उबर कैब से एशियाई खेलों तक पहुंचे रोवर सलमान खान
नौशाद अख्तर
कभी परिवार का पेट पालने के लिए दिल्ली की सड़कों पर उबर कैब चलाने वाले सलमान खान आज भारतीय रोइंग टीम का हिस्सा हैं। 18 साल की उम्र में पिता को खोने के बाद उनके सामने परिवार की जिम्मेदारी आ गई थी। चार छोटे भाई बहनों की पढ़ाई और घर का खर्च चलाना उनकी प्राथमिकता बन गया। सेना में भर्ती होने का सपना पीछे छूटता दिखाई दिया। लेकिन कहानी वहीं खत्म नहीं हुई। एक दोस्त की सलाह ने उन्हें फिर कोशिश करने के लिए प्रेरित किया। कुछ महीनों की मेहनत के बाद वह भारतीय सेना में शामिल हुए और यहीं से उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया।
आज 23 वर्षीय भारतीय रोवर सलमान खान एशियन गेम्स 2026 में भारत की उम्मीदों का हिस्सा हैं। आइची नागोया एशियन गेम्स के लिए तैयार भारतीय रोइंग दल में उनकी मौजूदगी उस सफर की कहानी है, जिसकी शुरुआत आर्थिक मुश्किलों और टैक्सी चलाने से हुई थी। सलमान ने हाल में एक विशेष बातचीत में अपने बचपन, परिवार, भारतीय सेना, रोइंग और एशियाई खेलों की तैयारी के बारे में विस्तार से बात की। उनकी कहानी में संघर्ष भी है और लगातार आगे बढ़ते रहने की जिद भी।

सलमान का जन्म उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले के पूरे ढिंगाई यानी खैरहना में हुआ। उनके पिता मोहम्मद कासिम खान हरियाणा के तौरू में ट्रक निर्माण का काम करते थे। सलमान ने अपनी स्कूली शिक्षा हरियाणा में पूरी की। उनकी मां का नाम जबरून निशा है। उनकी पत्नी साहिबा खातून भी उनके जीवन में मजबूत सहारा रही हैं। परिवार में चार भाई और दो बहनें हैं। सबसे बड़े होने के कारण पिता की मौत के बाद घर की जिम्मेदारी सीधे उनके कंधों पर आ गई।
Double power, double glory! 🚣♂️🚣♂️🇮🇳
— Khel Now (@KhelNow) September 23, 2026
Satnam Singh & Salman Khan storm INTO THE FINAL of the Men's Double Sculls! 🔥
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पिता के निधन के समय सलमान केवल 18 साल के थे। छोटे भाई बहन पढ़ रहे थे। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। ऐसे में सेना में भर्ती होने का सपना फिलहाल छोड़ना पड़ा। परिवार चलाने के लिए उन्होंने दिल्ली में दिन रात उबर कैब चलाई। उनके लिए उस समय खेल या करियर से ज्यादा जरूरी परिवार का खर्च उठाना था। यही वह दौर था जिसने उन्हें कम उम्र में जिम्मेदारियों को समझना सिखाया।
फिर एक दिन उनके एक करीबी दोस्त ने उन्हें अपनी लंबाई और शारीरिक बनावट की याद दिलाई। दोस्त ने कहा कि सेना में जाने का सपना अभी खत्म नहीं हुआ है। इस सलाह ने सलमान को फिर से कोशिश करने का हौसला दिया। उन्होंने अपनी टैक्सी दूसरे ड्राइवर को सौंप दी और चार महीने तक भर्ती की तैयारी की। भर्ती रैली, मेडिकल और लिखित परीक्षा पास करने के बाद 25 सितंबर 2018 को उन्होंने बॉम्बे इंजीनियर ग्रुप यानी बीईजी, किरकी, पुणे में प्रवेश लिया।
सलमान को तब शायद अंदाजा भी नहीं था कि सेना में जाना उन्हें एक ऐसे खेल तक पहुंचाएगा, जिसके बारे में उन्होंने पहले कभी गंभीरता से सोचा तक नहीं था। प्रशिक्षण केंद्र में उनकी लंबाई और शारीरिक बनावट देखकर प्रशिक्षकों ने उन्हें रोइंग के लिए चुना। सलमान ने शुरुआत में कई बार मना किया। उन्हें इस खेल के बारे में जानकारी नहीं थी। परिवार की आर्थिक परिस्थितियों के कारण खेल उनके लिए हमेशा दूर की चीज रहा था। लेकिन प्रशिक्षकों ने उनकी क्षमता पहचानी और उन्हें पानी में उतार दिया।
शुरुआत में नाव चलाना उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं था। मगर पहली अंतर केंद्रीय नौका प्रतियोगिता में रजत पदक मिलने के बाद उनका नजरिया बदलने लगा। उन्हें लगा कि मेहनत का परिणाम सामने आ सकता है। वर्ष 2021 उनके करियर का एक अहम पड़ाव बना। एर्गोमीटर के मानक पार करने के बाद उनका चयन पुणे स्थित आर्मी रोइंग नोड के लिए हुआ। देश के बेहतरीन रोवरों के साथ प्रशिक्षण और अनुभवी प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन ने उन्हें यह विश्वास दिया कि रोइंग को वह पेशेवर करियर बना सकते हैं।

इस सफर में परिवार उनका सबसे बड़ा सहारा रहा। सलमान अपनी मां की दुआओं को खास तौर पर याद करते हैं। प्रशिक्षण के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब उनका रोइंग से मन हटने लगा था। वह खेल छोड़ने के बारे में सोचने लगे थे। उस समय प्रशिक्षण अधिकारी मेजर नागेंद्र हुड्डा ने उन्हें संभाला। आर्मी रोइंग नोड के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल रामकृष्णन ने भी उनका हौसला बढ़ाया। बाद में कोचों ने उनकी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें भारतीय राष्ट्रीय टीम में जगह दिलाने में मदद की।
सलमान के लिए असली बदलाव राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने के साथ आया। गुजरात में हुए 36वें राष्ट्रीय खेल 2022 में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद 2023 सीनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप में एकल स्कल्स में ओलंपियन दत्तु भोकानल के खिलाफ स्वर्ण पदक जीतना उनके लिए बड़ा पड़ाव रहा। इस प्रदर्शन ने राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान मजबूत की और उन्हें भारतीय टीम में शामिल होने का अवसर मिला।
वर्ष 2024 में दक्षिण कोरिया में नितिन देओल के साथ एशियाई रोइंग कप में स्वर्ण पदक जीतना सलमान के अंतरराष्ट्रीय करियर की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में रहा। इस प्रदर्शन के बाद उन्हें भारतीय सेना में नायब सूबेदार के पद पर पदोन्नति मिली। 2025 ऑस्ट्रेलियाई रोइंग चैंपियनशिप और 2025 एशियाई रोइंग चैंपियनशिप में रजत पदक ने भी उनके आत्मविश्वास को मजबूत किया।
एशियाई खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करना सलमान के लिए केवल खेल उपलब्धि नहीं है। वह इसे अपने जीवन का बड़ा सम्मान मानते हैं। उनका कहना है कि एक साधारण गांव से निकलकर इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की जर्सी पहनना उनके लिए बहुत मायने रखता है। 2024 में एशियाई रोइंग कप में स्वर्ण पदक के बाद तिरंगा फहरते देखना उनके लिए भावुक क्षण था। अब उनकी नजर एशियाई खेलों पर है।
पुरुषों की क्वाड्रपल स्कल्स स्पर्धा में टीम तालमेल सबसे महत्वपूर्ण होता है। सलमान के मुताबिक चारों रोवरों को बिल्कुल एक लय में काम करना पड़ता है। बलराज पंवार के पास ओलंपिक स्तर का अनुभव है, जबकि सतनाम सिंह, जकार खान और सलमान अपनी ताकत और तकनीकी तालमेल से टीम को आगे बढ़ाते हैं। वे साथ रहते हैं, प्रशिक्षण करते हैं और रेस के वीडियो का अध्ययन करते हैं।
2000 मीटर की रेस में ज्यादा बातचीत की गुंजाइश नहीं होती। टीम के बीच छोटे और स्पष्ट तकनीकी संकेतों के जरिए तालमेल बनाया जाता है। असली समन्वय लंबे अभ्यास से आता है। सलमान बताते हैं कि 22 फरवरी 2026 से शुरू हुए शिविर में टीम ने लगातार इसी तालमेल पर काम किया। लक्ष्य यह रहा कि चारों रोवरों की चाल, मानसिकता और रेस की रणनीति एक जैसी हो जाए।

एशियाई रोइंग चैंपियनशिप का अनुभव भी टीम के लिए महत्वपूर्ण रहा। सलमान के मुताबिक तीसरा 500 मीटर रेस का सबसे कठिन हिस्सा होता है। इस दौरान थकान बढ़ती है और शरीर पर दबाव ज्यादा महसूस होता है। इसलिए प्रशिक्षण में इस हिस्से पर विशेष ध्यान दिया गया। उनका मानना है कि इस चरण में शांत रहना और गति बनाए रखना रेस के परिणाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
सलमान की दिनचर्या भी आसान नहीं है। सुबह पांच बजे से जल प्रशिक्षण शुरू होता है और करीब नौ बजे तक चलता है। इसके बाद नाश्ता, आराम और वीडियो विश्लेषण होता है। सुबह जिम में ताकत और कोर प्रशिक्षण भी किया जाता है। दोपहर के आराम के बाद शाम चार बजे से दूसरा जल सत्र शुरू होता है। इसमें स्टार्ट, स्प्रिंट और रेस गति पर काम किया जाता है। रात करीब साढ़े नौ बजे तक सोने की तैयारी शुरू हो जाती है।
रोइंग में केवल हाथों की ताकत नहीं चाहिए। पैरों की शक्ति, शरीर का संतुलन, कोर की मजबूती और लंबी दूरी तक सहनशक्ति भी उतनी ही जरूरी है। सलमान अपने प्रशिक्षण में पोषण और नींद को भी अहम मानते हैं। उन्होंने बताया कि गहन प्रशिक्षण के दौरान उनका भोजन जई, चावल, शकरकंद, अंडे, चिकन और व्हे प्रोटीन जैसे खाद्य पदार्थों पर आधारित रहता है।
मानसिक मजबूती के सवाल पर सलमान अपनी जिंदगी को ही सबसे बड़ा शिक्षक बताते हैं। 18 साल की उम्र में परिवार की जिम्मेदारी उठाने के बाद उन्हें खेल का दबाव अलग तरह का महसूस होता है। रेस के दिन उनका ध्यान दूसरी लेन पर नहीं, अपनी रणनीति पर रहता है। वह अपनी मेहनत, टीम और ईश्वर पर भरोसा रखने की बात कहते हैं।
अब उनका लक्ष्य साफ है। एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक के लिए पूरी ताकत लगाना। इसके बाद उनकी नजर ओलंपिक पर है। वह विश्व चैंपियनशिप में हिस्सा लेना, ओलंपिक कोटा हासिल करना और भारत के लिए ओलंपिक पदक जीतना चाहते हैं। उनकी इच्छा यह भी है कि उनकी यात्रा उन युवाओं को प्रेरणा दे, जो साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि से आते हैं।
उबर कैब चलाने वाले एक युवा से भारतीय सेना के नायब सूबेदार और अंतरराष्ट्रीय रोवर बनने तक सलमान खान की कहानी कई पड़ावों से गुजरती है। पिता की मौत, परिवार की जिम्मेदारी, दिल्ली की सड़कों पर टैक्सी चलाना, सेना में भर्ती, रोइंग से पहली अनिच्छा और फिर इसी खेल में राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय पदक। अब वही सलमान जापान में भारतीय तिरंगे के लिए उतरने को तैयार हैं। उनके शब्दों में लक्ष्य सिर्फ रेस पूरी करना नहीं है। लक्ष्य अपनी तैयारी को पूरी तरह पानी पर उतारना और भारत के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ देना है।

