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जीएसटी में कटौती से कश्मीरी हस्तशिल्प में नई जान, निर्यात संकट के बीच जगी उम्मीद

मुस्लिम नाउ ब्यूरो,श्रीनगर

कश्मीर की पहचान बने हस्तशिल्प उद्योग पर पिछले कई सालों से संकट के बादल मंडरा रहे थे। कभी करोड़ों के निर्यात का गौरवशाली इतिहास रखने वाला यह क्षेत्र अब मशीन से बने नकली उत्पादों और वैश्विक बाज़ार की मंदी से जूझ रहा है। ऐसे में जीएसटी काउंसिल द्वारा हस्तशिल्प पर कर की दर को 12 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत करना कारीगरों और व्यापारियों के लिए संजीवनी की तरह साबित हो रहा है।

राहत की किरण

घाटी के 3.71 लाख से अधिक कारीगरों ने इस फैसले को “लाइफलाइन” बताया है। दरअसल, सीधे तौर पर कारीगर जीएसटी का भुगतान नहीं करते थे, लेकिन व्यापारी और निर्यातक जब हस्तशिल्प खरीदते थे, तो उन्हें 12 प्रतिशत कर अग्रिम जमा करना पड़ता था। यह पूंजी तब तक फंसी रहती थी, जब तक माल बिक न जाए। इसका सीधा असर कारीगरों पर पड़ता था क्योंकि व्यापारी थोक में खरीदने से बचते और भुगतान रोक देते थे।

अब कर घटकर 5 प्रतिशत होने से व्यापारियों को राहत मिली है। तरलता बढ़ेगी, खरीद बढ़ेगी और कारीगरों को समय पर मेहनताना मिलेगा।

कारीगरों की आवाज़

बुडगाम के कालीन बुनकर गुलाम रसूल कहते हैं – “पहले व्यापारी 12 प्रतिशत जीएसटी के बोझ की वजह से हमसे कम माल खरीदते और भुगतान टालते थे। अब उम्मीद है कि कालीन और शॉल की मांग बढ़ेगी और हमें मेहनत का फल समय पर मिलेगा। यह सिर्फ टैक्स की बात नहीं, बल्कि हमारे हुनर को सम्मान देने का कदम है।”

पेपियर मैशे कला से जुड़ीं मुहम्मद जाफ़र ने बताया कि उनके काम की मांग साल दर साल गिरती जा रही थी। “बीचौलियों का कहना था कि लागत बहुत ज्यादा है, इसलिए वे हमारा सामान नहीं उठा सकते। अगर कर कटौती से व्यापारियों की खरीद बढ़ती है, तो शायद हमारी कला को नया जीवन मिल जाए।”

गिरते निर्यात की चिंता

आंकड़े बताते हैं कि कश्मीरी हस्तशिल्प का निर्यात लगातार घट रहा है। एक दशक पहले जहाँ यह 1,700 करोड़ रुपये से अधिक था, वहीं पिछले वित्त वर्ष में यह घटकर मात्र 700 करोड़ रुपये पर आ गया। कच्चे माल की बढ़ती कीमतें, आधुनिक विपणन की कमी, वैश्विक आर्थिक मंदी और मशीन से बने नकली उत्पादों की भरमार ने असली कारीगरी को चौपट कर दिया है।

एक श्रीनगर स्थित निर्यातक कहते हैं – “हस्तशिल्प बाज़ार बेहद संवेदनशील है। थोड़ी सी कीमत बढ़ते ही ग्राहक विकल्प तलाशने लगते हैं। 12 प्रतिशत जीएसटी ने हमारे उत्पादों को महंगा बना दिया था। 5 प्रतिशत पर हम प्रतिस्पर्धा में टिक पाएंगे।”

नकली उत्पादों की चुनौती

कारीगरों के लिए सबसे बड़ी समस्या मशीन से बने नकली सामान का बाज़ार में बेचे जाना है। दिल्ली, मुंबई और यहां तक कि दुबई में भी पावरलूम से बने शॉल और कारखाने में बने पेपियर मैशे को असली ‘कश्मीरी’ बताकर बेचा जा रहा है।

अब्दुल हमीद, जो अखरोट की लकड़ी पर नक्काशी करते हैं, कहते हैं – “ग्राहक धोखे में सस्ता मशीन वाला सामान खरीद लेते हैं। इससे न केवल हमारी आय घट रही है, बल्कि कश्मीर की ब्रांड वैल्यू भी बर्बाद हो रही है।”

विशेषज्ञों का कहना है कि असली कश्मीरी उत्पादों को बचाने के लिए जीआई टैगिंग को सख्ती से लागू करना होगा और नकली उत्पाद बेचने वालों पर कड़ी कार्रवाई करनी होगी।

कारोबारियों की राय

कश्मीर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (KCCI) के अध्यक्ष जावेद अहमद टेंगा ने इस फैसले को “समय पर लिया गया ऐतिहासिक कदम” बताया। उन्होंने कहा – “हस्तशिल्प कश्मीर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जो बागवानी के बाद सबसे बड़ा क्षेत्र है। लाखों लोग इससे सीधे-परोक्ष रूप से जुड़े हैं। 12 प्रतिशत कर बिल्कुल अनुचित था, क्योंकि हस्तशिल्प कोई विलासिता की वस्तु नहीं बल्कि गरीब कारीगरों की आजीविका है। इसे 5 प्रतिशत करना सराहनीय है, लेकिन और ठोस कदम भी जरूरी हैं।”

उनके मुताबिक केवल कर कटौती से संकट हल नहीं होगा। विपणन, आसान ऋण सुविधा और नकली सामान की रोकथाम जैसी चुनौतियों का समाधान जरूरी है।

आगे का रास्ता

विशेषज्ञों ने सरकार को तीन स्तरों पर काम करने की सलाह दी है:

  1. ब्रांडिंग और जीआई टैगिंग को सख्ती से लागू करना ताकि असली कश्मीरी उत्पाद की पहचान हो सके।
  2. आसान ऋण योजनाएँ बनाना ताकि कारीगर कच्चे माल और उपकरणों में निवेश कर सकें।
  3. घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में आक्रामक प्रचार अभियान चलाना ताकि कश्मीरी शॉल, कालीन, पेपियर मैशे और अखरोट की नक्काशी को नया बाजार मिले।

उम्मीद का संदेश

फिलहाल घाटी के कारीगर इस राहत को लेकर आशावान हैं। गुलाम रसूल कहते हैं – “सालों से हमें अनदेखा किया गया। आज पहली बार लगा कि कोई हमारी सुध ले रहा है। उम्मीद है यह शुरुआत है और हमारी मेहनत को उसका हक मिलेगा।”

कर कटौती ने घाटी की कारीगरी को एक बार फिर जीवित करने की उम्मीद जगाई है। अब देखना यह होगा कि यह राहत कितनी दूर तक असर दिखाती है और क्या सदियों पुरानी कश्मीरी शिल्प विरासत अपने पूरे वैभव के साथ फिर से दुनिया के बाज़ारों में चमक पाएगी।

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