Culture

रघु राय को ताजमहल कभी नहीं भूलेगा

दुनिया ताजमहल को मोहब्बत की निशानी कहती है, लेकिन कुछ लोग उसे सिर्फ इमारत नहीं, एहसास की तरह देखते हैं। भारत के महान फोटोग्राफर रघु राय ऐसे ही लोगों में थे। उनके लिए ताजमहल संगमरमर का मकबरा नहीं था, बल्कि सांस लेती हुई एक जीवित रचना था। अब जब 83 वर्ष की उम्र में कैंसर के कारण रघु राय इस दुनिया से विदा हो गए हैं, तो उनके साथ ताजमहल को देखने वाली एक अनोखी नजर भी चली गई है।

रघु राय के निधन पर देश और दुनिया उन्हें भोपाल गैस त्रासदी की तस्वीरों, मदर टेरेसा के संवेदनशील चित्रों, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद के दस्तावेजी काम और भारत की आत्मा को कैमरे में कैद करने वाले कलाकार के रूप में याद कर रही है। मगर आगरा और ताजमहल उन्हें कुछ और वजह से याद रखेंगे। यहां उन्होंने पत्थरों में धड़कन ढूंढी थी।

ताजमहल को करोड़ों लोगों ने देखा है। लाखों ने उसकी तस्वीरें ली हैं। लेकिन रघु राय ने उसे जिस तरह देखा, वह विरला था। उन्होंने सिर्फ सामने खड़े स्मारक की फोटो नहीं ली। उन्होंने ताज के आसपास की हवा, सुबह की नमी, यमुना का सन्नाटा, धुंध की परत, मजदूर के चेहरे, पर्यटक की आंखें और इंतजार करती रोशनी को भी तस्वीर का हिस्सा बनाया।

सत्तर और अस्सी के दशक में रघु राय ने ताजमहल पर काम शुरू किया। उस समय फोटोग्राफी आज जैसी आसान नहीं थी। हर फ्रेम सोचकर लिया जाता था। प्रकाश, मौसम और क्षण की प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। रघु राय घंटों खड़े रहते थे। कभी सुबह की पहली किरण का इंतजार करते, कभी शाम के उतरते रंगों का। इसी धैर्य ने उनकी तस्वीरों को असाधारण बनाया।

उनकी चर्चित फोटो श्रृंखला ‘द ताज’ ने कला जगत का ध्यान खींचा। बाद में उनकी पुस्तक ‘ताज महल’ प्रकाशित हुई। यह सिर्फ फोटो बुक नहीं थी। यह एक कलाकार और एक स्मारक के बीच संवाद जैसा काम था। इस पुस्तक की कीमत हजारों रुपये तक पहुंची, लेकिन उसके असली मूल्य को पैसे में नहीं आंका जा सकता। उसमें ताजमहल का वह रूप था जो आम आंखों से छूट जाता है।

उनकी एक मशहूर तस्वीर में बैलगाड़ी के पीछे ताजमहल दिखाई देता है। यह सिर्फ दृश्य नहीं, भारत का सांस्कृतिक संगम है। एक ओर शाश्वत स्मारक, दूसरी ओर साधारण जीवन। एक दूसरी तस्वीर में घने कोहरे से झांकता ताज है। मानो कोई सपना धीरे धीरे आकार ले रहा हो। कई तस्वीरों में उन्होंने गुंबदों, मेहराबों और जालियों की बारीकियों को इस तरह दिखाया कि देखने वाला स्थापत्य की भाषा समझने लगे।

प्रख्यात लेखक निर्मल घोष ने रघु राय के निधन पर लिखा कि ताजमहल की उनकी तस्वीरों ने उन पर गहरी छाप छोड़ी थी और वे उन्हें कभी नहीं भूले। यह टिप्पणी सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं, उस असर की गवाही है जो रघु राय के काम ने दुनिया भर के संवेदनशील दर्शकों पर छोड़ा।

रघु राय का कैमरा सिर्फ सुंदरता नहीं खोजता था। वह अर्थ खोजता था। इसलिए उनकी तस्वीरों में ताजमहल अकेला नहीं दिखता। उसके साथ लोग दिखते हैं। प्रेमी जोड़े, मजदूर, बच्चे, पर्यटक, साधु, धुंध, पक्षी, बारिश, धूप और समय दिखता है। उन्होंने ताजमहल को इतिहास की चीज नहीं रहने दिया। उसे वर्तमान में खड़ा किया।

आगरा से उनका रिश्ता बेहद आत्मीय था। ताज लिटरेचर फेस्टिवल में जब वे आए, तो लोगों ने उन्हें सिर्फ बड़े कलाकार की तरह नहीं, अपने शहर के पुराने दोस्त की तरह देखा। आयोजकों के मुताबिक वे बेहद सहज थे। बातचीत में गर्मजोशी थी। जूनियर फोटोग्राफरों से खुलकर मिलते थे। सीखने वालों को समय देते थे। उनके पास अनुभव का पहाड़ था, लेकिन व्यवहार में कोई दूरी नहीं थी।

एक बार उनसे पूछा गया कि उन्हें दुनिया कैसी दिखती है। उन्होंने मुस्कराकर कहा, मुझे हर चीज कैमरे से देखना पसंद है। अगर भगवान भी सामने आ जाएं तो मैं उन्हें भी पहले कैमरे से ही देखूंगा। यह वाक्य मजाक भर नहीं था। यह उनके जीवन दर्शन का बयान था। कैमरा उनके लिए मशीन नहीं, देखने का माध्यम था।

रघु राय ताजमहल से प्रेम करते थे, इसलिए उसकी बेइज्जती या उपेक्षा उन्हें स्वीकार नहीं थी। वर्ष 2013 में जब एक राजनीतिक बयान में ताजमहल को सरकारी पैसे की बर्बादी कहा गया, तब रघु राय ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने कहा था कि ऐसा कहने वालों को कुछ दिन ताजमहल के भीतर बांध देना चाहिए, ताकि वे उसकी वास्तुकला और सुंदरता को महसूस कर सकें। उनका यह कथन बताता है कि वे ताज को सिर्फ धरोहर नहीं, सभ्यता की उपलब्धि मानते थे।

उनकी नजर में ताजमहल पर्यटन स्थल भर नहीं था। वह भारत की आत्मा का हिस्सा था। शायद इसी कारण उनकी तस्वीरों में ताजमहल कभी पोस्टकार्ड जैसा सपाट नहीं लगता। वह जीवित दिखाई देता है। कभी गर्वीला, कभी उदास, कभी रहस्यमय, कभी प्रेम में डूबा।

पिछले वर्ष अक्टूबर में उन्हें अपनी पुस्तक ‘लॉर्ड्स ऑफ गिर’ के कार्यक्रम में आगरा आना था। स्वास्थ्य कारणों से वे नहीं आ सके। शहर को उम्मीद थी कि वे फिर आएंगे। कैमरा उठाएंगे। किसी नई सुबह में ताजमहल को फिर नए अंदाज में दुनिया के सामने रखेंगे। मगर अब यह इंतजार अधूरा रह गया।

रघु राय का जाना भारतीय फोटोग्राफी के एक युग का अंत है। उन्होंने कैमरे को खबर से आगे कला बनाया। कला को भावना से जोड़ा। भावना को समाज से जोड़ा। उनकी तस्वीरें सिर्फ फ्रेम नहीं, समय के दस्तावेज हैं।

ताजमहल सदियों तक रहेगा। पर्यटक आते रहेंगे। नई तस्वीरें बनती रहेंगी। मोबाइल कैमरे हर दिन हजारों छवियां दर्ज करेंगे। मगर कुछ तस्वीरें ऐसी होती हैं जिनके बाद विषय बदल जाता है। रघु राय ने ताजमहल के साथ यही किया। उन्होंने उसे फिर से खोजा। उसे फिर से समझाया। उसे फिर से प्रेम करना सिखाया।

आज जब वे नहीं हैं, तब भी ताजमहल की सुबहों में उनकी नजर मौजूद है। धुंध में उनका धैर्य है। रोशनी में उनका स्पर्श है। संगमरमर पर उनकी संवेदना है।

रघु राय चले गए हैं। लेकिन ताजमहल उन्हें कभी नहीं भूलेगा।

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