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जियाउल हक केस में क्लोजर रिपोर्ट मंजूर, कोर्ट फिर बीच बहस में

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली, लखनऊ

प्रतापगढ़ के कुंडा के तत्कालीन क्षेत्राधिकारी जियाउल हक की हत्या से जुड़े मामले में लखनऊ की विशेष सीबीआई अदालत के हालिया आदेश ने एक बार फिर पुराने जख्म हरे कर दिए हैं। 19 सितंबर 2026 को विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रतिभा सिंह की अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर ली। इसके साथ ही रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया, गुलशन यादव, हरिओम श्रीवास्तव, गुड्डू सिंह और रोहित सिंह के खिलाफ इस मामले में आगे की कार्यवाही समाप्त कर दी गई। अदालत ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर इन आरोपितों के खिलाफ आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाया।

अदालत के इस फैसले के बाद जियाउल हक के परिवार की प्रतिक्रिया सामने आई है। उनके पिता हाजी शमसुल हक ने दुख जताते हुए कहा कि उन्हें लंबे समय से न्याय की उम्मीद थी, लेकिन अब वह उम्मीद टूटती नजर आ रही है। परिवार के लिए यह फैसला केवल एक कानूनी आदेश नहीं है। उनके लिए यह उस बेटे की हत्या से जुड़ा मामला है, जिसे उन्होंने कठिन आर्थिक परिस्थितियों में पढ़ाकर पुलिस अधिकारी बनाया था।

जियाउल हक की हत्या 2 मार्च 2013 को प्रतापगढ़ के बलीपुर गांव में हुई थी। उस समय वह कुंडा के क्षेत्राधिकारी के पद पर तैनात थे। गांव के प्रधान नन्हे सिंह यादव की हत्या के बाद वहां तनाव की स्थिति बनी थी। जियाउल हक पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंचे थे। इसी दौरान उन पर भीड़ ने हमला किया और उनकी मौत हो गई। बाद में मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई।

यह मामला शुरू से ही उत्तर प्रदेश की राजनीति और पुलिस व्यवस्था के लिए बेहद संवेदनशील रहा। जियाउल हक की पत्नी परवीन आजाद ने अपने पति की हत्या के पीछे साजिश का आरोप लगाते हुए रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया समेत कुछ लोगों की भूमिका पर सवाल उठाए थे। उनके आरोपों के बाद मामला लंबे समय तक अदालत और जांच एजेंसियों के बीच चलता रहा।

सीबीआई ने शुरुआत में मामले की जांच की थी। बाद में क्लोजर रिपोर्ट को लेकर विवाद हुआ। परवीन आजाद ने इस रिपोर्ट का विरोध किया। मामला उच्च न्यायालय और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सितंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को राजा भैया की कथित भूमिका की जांच करने का रास्ता साफ किया और आगे की जांच के संबंध में आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को भी अलग रखा था, जिसने निचली अदालत की आगे जांच कराने की प्रक्रिया पर रोक लगाई थी।

इसके बाद सीबीआई ने दोबारा जांच की। जांच पूरी होने के बाद एजेंसी ने दिसंबर 2023 में फिर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की। इसमें कहा गया कि राजा भैया और अन्य नामजद लोगों के खिलाफ अभियोजन चलाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले। यही रिपोर्ट आगे चलकर सितंबर 2026 के अदालत के आदेश का आधार बनी।

विशेष सीबीआई अदालत ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड, क्लोजर रिपोर्ट, विशेषज्ञ राय और दस्तावेजों का अध्ययन करने के बाद नामजद आरोपितों के खिलाफ आगे कार्रवाई के लिए पर्याप्त आधार नहीं मिला। अदालत ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता की ओर से ऐसा दस्तावेजी या मौखिक साक्ष्य सामने नहीं आया, जिसके आधार पर आरोपितों के खिलाफ संज्ञान लिया जा सके। इसी आधार पर क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार की गई और पांचों के खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी गई।

यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि जियाउल हक हत्याकांड में सभी आरोपितों को अदालत ने बरी नहीं किया है। 2024 में इसी हत्या के मामले में दस अन्य लोगों को दोषी ठहराया गया था। 4 अक्टूबर 2024 को विशेष सीबीआई अदालत ने दस लोगों को दोषी करार दिया और 9 अक्टूबर को उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। प्रत्येक पर 19,500 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था।

इन दोषियों में फूलचंद यादव, पवन यादव, मंजीत यादव, घनश्याम सरोज, राम लखन गौतम, छोटेलाल यादव, राम आसरे, मुन्ना लाल पटेल, शिवराम पासी और जगत बहादुर पाल उर्फ बुल्ले पाल शामिल थे। इस मामले में एक अन्य आरोपी को अदालत ने बरी किया था, जबकि एक आरोपी की मुकदमे के दौरान मौत हो गई थी।

यानी सितंबर 2026 का ताजा आदेश उस अलग कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा है जिसमें राजा भैया समेत पांच नामजद लोगों के खिलाफ कथित साजिश या भूमिका की जांच की गई थी। 2024 में जिन दस लोगों को उम्रकैद मिली थी, उनका मामला अलग रहा। इस फर्क को समझना जरूरी है, क्योंकि सोशल मीडिया पर दोनों प्रक्रियाओं को कई बार एक ही तरह से पेश किया जा रहा है।

फैसले के बाद जियाउल हक के पिता की पीड़ा सामने आई। उन्होंने कहा कि उन्होंने गरीबी के दिनों में मेहनत करके अपने बेटे को पढ़ाया था। बेटा पुलिस अधिकारी बना। फिर कुंडा में उसकी हत्या हो गई। परिवार को उम्मीद थी कि अदालत से न्याय मिलेगा। अब पांच नामजद लोगों के खिलाफ कार्यवाही खत्म होने के बाद उन्हें गहरा धक्का लगा है।

जियाउल हक की मां हाजरा खातून ने भी बेटे की मौत के बाद आरोपितों को सजा मिलने की उम्मीद जताई थी। परिवार की निजी स्थिति भी वर्षों से आसान नहीं रही। जियाउल हक की पत्नी परवीन आजाद को बाद में पुलिस विभाग में ओएसडी पद पर नियुक्ति मिली। परिवार के भीतर संपत्ति और एलआईसी से जुड़े विवादों की बात भी सामने आती रही है। यह मामला अब केवल एक आपराधिक मुकदमे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि परिवार के लंबे संघर्ष का हिस्सा बन चुका है।

सोशल मीडिया पर अदालत के आदेश को लेकर अलग अलग प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। कुछ लोगों ने इसे सीबीआई की जांच और अदालत के रिकॉर्ड के आधार पर लिया गया कानूनी फैसला बताया। दूसरी तरफ कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि इतने लंबे समय तक जांच चलने के बाद नामजद आरोपितों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य क्यों नहीं मिले। जियाउल हक के परिवार और उनकी पत्नी की ओर से पहले भी जांच की निष्पक्षता और आगे की कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए गए थे।

इस मामले को लेकर मुस्लिम समाज के कुछ संगठनों और सोशल मीडिया एक्टिविस्टों ने भी चिंता जताई है। उनके अनुसार, एक मुस्लिम पुलिस अधिकारी की हत्या और उसके बाद वर्षों तक चला कानूनी संघर्ष समुदाय के भीतर न्याय व्यवस्था को लेकर चर्चा का विषय बना है। हालांकि, यह कहना कि इस एक फैसले से पूरे मुस्लिम समुदाय का न्यायपालिका पर विश्वास समाप्त हो गया है, एक व्यापक निष्कर्ष होगा। ऐसा निष्कर्ष निकालने के लिए व्यापक और स्वतंत्र जनमत के प्रमाण की जरूरत होगी।

जियाउल हक मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें जांच की कई परतें हैं। पहले स्थानीय स्तर पर कार्रवाई हुई। फिर सीबीआई जांच में मामला गया। क्लोजर रिपोर्ट पर आपत्ति हुई। न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ी। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद दोबारा जांच हुई। और अब विशेष सीबीआई अदालत ने दोबारा दाखिल क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर ली है। करीब 13 साल पुराने इस मामले का यह नया पड़ाव न्यायिक प्रक्रिया की लंबी अवधि को भी सामने लाता है।

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इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम सवाल अब यही है कि आगे परिवार की ओर से क्या कानूनी कदम उठाया जाता है। मौजूदा आदेश के खिलाफ उपलब्ध कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल किया जा सकता है या नहीं, यह संबंधित पक्षों की अगली कार्रवाई और अदालतों के आदेशों पर निर्भर करेगा।

जियाउल हक की मौत को 13 साल से ज्यादा समय बीत चुका है। 2024 में दस लोगों को उम्रकैद की सजा मिल चुकी है। अब सितंबर 2026 में राजा भैया समेत पांच लोगों के खिलाफ कार्यवाही समाप्त हो गई है। इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि मामले की एक महत्वपूर्ण कानूनी कड़ी बंद हुई है, जबकि जियाउल हक हत्याकांड से जुड़ी पूरी न्यायिक कहानी कई अलग प्रक्रियाओं और फैसलों से बनी हुई है।

परिवार के लिए हालांकि कानूनी प्रक्रिया से अलग एक सवाल आज भी उतना ही बड़ा है। वह सवाल है कि 2 मार्च 2013 को ड्यूटी पर गए उनके बेटे की मौत के पीछे पूरी सच्चाई क्या थी। अदालत ने ताजा जांच के आधार पर पांच नामजद लोगों के खिलाफ पर्याप्त आधार नहीं पाया है। दूसरी ओर, 2024 में दस लोगों को हत्या के मामले में दोषी ठहराकर उम्रकैद दी जा चुकी है। यही दोनों तथ्य इस पुराने मामले की जटिलता को समझने के लिए सबसे जरूरी हैं।

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