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जामिया में हाफ़िज़ शिराज़ी की विरासत पर विद्वानों की चर्चा

नई दिल्ली।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के फ़ारसी विभाग ने सोमवार को महान फ़ारसी कवि हाफ़िज़ शिराज़ी की साहित्यिक विरासत को समर्पित एक स्मृति समारोह आयोजित किया। विश्वविद्यालय के ईरानोलॉजी हॉल में हुए इस कार्यक्रम में फ़ारसी साहित्य, सूफियाना विचारधारा, ग़ज़ल की परंपरा और भारत ईरान के सांस्कृतिक संबंधों पर चर्चा हुई। कार्यक्रम का आयोजन नई दिल्ली स्थित इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान के कल्चर हाउस के सहयोग से किया गया।

समारोह में विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों, शिक्षकों और विद्यार्थियों ने भाग लिया। वक्ताओं ने हाफ़िज़ शिराज़ी की शायरी के व्यापक प्रभाव पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि उनकी रचनाएं सदियों बाद भी प्रेम, मानवीय संवेदना, आध्यात्मिकता और जीवन के गहरे सवालों को समझने का अवसर देती हैं।

कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य फ़ारसी साहित्य की समृद्ध परंपरा से नई पीढ़ी को परिचित कराना और भारतीय विश्वविद्यालयों में फ़ारसी भाषा तथा साहित्य के अध्ययन को प्रोत्साहित करना था।

हाफ़िज़ शिराज़ी की शायरी आज भी प्रासंगिक

हाफ़िज़ शिराज़ी फ़ारसी साहित्य के सबसे प्रसिद्ध कवियों में गिने जाते हैं। उनकी ग़ज़लों ने फ़ारसी भाषी दुनिया के साथ भारतीय उपमहाद्वीप की साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपराओं को भी प्रभावित किया है। उनकी कविताओं में प्रेम, विरह, आध्यात्मिक खोज, मानवीय कमजोरियों और सामाजिक रूढ़ियों पर विचार जैसे विषय मिलते हैं।

हाफ़िज़ की रचनाओं की एक खास विशेषता उनका प्रतीकात्मक अंदाज है। उनकी ग़ज़लों में साकी, शराब, महबूब और मयखाने जैसे प्रतीक दिखाई देते हैं। इन प्रतीकों की व्याख्या साहित्यिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से की जाती रही है। यही कारण है कि उनकी शायरी को अलग-अलग समय और सांस्कृतिक संदर्भों में नए अर्थों के साथ पढ़ा जाता है।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में आयोजित स्मृति समारोह में भी हाफ़िज़ की इसी बहुआयामी साहित्यिक विरासत पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने उनकी रचनाओं को केवल प्रेम कविता तक सीमित न मानते हुए उनमें मौजूद मानवीय अनुभवों और विचारों की विविधता पर ध्यान दिलाया।

कुरआन के पाठ और नात शरीफ़ से हुई शुरुआत

समारोह की शुरुआत डॉ. यासिर अब्बास द्वारा पवित्र कुरआन के पाठ से हुई। इसके बाद फ़ारसी विभाग के एमए तृतीय सेमेस्टर के छात्र शम्स ताबिश ने नात शरीफ़ प्रस्तुत की। इन प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम को गरिमापूर्ण वातावरण प्रदान किया।

इसके बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया के फ़ारसी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर मोहसिन अली ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने विशिष्ट अतिथियों, विश्वविद्यालय के अधिकारियों, शिक्षकों, विद्वानों और विद्यार्थियों का स्वागत किया।

अपने संबोधन में प्रोफेसर मोहसिन अली ने हाफ़िज़ शिराज़ी की साहित्यिक विरासत की निरंतर प्रासंगिकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि फ़ारसी साहित्य का अध्ययन विभिन्न संस्कृतियों को समझने और मानवीय मूल्यों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

उन्होंने साहित्यिक परंपराओं के संरक्षण के साथ विद्यार्थियों में बौद्धिक जिज्ञासा पैदा करने की आवश्यकता को भी रेखांकित किया। ऐसे आयोजन विद्यार्थियों को पुस्तकों और पाठ्यक्रमों से आगे बढ़कर साहित्यकारों के विचारों तथा उनके ऐतिहासिक संदर्भों को समझने का अवसर देते हैं।

हाफ़िज़ की ग़ज़लों में प्रेम, प्रतीक और मानवता

जामिया के फ़ारसी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर अब्दुल हलीम ने हाफ़िज़ की शायरी के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने उनकी ग़ज़लों में प्रयुक्त साकी और शराब जैसे प्रतीकों की व्याख्या की। साथ ही प्रेम, नशे और मानवता से जुड़े साहित्यिक अर्थों पर चर्चा की।

फ़ारसी ग़ज़ल की परंपरा में प्रतीकों का विशेष महत्व रहा है। किसी कविता का अर्थ केवल उसके सीधे शब्दार्थ से तय नहीं होता। उसके भीतर ऐतिहासिक अनुभव, सांस्कृतिक संकेत और आध्यात्मिक विचार भी छिपे हो सकते हैं। हाफ़िज़ की शायरी इसी विशेषता के कारण साहित्य के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए निरंतर अध्ययन का विषय बनी हुई है।

प्रोफेसर अब्दुल हलीम के संबोधन ने विद्यार्थियों को यह समझने का अवसर दिया कि किसी महान कवि की रचना को पढ़ते समय उसके शब्दों के साथ उनके व्यापक साहित्यिक संदर्भों को समझना भी जरूरी है।

फ़ारसी विद्वानों के योगदान पर बोले प्रोफेसर इक़्तिदार मोहम्मद ख़ान

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के मानविकी एवं भाषा संकाय के डीन प्रोफेसर इक़्तिदार मोहम्मद ख़ान समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए।

उन्होंने धर्म, साहित्य और इस्लामी अध्ययन के क्षेत्र में फ़ारसी विद्वानों के योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि फ़ारसी परंपरा ने धार्मिक चिंतन, साहित्यिक अभिव्यक्ति और बौद्धिक गतिविधियों को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ारसी भाषा का ऐतिहासिक महत्व भी इसी व्यापक विरासत का हिस्सा है। लंबे समय तक फ़ारसी साहित्य, प्रशासन, इतिहास लेखन और विद्वतापूर्ण संवाद की महत्वपूर्ण भाषा रही। इसके माध्यम से भारत और ईरान के बीच विचारों, साहित्यिक विधाओं और सांस्कृतिक परंपराओं का आदान प्रदान हुआ।

इस संदर्भ में फ़ारसी साहित्य का अध्ययन केवल एक भाषा सीखने तक सीमित नहीं है। यह दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया के ऐतिहासिक संपर्कों को समझने का भी माध्यम है।

ईरान के सांस्कृतिक सलाहकार ने विद्यार्थियों को दी सलाह

समारोह के मुख्य अतिथि नई दिल्ली स्थित इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान के कल्चर हाउस के सांस्कृतिक सलाहकार डॉ. फ़रीदुद्दीन फ़रीद अस्र थे।

उन्होंने भारत और ईरान के बीच साहित्यिक तथा सांस्कृतिक संबंधों के महत्व पर चर्चा की। उनके संबोधन में भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ारसी भाषा की ऐतिहासिक भूमिका और दोनों देशों की साझा साहित्यिक विरासत का उल्लेख हुआ।

डॉ. फ़रीदुद्दीन फ़रीद अस्र ने फ़ारसी भाषा के विद्यार्थियों और विद्वानों को हाफ़िज़ शिराज़ी की रचनाओं का गंभीरता से अध्ययन करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि यदि विद्यार्थी साहित्य के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं और बड़ी उपलब्धियां हासिल करना चाहते हैं, तो उन्हें हाफ़िज़ जैसे महान कवियों की रचनाओं से गहराई से जुड़ना चाहिए।

उनकी भागीदारी ने कार्यक्रम को भारत ईरान सांस्कृतिक सहयोग के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण बनाया। इस अवसर ने यह रेखांकित किया कि साहित्य विभिन्न देशों और समाजों के बीच संवाद का एक प्रभावशाली माध्यम हो सकता है।

कुलपति मज़हर आसिफ़ ने समझाया फ़ारसी ग़ज़ल का विकास

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलपति प्रोफेसर मज़हर आसिफ़ ने समारोह की अध्यक्षता की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने साहित्यिक विरासत, अकादमिक अध्ययन और फ़ारसी साहित्य में निहित मानवीय मूल्यों के महत्व पर जोर दिया।

उन्होंने फ़ारसी ग़ज़ल के विकासक्रम को सरल और समझने योग्य तरीके से प्रस्तुत किया। उनके संबोधन में साहित्यिक परंपरा को समझने और उसे नए शैक्षणिक संदर्भों से जोड़ने की आवश्यकता प्रमुख रही।

कुलपति की उपस्थिति ने विश्वविद्यालय में भाषा और साहित्य के अध्ययन को बढ़ावा देने के महत्व को भी रेखांकित किया। ऐसे कार्यक्रम विद्यार्थियों को साहित्यिक इतिहास से परिचित कराने के साथ उन्हें शोध, आलोचना और रचनात्मक अध्ययन के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

हाफ़िज़ शिराज़ी की रचनाओं पर हुई चर्चा ने यह भी दिखाया कि शास्त्रीय साहित्य का महत्व केवल उसके ऐतिहासिक दौर तक सीमित नहीं रहता। समय के साथ उसकी व्याख्याएं बदल सकती हैं, लेकिन उसकी रचनाओं में उठाए गए मानवीय प्रश्न नई पीढ़ियों के लिए प्रासंगिक बने रहते हैं।

विद्यार्थियों की ग़ज़ल गायन प्रस्तुति ने बांधा समां

समारोह के समापन सत्र में फ़ारसी विभाग के विद्यार्थियों ने हाफ़िज़ शिराज़ी की ग़ज़लों का गायन किया और उनके साहित्य पर भाषण प्रस्तुत किए।

विद्यार्थी नरगिस ज़ेहरा, हीरा ज़ेबा और फ़ैज़ान अशरफ़ ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुतियों से उपस्थित लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से विद्यार्थियों को फ़ारसी काव्य परंपरा को केवल अकादमिक विषय के रूप में नहीं, बल्कि संगीत और भावनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से भी समझने का अवसर मिला।

ग़ज़ल गायन फ़ारसी साहित्य की काव्यात्मक विशेषताओं को सामने लाने का एक प्रभावी माध्यम है। कविता के शब्द, लय और भाव मिलकर श्रोताओं को रचना के साथ एक अलग तरह का संबंध स्थापित करने में मदद करते हैं।

कार्यक्रम का संचालन फ़ारसी विभाग के शिक्षक और सब्जेक्ट एसोसिएशन के सलाहकार डॉ. मोहम्मद अरशदुल क़ादरी ने किया। अंत में विभाग के शिक्षक प्रोफेसर सैयद कलीम असग़र ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।

फ़ारसी साहित्य के अध्ययन को बढ़ावा देने की पहल

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में हाफ़िज़ शिराज़ी की स्मृति में आयोजित यह समारोह फ़ारसी भाषा और साहित्य की शैक्षणिक परंपरा को आगे बढ़ाने का एक प्रयास रहा। इसमें विश्वविद्यालय के शिक्षकों, विद्यार्थियों और आमंत्रित विद्वानों ने साहित्यिक विरासत के विभिन्न पहलुओं पर विचार साझा किए।

कार्यक्रम ने फ़ारसी ग़ज़ल, हाफ़िज़ की काव्य शैली, ईरानी साहित्यिक परंपरा और भारत ईरान के सांस्कृतिक संबंधों को एक साझा मंच पर प्रस्तुत किया।

ऐसे आयोजन विश्वविद्यालयों में साहित्यिक अध्ययन को जीवंत बनाए रखने में सहायक होते हैं। इनके माध्यम से विद्यार्थियों को महान रचनाकारों के विचारों से परिचित होने, उनकी रचनाओं की व्याख्या करने और विभिन्न संस्कृतियों के बीच ऐतिहासिक संबंधों को समझने का अवसर मिलता है।

हाफ़िज़ शिराज़ी की शायरी पर हुई यह चर्चा इसी व्यापक उद्देश्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण अकादमिक पहल रही।

मुख्य तथ्य: जामिया मिल्लिया इस्लामिया के फ़ारसी विभाग ने 12 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में हाफ़िज़ शिराज़ी की स्मृति में समारोह आयोजित किया। कार्यक्रम ईरान के कल्चर हाउस के सहयोग से हुआ। इसमें कुलपति प्रोफेसर मज़हर आसिफ़, ईरान के सांस्कृतिक सलाहकार डॉ. फ़रीदुद्दीन फ़रीद अस्र, विश्वविद्यालय के वरिष्ठ शिक्षाविदों और विद्यार्थियों ने भाग लिया।

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