भीषण गर्मी में राजौरी के जंगल धधके, बढ़ी चिंता
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, राजौरी
जम्मू कश्मीर के राजौरी जिले में भीषण गर्मी और लंबे समय से बारिश नहीं होने का असर अब जंगलों पर साफ दिखाई देने लगा है। बुधवार को जिले के कई वन क्षेत्रों में अचानक आग भड़क उठी। देखते ही देखते आग ने बड़े इलाके को अपनी चपेट में ले लिया। कई स्थानों से उठता धुआं दूर तक दिखाई देता रहा। आग की खबर मिलते ही वन विभाग, स्थानीय प्रशासन और अन्य एजेंसियों की टीमें मौके पर पहुंच गईं और आग बुझाने के प्रयास शुरू कर दिए गए।
वन अधिकारियों के अनुसार राजौरी जिले के अलग अलग वन क्षेत्रों में आग लगने की घटनाएं सामने आई हैं। शुरुआती जांच में माना जा रहा है कि लगातार बढ़ते तापमान, लू और लंबे सूखे मौसम ने जंगलों को बेहद संवेदनशील बना दिया है। सूखी घास, झाड़ियां और पत्तियां आग फैलने का बड़ा कारण बन रही हैं।
गर्मी और सूखे ने बढ़ाया खतरा
राजौरी सहित जम्मू संभाग के कई इलाकों में पिछले कुछ सप्ताह से तापमान सामान्य से अधिक दर्ज किया जा रहा है। बारिश नहीं होने के कारण जंगलों की नमी लगभग समाप्त हो चुकी है। ऐसे हालात में छोटी सी चिंगारी भी बड़ी आग का रूप ले सकती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस वर्ष गर्मी का असर पिछले वर्षों की तुलना में अधिक महसूस किया जा रहा है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में जल स्रोत भी प्रभावित हुए हैं। जंगलों में सूखापन लगातार बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और मौसम के बदलते पैटर्न का असर अब पहाड़ी क्षेत्रों में भी दिखाई देने लगा है। यही कारण है कि जंगलों में आग लगने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
पिछले 12 सप्ताह में 45 घटनाएं
राजौरी वन मंडल के अधिकारियों के अनुसार यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले 12 सप्ताह के दौरान जिले में जंगलों में आग लगने की लगभग 45 घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं।
इन घटनाओं में राजौरी और नौशेरा वन मंडल दोनों शामिल हैं। इससे स्पष्ट है कि समस्या केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे जिले के लिए चुनौती बन चुकी है।
वन विभाग के पश्चिम सर्किल के संरक्षक सतपाल ने हाल ही में बताया था कि आग की घटनाओं में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। हालांकि कुछ दिन पहले हुई हल्की बारिश के बाद अधिकारियों को उम्मीद थी कि स्थिति में सुधार आएगा। लेकिन ताजा घटनाओं ने फिर चिंता बढ़ा दी है।
कालाकोट क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित
राजौरी वन मंडल के कालाकोट तहसील स्थित सियालसुई खादर वन क्षेत्र में सबसे अधिक नुकसान की सूचना है। यहां जंगल का बड़ा हिस्सा आग की चपेट में आ चुका है।
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार आग तेजी से फैली और कई स्थानों पर पेड़ों के नीचे जमा सूखी वनस्पति जलकर राख हो गई। कुछ क्षेत्रों में आग को नियंत्रित करने के लिए कर्मचारियों को घंटों तक कड़ी मशक्कत करनी पड़ी।
वन अधिकारियों का कहना है कि आग को घने जंगलों तक पहुंचने से रोकना सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
वन्यजीवों पर गंभीर असर
जंगलों में लगने वाली आग केवल पेड़ों को नुकसान नहीं पहुंचाती। इसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी आग से पक्षियों के घोंसले नष्ट हो जाते हैं। छोटे जानवरों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचने का मौका नहीं मिल पाता। सरीसृप और अन्य वन्यजीव भी प्रभावित होते हैं।
सतही आग होने के बावजूद जैव विविधता को भारी नुकसान पहुंच सकता है। यही कारण है कि वन विभाग इन घटनाओं को गंभीरता से ले रहा है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते। वे जल संरक्षण, जैव विविधता और जलवायु संतुलन के महत्वपूर्ण केंद्र होते हैं। इसलिए हर आग पूरे पर्यावरण के लिए खतरा बन जाती है।
आग बुझाने में जुटीं कई एजेंसियां
आग पर काबू पाने के लिए वन विभाग की टीमों के साथ वन सुरक्षा बल, सामाजिक वानिकी विभाग और स्थानीय स्वयंसेवकों को भी लगाया गया है।
कई स्थानों पर कर्मचारियों ने पैदल पहुंचकर आग बुझाने का प्रयास किया। पहाड़ी इलाकों में मशीनों का इस्तेमाल सीमित होने के कारण मानव संसाधन पर अधिक निर्भरता रहती है।
स्थानीय ग्रामीण भी आग रोकने में प्रशासन की मदद कर रहे हैं। कई गांवों के लोगों ने स्वेच्छा से अभियान में भाग लिया है।
अधिकारियों का कहना है कि सामुदायिक सहयोग के बिना जंगलों को बचाना संभव नहीं है।
क्यों बढ़ रही हैं जंगल की आग की घटनाएं
पर्यावरण विशेषज्ञ कई कारण गिनाते हैं।
बढ़ता तापमान।
कम होती वर्षा।
सूखी वनस्पति का जमाव।
मानवीय लापरवाही।
जलवायु परिवर्तन।
कई बार पर्यटक या स्थानीय लोग अनजाने में जलती हुई वस्तुएं छोड़ देते हैं जिससे आग फैल जाती है। कुछ मामलों में कृषि गतिविधियों के दौरान भी आग जंगल तक पहुंच जाती है।
इसी कारण वन विभाग लगातार जागरूकता अभियान चला रहा है।
जनता से की गई विशेष अपील
वन विभाग ने लोगों से सहयोग की अपील की है। अधिकारियों का कहना है कि जंगलों में आग की रोकथाम केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है।
लोगों से कहा गया है कि जंगलों में आग जलाने से बचें। जलती हुई बीड़ी, सिगरेट या अन्य सामग्री खुले में न फेंकें। किसी भी संदिग्ध घटना की तुरंत सूचना वन विभाग को दें।
सतपाल ने कहा कि जंगल हमारी साझा प्राकृतिक संपत्ति हैं। इन्हें सुरक्षित रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।
जलवायु परिवर्तन का बढ़ता असर
विशेषज्ञों का मानना है कि राजौरी की घटनाएं केवल स्थानीय समस्या नहीं हैं। दुनिया भर में जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ रही हैं।
भारत के कई राज्यों में इस वर्ष वनाग्नि की घटनाओं में वृद्धि दर्ज की गई है। हिमालयी क्षेत्रों में भी खतरा बढ़ रहा है।
पर्यावरण वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
भविष्य की रणनीति पर चर्चा
वन विभाग ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की थी। इसमें आग लगने की स्थिति में संसाधनों की त्वरित उपलब्धता और बेहतर संचार व्यवस्था पर चर्चा की गई।
अधिकारियों का लक्ष्य यह है कि आग की शुरुआती अवस्था में ही उसे नियंत्रित कर लिया जाए। क्योंकि शुरुआती कुछ घंटे सबसे महत्वपूर्ण होते हैं।
इसके लिए स्थानीय समुदायों को भी प्रशिक्षण देने की योजना पर विचार किया जा रहा है।
प्रकृति की रक्षा सबसे बड़ी जरूरत
राजौरी के जंगलों में लगी ताजा आग ने एक बार फिर चेतावनी दी है कि प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा को लेकर अधिक सतर्क होने की आवश्यकता है।
वन केवल पर्यावरण की सुंदरता नहीं बढ़ाते बल्कि लाखों लोगों की आजीविका, जल स्रोतों और जैव विविधता का आधार भी हैं।
फिलहाल प्रशासन आग पर नियंत्रण पाने में जुटा हुआ है। लेकिन यह घटना याद दिलाती है कि जंगलों को बचाने के लिए सरकार, स्थानीय समुदाय और आम नागरिकों को मिलकर काम करना होगा। तभी आने वाली पीढ़ियों के लिए इस हरियाली को सुरक्षित रखा जा सकेगा।

