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कश्मीर में फिर खिला ‘लाल सोना’: गासू खींबर में स्ट्रॉबेरी की कटाई शुरू, उम्मीदें और चुनौतियाँ भी

मुस्लिम नाउ ब्यूरो,श्रीनगर


कश्मीर की वादियों में जब बर्फ पिघलती है और घाटी अपनी सर्द नींद से जागती है, तब सबसे पहले जो फल ज़मीन से झांकता है, वह है स्ट्रॉबेरी — जिसे यहां ‘लाल सोना’ भी कहा जाता है। श्रीनगर के बाहरी इलाके में बसे गासू खींबर गांव में इन दिनों खेतों में चहल-पहल है, टोकरी में भरते लाल-लाल रसीले फल, खेतों में काम करतीं महिलाएं, और बच्चों की चहकती आवाज़ें… यह दृश्य बताता है कि कश्मीर में बागवानी मौसम की शुरुआत हो चुकी है।


गासू खींबर: स्ट्रॉबेरी का गढ़

गासू खींबर वह जगह है जिसे आज कश्मीर का स्ट्रॉबेरी हब माना जाता है। यह इलाका करीब 1000 किसानों का घर है, जो अपनी रोज़ी-रोटी इसी खेती पर निर्भर करते हैं। यहीं से हर दिन लगभग 1,000 ट्रे (करीब 2,000 किलो) स्ट्रॉबेरी बाजारों तक पहुंचाई जाती है। पिछले 15 वर्षों में यहां स्ट्रॉबेरी की खेती ने तेज़ी से विस्तार पाया है, और अब यह इलाका केवल श्रीनगर ही नहीं, बल्कि समूचे कश्मीर में अपनी खास पहचान बना चुका है।


कटाई का मौसम: केवल 15 दिन, मेहनत पूरे साल की

स्ट्रॉबेरी की फसल घाटी में मई के मध्य से जून के पहले सप्ताह तक चलती है। इस दौरान हर शाम किसान फल तोड़ते हैं और अगली सुबह उन्हें परिमपोरा की थोक मंडी में बेचने निकलते हैं। इस फसल का समय छोटा होता है, लेकिन इससे मिलने वाली आमदनी कई परिवारों के पूरे साल के बजट को संतुलित करती है।


खेती में महिलाओं और बच्चों की भागीदारी

इस क्षेत्र में स्ट्रॉबेरी की खेती अब केवल पुरुषों तक सीमित नहीं रही। महिलाएं और बच्चे भी खेतों में फलों की तुड़ाई, छंटाई और पैकिंग में हाथ बंटाते हैं। खेतों में काम कर रही एक स्थानीय महिला कहती हैं, “यह फसल हमारे लिए केवल आमदनी नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक मेहनत और पहचान है।”


मौसम की मार: इस बार फसल पर संकट के बादल

हालांकि इस साल की फसल को मौसम की अनियमितता ने काफी प्रभावित किया है। अप्रैल में हुई भारी बारिश और मई की शुरुआत में अचानक पड़ी तेज़ गर्मी ने कई खेतों की फसल को समय से पहले पकने और सड़ने पर मजबूर कर दिया।

स्थानीय किसान मंज़ूर अहमद बताते हैं, “करीब 30 प्रतिशत फसल बारिश और तेज़ धूप की वजह से बर्बाद हो गई। कई फल समय से पहले ही खराब हो गए और मंडी तक नहीं पहुंच पाए।”


कोल्ड स्टोरेज की कमी बनी किसानों की सबसे बड़ी चिंता

स्ट्रॉबेरी एक अत्यधिक नाजुक फल है, जो बहुत जल्दी खराब हो जाता है। गासू में कोल्ड स्टोरेज जैसी आधुनिक भंडारण सुविधाओं का अभाव किसानों की मेहनत को बर्बाद कर रहा है। यदि समय रहते फल मंडी नहीं पहुंचते, तो कई किलो स्ट्रॉबेरी खेत में ही सड़ जाती है या रास्ते में खराब हो जाती है।

किसानों का कहना है कि अगर सरकार कोल्ड स्टोरेज यूनिट्स, फ्रेट सपोर्ट, और लॉजिस्टिक इंफ्रास्ट्रक्चर की व्यवस्था करे, तो फसल का नुकसान काफी हद तक कम किया जा सकता है।


गासू की स्ट्रॉबेरी क्यों है सबसे अलग?

हालांकि उत्तर कश्मीर के टंगमर्ग और दक्षिण कश्मीर के कुछ इलाकों में भी स्ट्रॉबेरी की खेती होती है, लेकिन गासू खींबर की स्ट्रॉबेरी को खास माना जाता है। स्थानीय किसानों के अनुसार, यहां की मिट्टी और जलवायु इस फल को अधिक रसदार, बड़े आकार वाला, और बेहतर स्वाद वाला बनाती है।


क्या कहते हैं स्थानीय किसान?

हिलाल भट्ट, एक युवा किसान कहते हैं, “हमारा सपना है कि गासू की स्ट्रॉबेरी देशभर में एक ब्रांड बने। लेकिन उसके लिए सरकार और मार्केटिंग एजेंसियों की मदद जरूरी है।”


आशा और असमंजस के बीच फसल का मौसम

फिलहाल, गासू खींबर के खेतों में हलचल है, उम्मीदें हैं, और साथ ही अनिश्चितताएं भी। किसानों की निगाहें मंडियों पर हैं और दिल में दुआ है कि इस साल की मेहनत ज़ाया न जाए। एक ओर लालिमा से भरे खेत उनकी उम्मीदों का रंग बिखेरते हैं, वहीं दूसरी ओर मौसम और भंडारण की कमजोर कड़ी चिंता का कारण बनी हुई है।


  • गासू के खेतों में स्ट्रॉबेरी तोड़ते किसान
  • खेतों में काम कर रही महिलाएं
  • ताजे फलों से भरी टोकरियां
  • बच्चों की मदद से चल रही पैकिंग प्रक्रिया
  • और मंडी की ओर जाते किसान

निष्कर्ष: लाल सोने को चाहिए ठोस सहारा

कश्मीर में स्ट्रॉबेरी न केवल एक फल है, बल्कि संघर्ष, मेहनत और मौसम के साथ तालमेल की जीवंत मिसाल है। यह घाटी की पहली फल फसल है, जो न केवल बाजार में मिठास घोलती है, बल्कि हजारों परिवारों के जीवन में रोज़गार और सम्मान भी लाती है।

अब ज़रूरत है कि इस मेहनत को संरक्षित रखने के लिए सरकार और निजी संस्थान मिलकर कोल्ड चेन इन्फ्रास्ट्रक्चर और ब्रांडिंग सपोर्ट जैसे कदम उठाएं, ताकि कश्मीर की स्ट्रॉबेरी सिर्फ स्थानीय मंडियों तक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बना सके।