Muslim World

फ़िलिस्तीन के ‘मंडेला’ मरवान बरगौती: क्यों उनकी रिहाई के नाम से इज़रायल भयभीत है?

रामल्ला, वेस्ट बैंक: मुस्लिम नाउ ब्यूरो की विशेष रिपोर्ट

अमेरिकी और कुछ अरब देशों की मध्यस्थता से हुए हमास के साथ युद्धविराम समझौते के बावजूद, इज़रायल पर एक अनजाना खौफ मंडरा रहा है। सैन्य और खुफिया मामलों में दुनिया का सबसे ताकतवर देश होने का दावा करने वाले इज़रायल की हालत यह है कि उसे हर उस शख्स से डर लगने लगा है जो उसे चुनौती देकर उसके वर्चस्व को खत्म कर सकता है। ऐसे ही लोगों में शुमार हैं फ़िलिस्तीन के सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली नेता मरवान बरगौती

समझौते का मुख्य बिंदु यह था कि हमास इज़रायली बंधकों को रिहा करेगा और बदले में इज़रायल अपनी जेलों में बंद राजनीतिक बंदियों को छोड़ेगा। मगर फ़िलिस्तीनी नेतृत्व के प्रतीक मरवान बरगौती को रिहा करने से इज़रायल ने युद्धविराम के अगले दिन ही इनकार कर दिया, जिसने समझौते के दूसरे बिंदु का स्पष्ट उल्लंघन किया।

रिपोर्टों के अनुसार, इज़रायल गाजा संघर्ष विराम समझौते के तहत होने वाली इज़रायली बंधकों और फ़िलिस्तीनी कैदियों की अदला-बदली में बरगौती को छोड़ने को तैयार नहीं है। इज़रायल ने उन हाई-प्रोफाइल कैदियों को रिहा करने से भी इनकार कर दिया है जिनकी मांग हमास लंबे समय से कर रहा है। हमास के वरिष्ठ अधिकारी मूसा अबू मरजूक ने भी इस बात की पुष्टि की है कि समूह बरगौती और अन्य प्रमुख कैदियों की रिहाई की मांग कर रहा है और मध्यस्थों के साथ बातचीत जारी है।

इज़रायल का यह डर जायज क्यों है? मरवान बरगौती में ऐसी क्या बात है जो इज़रायल को भयभीत करती है कि यह शख्स फीनिक्स चिड़िया की तरह गाजा निवासियों में एक बार फिर इज़रायल के विरोध में नई जान फूंक देगा?


मरवान बरगौती: एक योद्धा से जननायक तक का सफर

मरवान बरगौती (जन्म 6 जून 1959) एक निर्वाचित फ़िलिस्तीनी विधायक और राजनीतिक नेता हैं जो इज़रायल द्वारा कैद किए जाने से पहले से ही दो-राज्य समाधान के प्रबल समर्थक रहे हैं। उन्हें व्यापक रूप से ‘फ़िलिस्तीनी मंडेला’ कहा जाता है, क्योंकि फ़िलिस्तीनी जनता उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखती है जो विभाजनकारी राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्र को एकजुट कर सकते हैं और इज़रायल के साथ समझौता वार्ता कर सकते हैं।

प्रारंभिक जीवन और राजनीतिक दीक्षा

बरगौती का जन्म कोबर, वेस्ट बैंक में हुआ था। 1967 में, जब वह केवल सात साल के थे, इज़रायल ने छह-दिवसीय युद्ध के दौरान वेस्ट बैंक पर कब्ज़ा कर लिया। इस कब्ज़े के क्रूर अनुभवों ने उन्हें कम उम्र में ही राजनीति की ओर धकेल दिया।

  • राजनीतिक शुरुआत: 15 साल की उम्र में वह फतह आंदोलन में शामिल हो गए और वेस्ट बैंक में फतह यूथ मूवमेंट (शबीबा) के सह-संस्थापक बने।
  • जेल और शिक्षा: उन्हें पहली बार 15 साल की उम्र में कैद किया गया। 18 साल की उम्र में फिर से कैद होने पर, उन्होंने अपनी माध्यमिक शिक्षा जेल में पूरी की और वहाँ हिब्रू भाषा में पारंगत हो गए।
  • ओस्लो के बाद की भूमिका: 1994 में ओस्लो समझौते के परिणामस्वरूप निर्वासन से लौटने के बाद, उन्होंने फतह की पुरानी और युवा पीढ़ियों के बीच सेतु का काम किया। 1996 में वह फ़िलिस्तीनी विधान परिषद के लिए चुने गए।

शांति समर्थक से इंतिफ़ादा के नेता तक

ओस्लो प्रक्रिया के समर्थक होने के बावजूद, 1990 के दशक के अंत तक, इज़रायल द्वारा एक स्वतंत्र राज्य की दिशा में प्रगति न करने से बरगौती निराश हो गए।

  • दूसरे इंतिफ़ादा का नेतृत्व: सितंबर 2000 में दूसरा इंतिफ़ादा शुरू होने पर, बरगौती प्रदर्शनों के प्रमुख नेता और तंजीम (फतह के युवा सशस्त्र कार्यकर्ताओं का समूह) के नेता बन गए। उन्होंने स्वयं को “एक राजनेता, सैन्य आदमी नहीं” बताया, लेकिन वेस्ट बैंक और गाजा से इज़रायल को बाहर निकालने के लिए सशस्त्र प्रतिरोध का समर्थन किया।
  • अंतर स्पष्टता: बरगौती ने हमेशा वेस्ट बैंक और गाजा में इज़रायली सैनिकों और बसने वालों को निशाना बनाने का आह्वान किया, लेकिन इज़रायल के अंदर नागरिकों पर हमलों की निंदा की, जो उन्हें हमास जैसे समूहों से अलग करता था।

गिरफ्तारी, आजीवन कारावास और विवादित मुकदमा

इज़रायल बरगौती पर इस दौरान अल-अक्सा शहीद ब्रिगेड के सह-संस्थापक और नेता होने का आरोप लगाता है, जिसका उन्होंने खंडन किया। इज़रायल ने 2001 में उनकी हत्या का असफल प्रयास भी किया।

  • गिरफ्तारी और आरोप: उन्हें 15 अप्रैल 2002 को इज़रायली सैनिकों द्वारा पकड़ा गया। उन पर इज़रायल में हुए हमलों में पांच लोगों की मौत के लिए हत्या और हत्या के प्रयास के 26 आरोप लगाए गए।
  • दोषसिद्धि और सज़ा: 2004 में, उन्हें हत्या के पांच मामलों में दोषी पाया गया और पांच संचयी आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई, साथ ही अतिरिक्त 40 साल की कैद भी। इज़रायल उन्हें आतंकवादी मानता है।
  • मुकदमे की आलोचना: बरगौती ने मुकदमे को अवैध और नाजायज बताते हुए बचाव पेश करने से इनकार कर दिया। अंतर-संसदीय संघ ने अपनी रिपोर्ट में उनके मुकदमे की निष्पक्षता पर सवाल उठाया और यातना के आरोपों को नज़रअंदाज़ करने, तथा साक्ष्य की गुणवत्ता पर गंभीर चिंता व्यक्त की।

जेल से जारी राजनीतिक वर्चस्व

अपनी कैद के बावजूद, मरवान बरगौती फ़िलिस्तीनी राजनीति में सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बने हुए हैं।

  • जनमत में शीर्ष स्थान: वह लगातार जनमत सर्वेक्षणों में फ़िलिस्तीनी राष्ट्रपति पद के लिए सबसे लोकप्रिय उम्मीदवार बने हुए हैं, जो वर्तमान राष्ट्रपति महमूद अब्बास और हमास के नेताओं दोनों से आगे हैं।
  • एकजुटता का प्रतीक: उन्हें इज़रायल-फ़िलिस्तीन शांति प्रक्रिया के समर्थक प्रमुख हस्तियों द्वारा फ़िलिस्तीनी एकता और समझौता वार्ता के लिए सबसे सक्षम नेता माना जाता है।
  • जेल से सक्रियता: उन्होंने 2006 में फ़िलिस्तीनी कैदियों के दस्तावेज़ का मसौदा तैयार किया, जिसमें दो-राज्य समाधान का राजनीतिक मार्ग प्रस्तावित किया गया था और जिसे हमास का भी समर्थन मिला था। 2017 में, उन्होंने भूख हड़ताल का नेतृत्व किया जिसके कारण कैदियों के मुलाकात अधिकारों में वृद्धि हुई।
  • स्वास्थ्य चिंताएं: अक्टूबर 2023 से, उन्हें परिवार से मिलने से मना कर दिया गया है और उनके वकील के अनुसार, उन्हें कई बार पीटा गया है, जिससे उनके स्वास्थ्य को स्थायी क्षति पहुंची है।

इज़रायल को डर है कि बरगौती की रिहाई से फ़िलिस्तीनी जनता को एक ऐसा करिश्माई, अनुभवी और एकजुट नेता मिल जाएगा जो राजनीतिक रूप से फतह और हमास के बीच की खाई को पाट सकता है। जेल में उनकी अथाह लोकप्रियता और बाहर निकलने पर उनके संभावित राजनीतिक प्रभाव के कारण ही इज़रायल उन्हें अपने लिए सबसे बड़ा रणनीतिक खतरा मानता है, और इसलिए उनकी रिहाई का कड़ा विरोध कर रहा है।