों को लेकर बैसरन गए थे। दोपहर का वक्त था। लोग जिप लाइन का मजा ले रहे थे। तभी गोलियां चलने लगीं। नजाकत बताते हैं कि पहले लगा कि शायद कोई झगड़ा हुआ है। लेकिन जब लोग गिरने लगे तो माजरा समझ आया।
नजाकत डरे नहीं। वह अपने मेहमानों को सुरक्षित जगह की ओर लेकर भागे। जब उन्हें पता चला कि दो लोग पीछे छूट गए हैं, तो वह वापस मौत के मुंह में गए। उन्हें बचाकर लाए। आज नजाकत देश के पर्यटकों से अपील करते हैं। वह कहते हैं कि कश्मीर हिंदुस्तान का ताज है। आप यहां आइए। आपकी हिफाजत के लिए एक नहीं, हजारों नजाकत खड़े हैं।
बैसरन की वीरानी और सन्नाटा
हमले को एक साल बीत गया है। लेकिन बैसरन वैली अभी भी पर्यटकों के लिए बंद है। इसके पीछे सुरक्षा और कनेक्टिविटी बड़े कारण हैं। सूत्रों की मानें तो जब तक सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं होते, इसे नहीं खोला जाएगा। पहलगाम के बाजार सजे हैं। दुकानें ग्राहकों का इंतजार कर रही हैं। लेकिन वो रौनक अभी गायब है।
कैब चलाने वाले मंजूर कहते हैं कि उस दिन को याद करके आज भी बेचैनी बढ़ जाती है। आतंकियों ने हमें आपस में लड़ाने की साजिश रची थी। लेकिन देश ने एकजुट होकर उसे नाकाम कर दिया। मंजूर ने उस दिन घायलों के लिए अपनी कैब फ्री कर दी थी। वह दिन-रात अस्पताल के चक्कर काटते रहे। यही कश्मीरियत है जिसे आतंकी खत्म करना चाहते थे।
ऑपरेशन महादेव: जब मिला पूरा इंसाफ
सुरक्षाबलों ने इस हमले का बदला लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन महादेव’ चलाया। करीब 90 दिनों तक चली इस कार्रवाई में 28 जुलाई तक सभी तीन आतंकी मार गिराए गए। सेना के अफसरों का कहना है कि हमारा मकसद सिर्फ आतंकियों को मारना नहीं था। हमारा मकसद बेगुनाहों को न्याय दिलाना था।
आज पहलगाम में सुरक्षा कड़ी है। चप्पे-चप्पे पर जवान तैनात हैं। पुणे से आए पर्यटक विनय कहते हैं कि शुरू में डर था। लेकिन यहां आकर सीआरपीएफ की तैनाती देखकर वो डर गायब हो गया। लोग बेखौफ होकर घूम रहे हैं।
एक नई उम्मीद की सुबह
पहलगाम की इस कहानी में सिर्फ गम नहीं है। इसमें बहादुरी और भाईचारे की मिसाल भी है। आदिल का बलिदान और नजाकत की हिम्मत यह बताती है कि आतंक कभी जीत नहीं सकता। कश्मीर के लोग चाहते हैं कि फिर से वही पुरानी चहल-पहल लौटे। वे चाहते हैं कि दुनिया देखे कि कश्मीर का दिल आज भी उतना ही बड़ा है।
शाम ढलते ही पहाड़ों पर अंधेरा उतर आता है। लेकिन पहलगाम की गलियों में उम्मीद की रोशनी बाकी है। जन्नतें फिर से आबाद होंगी। क्योंकि जहां आदिल जैसे शहीद और नजाकत जैसे जांबाज हों, वहां नफरत की हार तय है। पहलगाम खड़ा है, अपने सैलानियों के इंतजार में। बाहें फैलाकर और दिल खोलकर।

