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अदबी महफिल: बाराबंकी में शायरी की गूँज, तरही मुशायरे में बिखरे उर्दू के अनमोल रत्न

शायरी की सरजमीं बाराबंकी के सआदतगंज में एक बार फिर उर्दू अदब की रिवायत ने करवट ली है। यहाँ की मशहूर और सक्रिय साहित्यिक संस्था “बज़्मे-वाने-ग़ज़ल” की जानिब से एक अज़ीमुश्शान (भव्य) मासिक तरही मुशायरे का आयोजन किया गया। मोहम्मदपुर बाहुं स्थित आइडियल इंटर कॉलेज का विशाल हॉल इस शाम शायरी के रसीयाओं और लफ्जों के जादूगरों से खचाखच भरा था।

साहित्यिक सितारों का संगम

मुशायरे की सदारत जाने-माने शायर क़य्यूम बेहटवी ने की। शाम को और भी खास बनाने के लिए बतौर मुख्य अतिथि असलम सैदनपुरी और सम्मानित अतिथि के रूप में दानिश रामपुरी ने शिरकत की। हास्य-व्यंग्य के माहिर शायर बेढब बाराबंकवी ने अपनी लच्छेदार निज़ामत (संचालन) से पूरे कार्यक्रम की कमान संभाली और महफिल में चार चांद लगा दिए।

कार्यक्रम का आगाज रूहानी अंदाज में हुआ। दानिश रामपुरी ने अपनी खूबसूरत आवाज में नाते-रसूले-पाक पेश कर पूरी फिजा को आध्यात्मिक सुकून से भर दिया। इसके बाद शायरों को गज़ल कहने के लिए एक ‘मिसरा’ (पंक्ति) दिया गया:

“सफ़र को बाँट लेते हम थकन तक़सीम कर लेते”

मिसरे पर शायरों की कलाकारी

इस मिसरे पर बाराबंकी और आसपास से आए शायरों ने अपनी ज़हीन सोच और जज्बातों को पिरोकर एक से बढ़कर एक अशआर पेश किए। मुशायरे के कुछ चुनिंदा शेर जो सुनने वालों की जुबां पर चढ़ गए, वे इस प्रकार हैं:

असलम सैदनपुरी ने एकता और संगठन पर जोर देते हुए कहा: “वक़ार इतना नहीं गिरता ज़माने भर में फिर अपना, अगर मज़बूत हम अपनी कोई तंजीम कर लेते।”

वहीं, दानिश रामपुरी ने रिश्तों में कड़वाहट कम करने का नुस्खा पेश किया: “हमारे और उनके बीच में झगड़ा नहीं होता, अगर हम अपना लहजा थोड़ा सा तरमीम कर लेते।”

पारिवारिक मूल्यों पर राशिद रफ़ीक़ ने मर्मस्पर्शी शेर पढ़ा: “लड़ाई भाइयों में रोज़ फिर घर की नहीं होती, अगर माँ बाप के रहते ये घर तक़सीम कर लेते।”

संस्था के सद्र ज़की तारिक़ बाराबंकी ने सकारात्मक सोच की वकालत करते हुए पढ़ा: “किसी इमकान का दर वा तो रहता दिल के गोशे में, जो मनफ़ी सोच की रफ़्तार हम कुछ धीम कर लेते।”

गूंजी वाह-वाह और दाद की आवाजें

मुशायरे में बेढब बाराबंकवी, मुश्ताक़ बज़्मी, नाज़िश बाराबंकवी, उबैद अज़्मी, सहर अय्यूबी, नईम सिकंदरपुरी, क़मर सिकंदरपुरी, आसिम अक़दस और अबूज़र अंसारी जैसे दिग्गजों ने अपनी गजलों से सामईन (श्रोताओं) का दिल जीत लिया। महफिल में मौजूद मास्टर मोहम्मद वसीम, मोहम्मद क़सीम, हलीम और राशिद अंसारी जैसे प्रबुद्ध जनों ने हर अच्छे शेर पर खुले दिल से दाद दी।

अगली महफिल का ऐलान

मुशायरे के आखिर में संस्था के अध्यक्ष ज़की तारिक़ बाराबंकवी ने सभी का शुक्रिया अदा किया। साथ ही, अगले महीने की 31 मई को होने वाले मुशायरे के लिए नया मिसरा भी जारी किया:

“कैफ़े-जाँ उतरने में देर कितनी लगती है”

इस शानदार आयोजन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि बाराबंकी की मिट्टी में आज भी शायरी और तहजीब की जड़ें बहुत गहरी हैं। यह महफिल सिर्फ शेरो-शायरी की नहीं, बल्कि आपसी मेलजोल और संस्कारों की भी थी।